राजस्थान के प्रमुख शिलालेख
अभिलेख, लिपि और उनके अध्ययन की मूल जानकारी
● प्राचीन काल में शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों और मंदिरों की दीवारों पर जो लेख खुदे हुए मिलते हैं, उन्हें अभिलेख कहा जाता है।
● अभिलेख प्राचीन इतिहास, राजनैतिक घटनाओं, सामाजिक स्थिति, धार्मिक मान्यताओं और आर्थिक जीवन के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में जानकारी देते हैं।
● उत्कीर्ण अभिलेखों के वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन को एपिग्राफी (Epigraphy) या पुरालेखशास्त्र कहा जाता है, जिसमें अभिलेखों की तिथि, भाषा, आशय, प्रतीक और उद्देश्य का विश्लेषण किया जाता है।
● पुराने अभिलेखों तथा दस्तावेजों में प्रयुक्त लिपि की बनावट, विकास और भेदों के अध्ययन की विधा को पेलियोग्राफी (Paleography) या पुरालिपिशास्त्र कहा जाता है।
● भारतीय लिपियों के क्रमिक विकास, रूपांतरण और विविधताओं पर सबसे पहला वैज्ञानिक एवं संगठित कार्य डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने किया।
● ओझा जी ने भारतीय लिपियों पर आधारित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भारतीय प्राचीन लिपिमाला’ की रचना की, जो आज भी भारतीय लिपि-अध्ययन का मानक ग्रंथ माना जाता है।
प्राचीन अभिलेख (द्वितीय शताब्दी ई.पूर्व से 10वीं सदी तक)
घोसुण्डी शिलालेख – भागवत धर्म का प्राचीन प्रमाण (द्वितीय शताब्दी ई.पू.)
- यह महत्वपूर्ण शिलालेख चित्तौड़ के समीप स्थित नगरी के पास घोसुण्डी गाँव से प्राप्त हुआ है और इसकी तिथि लगभग द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व मानी जाती है।
- इस अभिलेख में भागवत धर्म की प्राचीन परंपरा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसमें संकर्षण (बलराम) और वासुदेव (कृष्ण) को पूज्य देव रूप में स्वीकार किया गया है।
- घोसुण्डी शिलालेख से यह भी पता चलता है कि उस समय अश्वमेध यज्ञ का आयोजन और वैदिक यज्ञ परंपरा प्रचलित थी, जो तत्कालीन धार्मिक–राजनैतिक वैभव को दर्शाती है।
- राजस्थान की भूमि पर भागवत धर्म के प्रचार–प्रसार के सबसे पुराने और ठोस प्रमाणों में यह शिलालेख विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है।
भ्रमरमाता का लेख – प्रारम्भिक सामंत प्रथा (490 ई.)
- यह अभिलेख छोटी सादड़ी (ज़िला प्रतापगढ़) के प्रसिद्ध भ्रमरमाता मंदिर से प्राप्त हुआ है, जिसकी तिथि लगभग 490 ई. मानी जाती है।
- यह लेख सुंदर संस्कृत पद्य में रचा गया है, इसके रचयिता ब्रह्मसोम तथा उत्कीर्णक पूर्वा नामक शिल्पी थे।
- अभिलेख में गौर वंश तथा औलिकर वंश के शासकों का क्रमवार वर्णन मिलता है, जो उस समय के क्षेत्रीय राजवंशों की जानकारी देता है।
- लेख से प्रारम्भिक सामंत प्रथा, उनके अधिकार, पद और राजनीतिक स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं, जिससे पाँचवीं सदी की समग्र राजनीतिक पृष्ठभूमि उजागर होती है।
नांदसा (नालंदा चूप) यूप–स्तम्भ लेख – यज्ञ परंपरा का स्वरूप (225 ई.)
- यह अभिलेख वर्तमान भीलवाड़ा जिले में स्थित नांदसा (नालंदा चूप) नामक स्थान से प्राप्त हुआ है, जहाँ एक यूप–स्तम्भ (यज्ञ स्तम्भ) स्थापित किया गया था।
- लेख के अनुसार 225 ई. में शक्तिगुणगुरु नामक व्यक्ति ने यहाँ षष्ठिरात्र यज्ञ सम्पन्न कराया, जिसका अर्थ है कि यह यज्ञ लगातार छः रातों तक चलता रहा।
- यूप–स्तम्भ की स्थापना पश्चिमी (शक) क्षत्रपों के शासन काल में सोम नामक व्यक्ति द्वारा कराई गई, जिससे उस समय की राजनीतिक सत्ता और धार्मिक परंपरा का संबंध ज्ञात होता है
- यह अभिलेख राजस्थान में वैदिक यज्ञों की परिपाटी, उनके आयोजक वर्ग और शासन–संरक्षण की जानकारी देने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है।
गंगधार का लेख – सामंती व्यवस्था की झलक (423 ई.)
- यह अभिलेख झालावाड़ जिले के गंगधार नामक स्थान से प्राप्त हुआ है और इसकी भाषा संस्कृत है।
- अभिलेख से पता चलता है कि राजा विश्वकर्मा के कुशल मंत्री मयूराक्ष ने एक भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था, जो तत्कालीन धार्मिक श्रद्धा और वैष्णव परंपरा का प्रतीक था।
- मयूराक्ष ने केवल विष्णु मंदिर ही नहीं, बल्कि तांत्रिक शैली का मातृ–गृह (मातृदेवियों का मंदिर) और एक सुसज्जित बावड़ी भी बनवाई, जिससे उस काल की स्थापत्य–कला और जल–व्यवस्था का स्तर पता चलता है।
- इस लेख में पाँचवीं शताब्दी के सामंती ढाँचे, अधिकारियों, भूमिधरों और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका की झलक मिलती है, इसलिए यह अभिलेख सामाजिक–राजनीतिक इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
बड़वा स्तम्भ लेख – पूर्व गुप्तकालीन यज्ञ परंपरा (238–239 ई.)
- बारां जिले के अन्ता के समीप बड़वा गाँव से 238–239 ई. के तीन महत्वपूर्ण स्तम्भ–लेख प्राप्त हुए हैं, जिन्हें पूर्व गुप्तकालीन काल का माना जाता है।
- इन अभिलेखों में किरात्र यज्ञों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें बलवर्धन, सोमदेव और बलसिंह नामक तीन भाइयों ने सम्पन्न कराया था, जिससे पता चलता है कि एक ही परिवार ने अनेक बड़े यज्ञ कराए।
- एक अन्य लेख में मौखरी वंश के धनत्रात द्वारा किए गये अप्तोयाम यज्ञ का उल्लेख है, जो एक पूरे दिन और अगले दिन तक चलने वाला विशेष प्रकार का अनुष्ठान था।
- बड़वा के ये लेख उस समय की धर्म–संस्कृति, यज्ञ परंपरा में सम्पन्न वर्ग की भूमिका और सामाजिक प्रतिष्ठा के बारे में स्पष्ट संकेत प्रदान करते हैं।
सांमोली शिलालेख – गुहिल वंश का प्रारम्भिक साक्ष्य (646 ई.)
- यह शिलालेख उदयपुर जिले के सांमोली गाँव से मिला है और यह गुहिल वंश के शासक शिलादित्य के समय का है।
- इस लेख में मेवाड़ के प्रारम्भिक गुहिल शासकों के बारे में सूचना मिलती है, जिससे गुहिल वंश की समय–रेखा को ठोस आधार मिलता है।
- अभिलेख से उस समय की आर्थिक स्थिति, अनुदान, मंदिर–निर्माण और साहित्यिक गतिविधियों की भी अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है।
- मेवाड़ के प्राचीन इतिहास तथा राजवंशीय क्रम के निर्धारण में यह शिलालेख महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्वीकार किया जाता है।
एकलिंगजी की नाथ प्रशस्ति – मेवाड़ का सांस्कृतिक दस्तावेज (971 ई.)
- यह प्रसिद्ध प्रशस्ति उदयपुर के एकलिंग मंदिर के निकट स्थित लकुलीश मंदिर में लगी हुई है।
- यह लेख गुहिलवंशी शासक नरवाहन के समय उत्कीर्ण कराया गया था।
- इसकी भाषा संस्कृत और लिपि देवनागरी है और रचयिता कवि आम्र माने जाते हैं।
- यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक इतिहास, धार्मिक परंपरा, एवं सांस्कृतिक विकास को जानने के लिए अत्यंत उपयोगी स्रोत है, जिसमें राजवंश, उनके निर्माण कार्य और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका का विस्तृत वर्णन है।
आहड़ की देवकुलिका का लेख – युद्ध और प्रशासन की झलक (977 ई.)
- यह महत्वपूर्ण अभिलेख उदयपुर के निकट आहड़ स्थित एक जैन मंदिर की देवकुलिका (देवमूर्ति वाला विशिष्ट कक्ष) के छबने पर उत्कीर्ण है।
- इसकी भाषा संस्कृत है और यह मेवाड़ के गुहिल शासक शक्तिकुमार के काल से संबंधित है।
- अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि अल्लट, नरवाहन और शक्तिकुमार – इन तीन गुहिल शासकों के समय में कौन–कौन से अक्षपटलाधीश (मुख्य वित्त/लेखा अधिकारी) कार्यरत थे।
- इस लेख में गुहिल राजा अल्लट और प्रतिहार शासक देवपाल के बीच हुए युद्ध का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें प्रतिहार शासक देवपाल युद्ध में मारा गया था।
- इस प्रकार, यह अभिलेख मेवाड़ के प्राचीन शासकों, उनके राजनीतिक संघर्ष, वित्तीय प्रशासन व युद्ध–नीति को समझने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
आहड़ का शक्तिकुमार लेख – वंशावली और समृद्धि का दर्पण (977 ई.)
- शक्तिकुमार से संबंधित एक अन्य अभिलेख भी आहड़ से प्राप्त होता है, जिसे कर्नल टॉड अपने साथ इंग्लैण्ड ले गए थे।
- टॉड ने अपनी पुस्तक ‘एनाल्स’ में इस लेख की विषय–वस्तु का विस्तृत विवरण दिया, यद्यपि मूल शिला आज उपलब्ध नहीं है।
- यह लेख संस्कृत भाषा में है और इसमें गुहिल शासक शक्तिकुमार की राजनीतिक सामर्थ्य, विजयों और उसके काल में आहड़ की आर्थिक सम्पन्नता का वर्णन है।
- अभिलेख के अनुसार अल्लट की रानी हरियादेवी एक हूण राजा की पुत्री थी, जिसने हर्षपुर नामक ग्राम बसाया था – यह सूचना मेवाड़ के वैवाहिक संबंधों और सीमापार राजनीतिक रिश्तों को समझने में उपयोगी है।
- इस लेख में गुहदत्त से लेकर शक्तिकुमार तक की विस्तृत वंशावली दी गई है, जो मेवाड़ के प्राचीन इतिहास और गुहिल वंश के प्रारम्भिक चरण को समझने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
नादेसमाँ गाँव का लेख – नागदा के नष्ट होने से पहले (1222 ई.)
- यह अभिलेख उदयपुर जिले के नादेसमाँ गाँव में स्थित चारभुजा मंदिर के पास टूटे हुए सूर्य मंदिर के एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है।
- लेख से पता चलता है कि उस समय मेवाड़ के शासक जैत्रसिंह की राजधानी नागदा थी।
- इसका विशेष महत्व यह है कि 1222 ई. तक नागदा नगर नष्ट नहीं हुआ था, जबकि बाद के काल में यह नगर प्राकृतिक/राजनैतिक कारणों से उजड़ गया।
- इस प्रकार यह लेख मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा के इतिहास और उसके अस्तित्व की अंतिम अवस्थाओं का प्रामाणिक साक्ष्य है।
चित्तौड़ के पार्श्वनाथ मंदिर का लेख – धार्मिक सहिष्णुता (1278 ई.)
- यह अभिलेख चित्तौड़ स्थित श्याम पार्श्वनाथ जैन मंदिर से संबंधित है।
- लेख से पता चलता है कि राजा तेजसिंह की पत्नी जयतल्लदेवी ने श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।
- यह तथ्य मेवाड़ के शासकों की धार्मिक सहिष्णुता, जैन धर्म के प्रति सम्मान और मंदिर–निर्माण में सक्रिय भूमिका की ओर इंगित करता है।
अपराजित का शिलालेख – गुहिलों की विजय गाथा (661 ई.)
- यह अभिलेख वि.सं. 718 (661 ई.) का है और नागदा के समीप स्थित कुंडेश्वर मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण था, जिसे बाद में डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने सुरक्षित रखवाकर अजमेर के विक्टोरिया हॉल संग्रहालय में रखवा दिया।
- लेख की भाषा संस्कृत और लिपि अत्यंत सुन्दर है, जो उस समय की विकसित शिल्प–परंपरा को दर्शाती है।
- अभिलेख के अनुसार गुहिल शासक अपराजित ने अपने समय में कई विजयों द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाई। उसने वराहसिंह नामक एक तेजस्वी शासक को पराजित कर बाद में उसे अपना सेनापति नियुक्त किया।
- लेख में एक विष्णु मंदिर के निर्माण का उल्लेख भी मिलता है, जिससे यह स्पष्ट है कि उस समय वैष्णव मत का प्रभाव तथा मंदिर–निर्माण की परंपरा प्रबल थी।
- इस प्रशस्ति की रचना दामोदर ने की और उत्कीर्णन का कार्य यशोभट्ट ने किया, जो तत्कालीन विद्वानों और शिल्पियों की उच्च क्षमता का प्रमाण है।
- अभिलेख से सातवीं शताब्दी के मेवाड़ की धार्मिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था की विस्तृत जानकारी मिलती है।
सारणेश्वर प्रशस्ति – मेवाड़ की कर–व्यवस्था (953 ई.)
- यह प्रशस्ति उदयपुर के श्मशान स्थल के पास स्थित सारणेश्वर शिवालय के पश्चिमी द्वार की छत (छबने) पर अंकित है।
- इसकी भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है।
- अभिलेख से मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अल्लट और उसके पुत्र नरवाहन के साथ–साथ मुख्य प्रशासनिक कर्मचारियों के नाम व उनके पदों की जानकारी मिलती है।
- इसमें तत्कालीन शासन–प्रणाली, राजस्व–व्यवस्था, और विभिन्न पदों की जिम्मेदारियों का स्पष्ट संकेत मिलता है।
- इस लेख के लिपिकार कायस्थ पाल और बेलक नामक व्यक्ति थे, जो उस युग में वैश्य–कायस्थ वर्ग की प्रशासन में महत्वपूर्ण भागीदारी को दर्शाते हैं।
चीरवा का शिलालेख – गुहिल वंश और सती–प्रथा (1273 ई.)
- यह शिलालेख उदयपुर के निकट चीरवा गाँव के एक मंदिर में लगा हुआ है।
- इस लेख की रचना आचार्य भुवनसिंह सूरि के शिष्य रत्नप्रभसूरि ने की और उत्कीर्णन कार्य केलिसिंह ने किया।
- इसमें गुहिलवंशी शासक पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समरसिंह की उपलब्धियों, दान–धर्म और निर्माण–कार्य का वर्णन है।
- लेख में कुल 51 श्लोक हैं, और इसकी तिथि वि.सं. 1330 (कार्तिक शुक्ल) बताई गई है।
- यह लेख बागेश्वर और बागेश्वरी की आराधना से प्रारंभ होता है।
- अभिलेख की सामग्री से अनुमान मिलता है कि उस समय सती–प्रथा का प्रचलन था और उसे धार्मिक–सामाजिक मान्यता प्राप्त थी।
अचलेश्वर का लेख – बापा से समरसिंह तक वंशक्रम (1285 ई.)
- यह शिलालेख माउंट आबू के अचलेश्वर महादेव मंदिर के पास, एक मठ की चौपाल की दीवार में लगा हुआ है।
- इस लेख के रचयिता शुभचन्द्र और उत्कीर्णक कर्मसिंह थे।
- लेख में नागदा में हारित ऋषि की तपस्या और उनकी कृपा से बापा को राज्य प्राप्ति की कथा वर्णित है, जो मेवाड़ के मूल राजवैधता–कथानक का हिस्सा है।
- इसमें बापा से लेकर समरसिंह तक की विस्तृत वंशावली दी गई है, जिससे मेवाड़ के शासकों का क्रम स्पष्ट होता है।
- यह अभिलेख मेवाड़ के राजनीतिक इतिहास, कुल–परंपरा और धार्मिक मान्यताओं का महत्वपूर्ण स्रोत है
रसिया का लेख – गुहिल वंश की उपलब्धियाँ (1274 ई.)
- यह लेख चित्तौड़ में स्थित रसिया की छतरी पर अंकित था।
- इसका रचयिता वेदशर्मा था।
- इस लेख में बापा से लेकर नरवर्मा तक के गुहिलवंशी शासकों की उपलब्धियों, दान, वीरतापूर्ण कार्यों और धार्मिक योगदान का उल्लेख मिलता है।
- यह लेख गुहिल वंश के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए सहायक कड़ी के रूप में माना जाता है।
चाटसू प्रशस्ति – गुहिलों और प्रतिहारों का संबंध (813 ई.)
- यह प्रशस्ति जयपुर जिले के चाटसू नामक स्थान से प्राप्त होती है।
- इसमें चाटसू क्षेत्र पर शासन करने वाले गुहिल शासकों की वंश–परंपरा और उनकी उपलब्धियों का उल्लेख है।
- अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि चाटसू के गुहिल शासक प्रतिहार वंश के अधीन सामंत के रूप में कार्य कर रहे थे।
- इस वंश में मेवाड़ के गुहिलों की भाँति शिवभक्ति और विष्णु–भक्ति दोनों का प्रचलन था, जो धार्मिक सहिष्णुता और मिश्रित भक्ति धारा की ओर संकेत करता है।
चित्तौड़ का मानमोरी लेख (713 ई.)
- यह लेख 713 ई. का है और चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के किनारे से कर्नल जेम्स टॉड को प्राप्त हुआ था।
- लेख का रचयिता पुष्प और उत्कीर्णक शिवदित्य नामक शिल्पी थे।
- टॉड ने इस अभिलेख की प्रतिलिपि अपनी पुस्तक में छपवाई, परन्तु वास्तविक शिला–लेख को ब्रिटेन ले जाते समय किसी दुर्घटना के कारण समुद्र में छोड़ना पड़ा, इस कारण आज इस अभिलेख की जानकारी केवल उसकी प्रकाशित प्रति के माध्यम से ही उपलब्ध है।
गंभीरी नदी के पुल का शिलालेख – भूमि–दान की परंपरा
- यह लेख मेवाड़ शासक समरसिंह के काल से संबंधित है और गंभीरी नदी पर बने एक पुल में लगाया गया था।
- माना जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण के समय यह पुल निर्माण कराया, तो इसी पुराने लेख को उस पर लगवा दिया।
- अभिलेख से पता चलता है कि समरसिंह ने विभिन्न लोगों को भूमि–दान दिए, जो उस समय के राजाओं द्वारा धर्मार्थ कार्यों, ब्राह्मण व मंदिरों के पालन तथा समाज–सेवा के रूप में भूमि देने की परंपरा को दर्शाते हैं।
श्रृंगी ऋषि का लेख – राणा हम्मीर और भील समाज (1428 ई.)
- यह अभिलेख राणा मोकल के समय का है और उदयपुर के समीप एकलिंगजी के पास स्थित श्रृंगी ऋषि नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।
- इसके रचयिता कविराज वाणीविलास योगेश्वर और उत्कीर्णक पन्ना थे।
- लेख में राणा हम्मीर की उपलब्धियों, उनके संघर्ष और मेवाड़ की पुनर्स्थापना के कार्यों का उल्लेख मिलता है।
- विशेष रूप से इसमें भील समुदाय की सामाजिक स्थिति, उनकी भागीदारी और मेवाड़ राजसत्ता से उनके संबंध का उल्लेख है, जो जनजातीय इतिहास के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- अभिलेख में राणा लाखा के बारे में बताया गया है कि उन्होंने काशी, प्रयाग और गया (त्रिस्थली) में हिन्दुओं से लिए जाने वाले करों को हटवाया और गया में मंदिरों का निर्माण करवाया।
- इसकी भाषा सरल और स्पष्ट संस्कृत है, इसमें लगभग 30 श्लोक हैं, जो उस काल की धार्मिक नीति और राज–धर्म के आदर्श को उजागर करते हैं।
एकलिंगजी मंदिर की रायमल प्रशस्ति – हम्मीर से रायमल तक (1488 ई.)
यह प्रशस्ति एकलिंगजी मंदिर (उदयपुर के पास) के दक्षिणी द्वार के ताक में लगी हुई है
इसे महाराणा रायमल ने एकलिंगजी मंदिर के जीर्णोद्धार के समय उत्कीर्ण करवाया था।
लेख नागरी लिपि और संस्कृत भाषा में है, और इसमें कुल 101 श्लोक हैं
प्रशस्ति–लेख के उत्कीर्णक सूत्रधार अर्जुन थे, जिनकी देखरेख में एकलिंगजी मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य सम्पन्न हुआ।
इस लेख में हम्मीर से लेकर रायमल तक मेवाड़ के महाराणाओं की प्रमुख उपलब्धियों, दान, निर्माण कार्य, शिक्षा–संवर्धन और जनता के नैतिक जीवन का चित्रण है।
साथ ही, उस समय के मेदपाट (मेवाड़) और चित्तौड़ (चित्रकूट) की विशेषताओं का भी वर्णन मिलता है, जिसके कारण यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक व सांस्कृतिक इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
कुम्भलगढ़ का शिलालेख – महाराणा कुम्भा की विजयों का महाग्रंथ (1460 ई.)
- यह शिलालेख कुम्भलगढ़ दुर्ग में स्थित है और इसे महाराणा कुम्भा की विजयों का विस्तृत दस्तावेज माना जाता है।
- शिलालेख 5 अलग–अलग शिलाओं पर अंकित है और इसमें लगभग 270 श्लोक हैं, इसलिए इसे मेवाड़ के बड़े शिलालेखों में गिना जाता है।
- इसमें उल्लेख है कि महाराणा कुम्भा ने स्पादलक्ष, नाराणा, वसन्तपुरा और आबू जैसे अनेक क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।
- इस लेख में एकलिंगजी मंदिर, कुटिला नदी और कुम्भा के धार्मिक व सांस्कृतिक संरक्षण कार्यों का भी वर्णन है।
- डॉ. ओझा के अनुसार, इस प्रशस्ति के रचयिता कवि महेश थे, जिन्होंने कुम्भा की वीरता, दानशीलता और राजधर्म का उत्कृष्ट वर्णन किया।
कीर्तिस्तंभ (विजयस्तंभ) प्रशस्ति – कुम्भा की बहुआयामी प्रतिभा (1460 ई.)
- यह प्रशस्ति चित्तौड़ किले में स्थित प्रसिद्ध कीर्तिस्तंभ / विजयस्तंभ की नौवीं और अंतिम मंजिल पर उत्कीर्ण है।
- इस प्रशस्ति के रचयिता कवि अत्रि और महेश बताये जाते हैं।
- लेख में महाराणा कुम्भा की युद्ध–विजयों, व्यक्तिगत गुणों, जागीर–प्रदान, धार्मिक–कर्मों तथा संगीत–विद्या की विस्तृत चर्चा है।
- इसमें कुम्भा को ‘दानगुरु’, ‘राजगुरु’ और ‘शैलगुरु’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है, जो उसकी दानशीलता, राजकौशल और दुर्ग–निर्माण कला का प्रतीक हैं।
- प्रशस्ति में लगभग 187 श्लोक हैं, जो कुम्भा के युग को स्वर्णकाल के रूप में चित्रित करते हैं।
रणकपुर प्रशस्ति – गुहिल वंश का महत्त्वपूर्ण वंश–दस्तावेज (1439 ई.)
- यह प्रसिद्ध प्रशस्ति कुम्भाकालीन है और रणकपुर के चौमुखा जैन मंदिर में उत्कीर्ण है।
- इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है।
- यह प्रशस्ति मेवाड़ के गुहिल वंश के क्रमबद्ध इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है।
- इसमें विशेष रूप से यह उल्लेख मिलता है कि बापा और कालभोज को दो अलग–अलग व्यक्ति माना गया है, जबकि कई परंपराओं में इन्हें एक ही माना जाता था।
- अभिलेख के अनुसार, गुहिल को बापा का पुत्र बताया गया है, और बघा रावल से लेकर महाराणा कुम्भा तक की जानकारी दी गई है।
- इसमें मंदिर निर्माता जैता (जैता भँडारी) का नाम भी मिलता है, जिसने रणकपुर के इस भव्य जैन मंदिर के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई।
- यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक इतिहास, जैन धर्म–संरक्षण और धार्मिक स्थापत्य–कला के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
देलवाड़ा का लेख – ‘टंक’ मुद्रा का प्रमाण (1434 ई.)
- यह अभिलेख देलवाड़ा क्षेत्र से प्राप्त है और इसकी भाषा संस्कृत एवं मेवाड़ी मिश्रित है।
- इस लेख से टंक नामक मुद्रा के प्रचलन की जानकारी मिलती है, जिससे उस समय की मुद्रा–व्यवस्था और आर्थिक लेन–देन की पद्धति का पता चलता है।
- यह अभिलेख मेवाड़ की आर्थिक–इतिहास और स्थानीय भाषा–प्रयोग का भी अच्छा उदाहरण है।
जगन्नाथ राय प्रशस्ति – हल्दीघाटी से जगतसिंह तक (1652 ई.)
- यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथ राय मंदिर के सभामण्डप में लगी हुई है।
● मंदिर का निर्माण महाराणा जगतसिंह प्रथम ने करवाया था, और उसी अवसर पर यह प्रशस्ति लिखवाई गई।
● अभिलेख में बापा से लेकर महाराणा सांगा तक मेवाड़ के शासकों की क्रमवार उपलब्धियाँ, युद्ध–विजय, दान और निर्माण कार्यों का उल्लेख है।
● विशेष रूप से इसमें हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध का वर्णन भी मिलता है, जो मेवाड़–अकबर संघर्ष का प्रमुख अध्याय है।
● यह प्रशस्ति मेवाड़ के राजनीतिक–सैन्य इतिहास के लिए एक उपयोगी दस्तावेज है।
राजप्रशस्ति – भारत का सबसे बड़ा शिलालेख (1676 ई.)
- यह अत्यंत प्रसिद्ध प्रशस्ति महाराणा राजसिंह (शासनकाल 1652–1680 ई.) से संबंधित है।
● अकाल के समय प्रजा को राहत देने और जल–संचय के लिए राजसिंह ने राजसमंद नामक विशाल झील का निर्माण करवाया।
● झील की पाल पर 25 विशाल पाषाण पट्टिकाओं पर यह प्रशस्ति उत्कीर्ण है।
● यह शिलालेख संस्कृत पद्य में रचा गया है और इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट थे।
● राजप्रशस्ति को भारत का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है।
● इस प्रशस्ति में मेवाड़ का विस्तृत, क्रमबद्ध और प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया गया है –
● राजनीतिक घटनाएँ
● सामाजिक संरचना
● सांस्कृतिक गतिविधियाँ
● धार्मिक नीतियाँ
● तकनीकी और आर्थिक स्थिति
● इस दृष्टि से राजप्रशस्ति 17वीं शताब्दी के मेवाड़ इतिहास का विश्वसनीय विश्वकोश मानी जा सकती है।
कंसुआ (कणसवा) का लेख – मौर्य वंश का अंतिम संदर्भ (738 ई.)
- यह महत्वपूर्ण लेख कोटा के निकट कंसुआ (कणसवा) गाँव के शिवालय से प्राप्त हुआ है, जिसकी तिथि 738 ई. है।
- इस अभिलेख में धवल नामक एक मौर्य शासक का उल्लेख है, जो राजस्थान में मौर्य वंश के अंतिम प्रमाणों में से एक माना जाता है।
- इस लेख के बाद राजस्थान में किसी अन्य मौर्य शासक का उल्लेख अभिलेखीय रूप से नहीं मिलता, इसलिए यह लेख मौर्य वंश के अंतिम चरण को समझने में विशेष सहायक है।
मण्डोर शिलालेख – मण्डोर प्रतिहारों की वंशावली (837 ई.)</span
- यह अभिलेख मूल रूप से मण्डोर के विष्णु मंदिर में लगा हुआ था, बाद में इसे जोधपुर के शहर–पनाह क्षेत्र में लगा दिया गया।
- लेख में मण्डोर के प्रतिहार शासकों की वंश–परंपरा तथा उनके कार्यों का सराहनापूर्वक वर्णन किया गया है।
- यह शिलालेख मण्डोर–क्षेत्र के प्रतिहारों के इतिहास को समझने के लिए एक प्रमुख आधार–स्रोत माना जाता है।
घटियाला शिलालेख – कक्कुक प्रतिहार और ‘मग’ ब्राह्मण (861 ई.)
- यह शिलालेख जोधपुर से लगभग 22 मील दूर स्थित घटियाला नामक स्थान पर, एक जैन मन्दिर (जिसे ‘माता की साल’ कहा जाता है) के निकट स्थित एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है।
- लेख की भाषा संस्कृत है तथा इसमें गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग किया गया है।
- अभिलेख में मुख्य रूप से प्रतिहार शासक कक्कुक की राजनीतिक उपलब्धियों, सामरिक नीति, सामाजिक दृष्टिकोण और धार्मिक आस्था का विस्तार से वर्णन उपलब्ध है।
- विशेष रूप से इसमें ‘मग’ जाति के ब्राह्मणों का उल्लेख है, जो ओसवाल जैनों के आश्रय में रहते थे और जैन मंदिरों में पूजा–पाठ करवाते थे।
- मग’ ब्राह्मणों का यह उल्लेख समकालीन वर्ण–व्यवस्था और धार्मिक–सामाजिक संबंधों को समझने में अत्यंत सहायक है।
- इन लेखों को मग ब्राह्मणों ने लिखा और स्वर्णकार कृष्णेश्वर नामक शिल्पी ने उत्कीर्ण किया था, जो उस समय के विद्वान–शिल्पी सहयोग का प्रमाण है।
घटियाला के दो अन्य लेख – प्रतिहार वंशावली (861 ई.)
- घटियाला से प्राप्त अन्य लेख भी कक्कुक प्रतिहार के समय के हैं।
- इन अभिलेखों में हरिश्चन्द्र से लेकर कक्कुक तक मण्डोर के प्रतिहार शासकों की पूरी वंशावली दी गई है।
- विशेष बात यह है कि लेख का अन्तिम श्लोक स्वयं कक्कुक द्वारा रचा गया बताया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिहार शासक केवल वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि विद्वान और साहित्य–प्रेमी भी थे।
बुचकला शिलालेख – प्रतिहारों की सामंती संरचना (815 ई.)
- यह शिलालेख जोधपुर जिले के बिलाड़ा के समीप बुचकला गाँव के पार्वती मंदिर में पाया गया है।
- अभिलेख संस्कृत पद्य में रचा गया है और यह प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के काल से संबंधित है।
- इसमें प्रतिहार वंश के शासकों तथा उनके अधीन कार्यरत सामंतों के नामों का उल्लेख है, जिससे उस समय की सामंती संरचना, शक्ति–संतुलन और प्रशासनिक तंत्र का आभास होता है।
ओसियाँ का लेख – प्रतिहार वत्सराज का यश (956 ई.)
यह लेख ओसियाँ से प्राप्त हुआ है और संस्कृत पद्य में रचा गया है।
इसे सूत्रधार पदाजा नामक शिल्पकार ने उत्कीर्ण किया था
अभिलेख में प्रतिहार शासक वत्सराज को शत्रुओं का दमन करने वाला, पराक्रमी और प्रभावशाली राजा बताया गया है।
लेख से उसके समय की समृद्धि, सुव्यवस्थित शासन तथा वर्ण–व्यवस्था के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है, जो सामाजिक संरचना को समझने में सहायक है।
चित्तौड़ लेख – परमारों की उपलब्धियाँ (971 ई.)
- यह लेख चित्तौड़ से प्राप्त हुआ है और परमार शासकों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है।
- इससे ज्ञात होता है कि परमार शासकों ने चित्तौड़ पर अपना अधिकार स्थापित किया तथा चित्तौड़ उस समय समृद्ध और महत्त्वपूर्ण नगर बन चुका था।
- इस प्रशस्ति में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी मिलता है कि देवालयों में स्त्रियों के प्रवेश को निषिद्ध बताया गया है, जो उस समय की सामाजिक–धार्मिक मान्यताओं एवं स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण का द्योतक है।
हर्षनाथ मंदिर प्रशस्ति – चौहानों का प्रारम्भिक इतिहास (973 ई.)
- यह प्रशस्ति सीकर जिले के प्रसिद्ध हर्षनाथ मंदिर में स्थापित है।
- इसकी भाषा संस्कृत पद्य है और रचना शैली अत्यंत काव्यात्मक एवं प्रशंसात्मक है।
- इसमें चौहान शासकों की वंश–परंपरा, उनके विजय–प्रसंग और धार्मिक कार्यों का उल्लेख है।
- इस लेख में वागड़ क्षेत्र के लिए ‘वार्गट’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जिससे प्राचीन भू–नामों की जानकारी भी मिलती है।
बिजौलिया शिलालेख – चौहानों का गौरव और प्राचीन भू–नाम (1170 ई.)
- यह प्रसिद्ध शिलालेख बिजौलिया (जिला बूंदी/भीलवाड़ा सीमा क्षेत्र) स्थित पार्श्वनाथ मंदिर के समीप एक चट्टान पर उत्कीर्ण है।
- इसकी भाषा संस्कृत है, और इसमें लगभग 13 पद (श्लोक) हैं।
- इस प्रशस्ति के रचयिता गुणभद्र तथा उत्कीर्णक गोविन्द थे।
- लेख में साँभर और अजमेर के चौहान वंश की वंश–सूची और उनकी उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन है।
- चौहान शासकों को यहाँ वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताया गया है, जो उनके ब्राह्मण–गोत्रीय मूल की परंपरा को दर्शाता है।
- बिजौलिया क्षेत्र को इस लेख में ‘उत्तमाद्रि’ कहा गया है, जबकि अन्य स्थलों के प्राचीन नाम भी मिलते हैं, जैसे –
- जालौर = जाबालिपुर
- साँभर = शांकम्बरी
- भीनमाल = श्रीमाल
- टॉड के अनुसार, बिजौलिया का वास्तविक नाम ‘विजयावल्ली’ रहा होगा।
- यह लेख न केवल चौहानों के राजनीतिक इतिहास के लिए, बल्कि प्राचीन भू–नामों, जैन मंदिर निर्माण और उपरमाल (ऊपरमाल) क्षेत्र की पहचान के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
किराडू का लेख – पशुवध निषेध की राजाज्ञा (1152 ई.)
- यह लेख किराडू (जिला बाड़मेर) के निकट स्थित एक शिव मंदिर में उत्कीर्ण है और इसे एक प्रकार की राजाज्ञा (शाही आदेश) माना जाता है।
- अभिलेख में उल्लेख है कि चौहान सामंत आल्हणदेव ने मास के दोनों पक्षों (शुक्ल व कृ्ष्ण) की अष्टमी, एकादशी और चतुर्दशी तिथियों पर पशुवध (जानवरों की हत्या) को प्रतिबंधित कर दिया।
- आदेश का उल्लंघन करने पर दंड निर्धारित था –
- सामान्य प्रजा से 5 द्रम
- राजपरिवार के सदस्य से 1 द्रम
- इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए दंड अलग रखा जाता था और समाज में वर्ग–आधारित भेद मौजूद थे।
- इस अभिलेख में राज्य–प्रशासन के विभिन्न पदाधिकारियों के नाम भी मिलते हैं, जिससे उस समय के प्रशासनिक ढांचे की रूपरेखा सामने आती है।
जालौर का लेख – परमार वंश की उत्पत्ति (1118 ई.)
यह अभिलेख जालौर में स्थित एक पुरानी इमारत (तोपखाना) की उत्तरी दीवार पर लगा हुआ था, जिसे बाद में जोधपुर संग्रहालय में सुरक्षित कर लिया गया।
लेख में जालौर के परमार वंश की चर्चा की गई है और यह भी उल्लेख मिलता है कि परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ से हुई मानी जाती थी।
अभिलेख में जालौर के परमार वंश के संस्थापक के रूप में वाक्यतिराज का नाम मिलता है, जिसने इस वंश की नींव रखी।
यह लेख जालौर के परमारों के धार्मिक–पौराणिक मूल, राजवंशीय वैधता तथा क्षेत्रीय राजनीति के अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
लूणवसाही की प्रशस्ति – तेजपाल और वास्तुपाल (1230 ई.)
- यह प्रशस्ति माउंट आबू के प्रसिद्ध देलवाड़ा जैन मंदिर–समूह के लूणवसाही मंदिर से संबंधित है।
- इसकी भाषा संस्कृत है और यह पद्य शैली में लिखी गई है।
- इस लेख से आबू के परमार शासकों तथा वास्तुपाल और तेजपाल के वंश के बारे में जानकारी मिलती है, जो गुजरात–राजस्थान की जैन परंपरा के महान दानवीरों के रूप में प्रसिद्ध हैं।
- अभिलेख के अनुसार, आबू के परमार शासक सोमसिंह के समय में, मंत्री वास्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने अपनी पत्नी अनुपमा देवी के श्रेय के लिए लूणवसाही नामक नेमिनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
बीकानेर की रायसिंह प्रशस्ति – दुर्ग और काबुल विजय (1594 ई.)
- यह प्रशस्ति बीकानेर दुर्ग के सूरजपोल के पास लगी हुई है और यह महाराजा रायसिंह के समय की है।
- लेख की भाषा संस्कृत है।
- इसमें बीकानेर दुर्ग के निर्माण और उसे मजबूत बनाने के कार्यों का उल्लेख है।
- अभिलेख में राव बीका से लेकर रायसिंह तक बीकानेर के शासकों की उपलब्धियों, वंश–क्रम और प्रमुख घटनाओं का उल्लेख मिलता है।
- इसमें रामसिंह की काबुल विजय का भी विवरण है, जो बीकानेर–वंश की सैन्य शक्ति का प्रमाण है।
- इस प्रशस्ति के र
आमेर का लेख – कछवाहा–मुगल संबंध (1612 ई.)
यह लेख आमेर में स्थित है और राजा मानसिंह के समय का है।
इसमें कछवाहा वंश को ‘रघुवंशतिलक’ कहकर सम्मानित किया गया है, जिससे उन्हें रघुवंशी परंपरा से जोड़ा गया है
लेख में क्रम से-
पृथ्वीराज
उनके पुत्र भारमल
उनके पुत्र भगवंतदास
और उनके उत्तराधिकारी महाराजाधिराज मानसिंह
– इन चार पीढ़ियों के नाम मिलते हैं
अभिलेख में सम्राट जहाँगीर के शासन की दुहाई दी गई है तथा इससे आमेर और मुगलों के घनिष्ठ संबंध, तथा आमेर–कछवाहों की मुगल साम्राज्य में महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है।
इस लेख में मानसिंह द्वारा जमवारामगढ़ दुर्ग के निर्माण का भी उल्लेख है।
मांडल की जगन्नाथ कछवाहा छतरी का लेख (1613 ई.)
- यह अभिलेख भीलवाड़ा जिले के मांडल नगर में स्थित जगन्नाथ कछवाहा की 32 खम्भों वाली छतरी में उत्कीर्ण है, जिसे सिंहेश्वरी महादेव मंदिर भी कहा जाता है।
● अभिलेख से पता चलता है कि मेवाड़ अभियान से लौटते समय जगन्नाथ कछवाहा का देहांत मांडल में हो गया था।
● उनकी स्मृति में यह भव्य छतरी/स्मारक बनवाया गया, जिसकी दीवार पर यह लेख अंकित किया गया।
● यह अभिलेख आमेर–कछवाहों के सैन्य अभियान, मेवाड़–संघर्ष और उनके स्मारक निर्माण की परंपरा को दर्शाता है।
त्रिमुखी बावड़ी का लेख – राजसिंह का अभियान (1675 ई.)
यह प्रशस्ति देबारी के पास स्थित त्रिमुखी बावड़ी में लगी हुई है।
● अभिलेख में महाराणा राजसिंह के समय सर्वऋतु विलास नामक बाग के निर्माण का उल्लेख मिलता है।
● इसमें मालपुरा की विजय, वहाँ से हुई लूट, चारुमति के विवाह और डूंगरपुर की विजय जैसी घटनाओं का उल्लेख है।
● यह लेख राजसिंह के राजनीतिक अभियानों, कूटनीति, राज्य विस्तार और निर्माण–कार्यों की जानकारी देता है।
बीटू (बीडू) गाँव का लेख – राठौड़ वंश के आदि पुरुष सीहा (1273 ई.)
- यह लेख पाली के समीप बीटू गाँव से प्राप्त हुआ है।
● अभिलेख से राव सीहा के व्यक्तित्व, वीरता तथा उसकी मृत्यु की तिथि निश्चित करने में विशेष सहायता मिलती है।
● लेख में उल्लेख है कि मारवाड़ के राठौड़ वंश के आदिपुरुष सीहा, सेतकुँवर का पुत्र था।
● उसकी पत्नी पार्वती ने उसके देहावसान के बाद उसकी स्मृति में एक देवल (स्मारक मंदिर/छतरी) बनवाया, जिसकी दीवार पर यह लेख अंकित है।
● इस लेख के ऊपरी भाग में अश्वारोही सीहा को शत्रु पर भाला मारते हुए दर्शाया गया है, जो उसके शौर्य–गौरव का मूर्त रूप है।
जानासागर प्रशस्ति – जनादे की स्मृति में (राजसिंह काल)
- यह प्रशस्ति उदयपुर के निकट बड़ी गाँव के पास स्थित जानासागर (जलाशय) से संबंधित है।
● यह झील महाराणा राजसिंह ने अपनी माता जनादे की स्मृति में बनवायी थी।
● प्रशस्ति में मेड़ता परिवार को वैष्णव बताया गया है।
● इसमें कुल 41 श्लोक हैं और इसे लक्ष्मीनाथ ने रचा था।
● यह लेख राजसिंह के धार्मिक भाव, मातृ–भक्ति और वैष्णव परंपरा के संरक्षण की ओर संकेत करता है।
बैराठ का लेख – ढूँढाड़ी भाषा में सती–छतरी
- यह लेख बैराठ क्षेत्र से प्राप्त होता है और इसकी भाषा ढूँढाड़ी (राजस्थान की स्थानीय बोली) है।
● अभिलेख से ज्ञात होता है कि यहाँ एक छतरी का निर्माण सावँलदास नामक व्यक्ति ने करवाया।
● सावँलदास गौड़ ब्राह्मण था और उसने मुगल सम्राट औरंगजेब की सेवा में रहकर कार्य किया, जिसके बदले उसे ‘सिंह’ की उपाधि और पीपाड़ की जाँगीर प्रदान की गई।
● छतरी का निर्माण छीतरमल की पत्नी जमना के सती होने की स्मृति में किया गया था, और सावँलदास, छीतरमल का भतीजा था।
● यह अभिलेख सती–प्रथा, स्थानीय भाषा–प्रयोग, तथा मुगल–कालीन जागीर व्यवस्था का अच्छा उदाहरण है।