मेवाड़ राजवंश: गौरवपूर्ण इतिहास
📜 राजवंश की वंशावली और नामकरण
- सूर्यवंशी मूल: मेवाड़ के महाराणाओं को सूर्यवंशी माना जाता है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वंश से संबंधित हैं।
- अन्य महान विभूतियाँ: बुद्ध देव और जैनों के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) भी इसी महान वंश में हुए माने जाते हैं।
- प्राचीन नामकरण: कुश वंश के अंतिम राजा सुमित्र तक के नाम पुराणों में मिलते हैं।
- गुहिल वंश की स्थापना: 568 ई. में प्रतापी राजा गुहिल हुए, जिनके नाम पर गुहिल वंश की नींव पड़ी।
- सिसोदिया नामकरण: गुहिल वंश की एक शाखा सिसोदा गाँव में चली गई, जो आगे चलकर सिसोदिया कहलाए।
✨ राजवंश का गौरव और प्राचीनता
- विश्व का सबसे लंबा राजवंश: उदयपुर राजवंश 568 ई. से शुरू होकर आज़ादी तक, लगभग 1350 वर्षों तक चला, जो विश्व का सबसे लंबा चलने वाला राजवंश है।
- प्राचीन उल्लेख: कन्नौज में हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान, मेवाड़ पर शिलादित्य का शासन था; इसका उल्लेख सामोली गाँव के 646 ई. के शिलालेख से प्राप्त होता है।
- हिंदुआ सूरज: मेवाड़ महाराणाओं को भारत के सभी राजपूत राजा शिरोमणि मानकर पूजते थे, इसलिए इन्हें ‘हिन्दुआ सूरज’ कहा जाता है।
- स्वतंत्रता और धर्मनिष्ठा: मेवाड़ राजवंश ने प्रबल मुस्लिम शक्ति के सामने भी अधीनता स्वीकार नहीं की और अपने मान-सम्मान व कुल गौरव को बचाए रखा।
- राजचिह्न का मंत्र: इनके राजचिह्न पर लिखा है: “जो दृढ़ राखै धर्म को, तिहिं राखै करतार”।
🧐 राजवंश के संबंध में भ्रांतियाँ
- अबुल फजल का भ्रम: अबुल फजल ने मेवाड़ के शासकों को ईरान के बादशाह नौशरवां आदिल की संतान बताया, जिसे इतिहासकार प्रामाणिक नहीं मानते।
- टॉड का कथन: कर्नल टॉड के अनुसार वल्लभी के राजा शिलादित्य का पुत्र गोह (गुहदत्त) मेवाड़ का राजा हुआ, लेकिन यह घटनाएँ नौसेरवां के शासक बनने से पहले की हैं।
- भण्डारकर का मत: डॉ. भण्डारकर ने गुहिलों को वड़नगर के ब्राह्मणों की संतान बताया, लेकिन आहड़ शिलालेख के छठे श्लोक से यह प्रमाणित होता है कि गुहादत्त और उनके वंशज क्षत्रिय थे।
- विभिन्न मत:
- • अबुल फजल और वी.ए. स्मिथ गुहिलों को विदेशी मानते हैं।
- • भण्डारकर और जैन ग्रंथ इन्हें ब्राह्मण बताते हैं।
• औझा और नैणसी इन्हें सूर्यवंशी कहते हैं।
🚩 गुहिल वंश की मुख्य शाखाएँ
शाखा | स्थापना | संस्थापक |
मेवाड़ | 566 ई. | गुहिल |
वागड़ (डूंगरपुर) | 1178 ई. | सामन्तसिंह |
देवलिया-प्रतापगढ़ | 1473 ई. | सूरजमल |
बाँसवाड़ा | 1518 ई. | जगमाल |
शाहपुरा | 1613 ई. | सुजानसिंह |
मेवाड़ राजवंश के प्रमुख शासक
🗿 संस्थापक: गुहिलादित्य (गुहेदत्त)
- समय: 565-66 ई.
- पद: गुहिल वंश के संस्थापक, आदि पुरुष या मूल पुरुष।
- जनश्रुति: रानी पुष्पावती के पुत्र गुहेदत्त को कमलावती नामक नागर ब्राह्मणी ने पाला था।
- शासन: गुहादित्य ने 565-66 ई. में भीलों से ईडर का राज्य छीना और नागदा को अपनी राजधानी बनाया।
⚔️ बप्पा रावल (काल भोज) (734-756 ई.)
- मूल नाम: बप्पा रावल का मूल नाम काल भोज था।
- राजप्राप्ति: जनश्रुति के अनुसार, बप्पा ने हारीत ऋषि की सेवा की, जिन्होंने उन्हें अपने ईष्ट देव एकलिंग जी से मेवाड़ का राज्य दिलाया।
- वास्तविक संस्थापक: बप्पा ने 734 ईस्वी में मौर्य (मोरी वंश) शासक मानमोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
- उपाधि: बप्पा को मेवाड़ राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- धार्मिक कार्य:
- • इन्होंने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंग जी का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया, जो मेवाड़ वालों के ईष्ट देव हैं।
- • एकलिंग जी का मंदिर पशुपात सम्प्रदाय या लकुलिश सम्प्रदाय का एकमात्र स्थल है।
- • मेवाड़ के राणा स्वयं को दीवान मानते हैं और युद्ध से पहले एकलिंग जी का आशीर्वाद (आसका मांगना) लेते हैं।
- मृत्यु और छतरी: बप्पा की मृत्यु नागदा में हुई और उनकी छतरी भी नागदा में ही स्थित है।
सिक्का: बप्पा रावल सोने के सिक्के जारी करने वाले मेवाड़ के पहले शासक थे, जिनका वजन 115 ग्रेन था।
⚔️ बप्पा रावल (काल भोज) (734-756 ई.)
- मूल नाम: बप्पा रावल का मूल नाम काल भोज था।
- राजप्राप्ति: जनश्रुति के अनुसार, बप्पा ने हारीत ऋषि की सेवा की, जिन्होंने उन्हें अपने ईष्ट देव एकलिंग जी से मेवाड़ का राज्य दिलाया।
- वास्तविक संस्थापक: बप्पा ने 734 ईस्वी में मौर्य (मोरी वंश) शासक मानमोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
- उपाधि: बप्पा को मेवाड़ राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- धार्मिक कार्य:
- • इन्होंने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंग जी का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया, जो मेवाड़ वालों के ईष्ट देव हैं।
- • एकलिंग जी का मंदिर पशुपात सम्प्रदाय या लकुलिश सम्प्रदाय का एकमात्र स्थल है।
- • मेवाड़ के राणा स्वयं को दीवान मानते हैं और युद्ध से पहले एकलिंग जी का आशीर्वाद (आसका मांगना) लेते हैं।
- मृत्यु और छतरी: बप्पा की मृत्यु नागदा में हुई और उनकी छतरी भी नागदा में ही स्थित है।
सिक्का: बप्पा रावल सोने के सिक्के जारी करने वाले मेवाड़ के पहले शासक थे, जिनका वजन 115 ग्रेन था।
🗡️ रावल रतनसिंह (1302 से 1303) और चित्तौड़ का प्रथम साका
- पद: रावल शाखा के अंतिम शासक थे।
- उनके शासनकाल में दिल्ली पर क्रूर शासक अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड़ पर 1303 ई. में आक्रमण किया।
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण:
- अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य विस्तार की असीम लालसा ने उसे मेवाड़ की ओर आकर्षित किया।
- चित्तौड़, गुजरात और मालवा के मार्ग में स्थित था, जो इसे एक रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाता था।
- चित्तौड़ का व्यापारिक और सामरिक दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण था, जो इस आक्रमण का एक बड़ा कारण था।
- चित्तौड़ दुर्ग अभेद्य था और उसमें अनेक विशेषताएँ थीं, जो उसे शक्तिशाली बनाती थीं।
- पद्मावत ग्रंथ के अनुसार, रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की अलाउद्दीन की प्रबल आकांक्षा थी।
अलाउद्दीन का आक्रमण (1303 ई.)
अलाउद्दीन ने 28 जनवरी, 1303 को दिल्ली से चित्तौड़ की ओर प्रस्थान किया। इस आक्रमण में उन्होंने गम्भीरी और बेड़च नदियों के बीच शिविर लगाकर किले की घेराबंदी की। यह घेरा लगभग 8 महीने तक चला।
- इस दौरान, सीसोदे के सामन्त लक्ष्मणसिंह ने अपने 7 पुत्रों के साथ किले की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह घटना मेवाड़ की वीरता और आत्मबलिदान को दर्शाती है।
- रतनसिंह को बंदी बना लिया गया था, जो नाभिनन्द जिनोद्धार से सिद्ध होता है।
- लम्बे घेरे के बाद, राजपूतों ने केसरिया बाना पहनकर किले के द्वार खोल दिए और अंत में 1600 रानियों ने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु जौहर किया। इस प्रकार, चित्तौड़गढ़ का प्रथम शाका पूर्ण हुआ।
चित्तौड़ के बाद के घटनाक्रम:
चित्तौड़ विजय के बाद, अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का शासक खिज्र खाँ नियुक्त किया। खिज्र खाँ ने चित्तौड़ में गम्भीरी नदी के तट पर एक पुल का निर्माण करवाया और कई मंदिरों को ध्वस्त कर मस्जिदें बनवाईं।
नोट
अमीर खुसरो खिलजी के आक्रमण के समय उनके सैन्य अभियान में साथ थे।
🏰 चित्तौड़गढ़ दुर्ग
- गौरव: इसे वीरता, शौर्य, त्याग और राजस्थान का गौरव माना जाता है।
- आकार: इस दुर्ग का आकार व्हेल मछली के समान है।
- स्थिति: यह गम्भीरी तथा बेड़च नदियों के संगम स्थल पर और मेसा के पठार पर स्थित है।
- निर्माण: श्यामलदास के अनुसार, इसका निर्माण चित्रांगद मौर्य ने करवाया था।
- प्रवेश द्वार: दुर्ग के 7 प्रवेश द्वार हैं, जिनमें पाडनपोल सबसे बड़ा है।
स्मारक: विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, पद्मिनी महल, कुम्भा के महल, मीरा मंदिर, गोरा-बादल के महल आदि यहाँ स्थित हैं।
चित्तौड़ के तीन साके:
साका | सन् | आक्रमणकारी | शासक | जौहर नेतृत्व |
प्रथम | 1303 | अलाउद्दीन खिलजी | रतनसिंह | पद्मिनी (1600 रानियाँ) |
द्वितीय | 1534-35 | बहादुरशाह | विक्रमादित्य | कर्मावती (13000 रानियाँ) |
तृतीय | 1567-68 | अकबर | उदयसिंह | फूलकंवर (700 रानियाँ) |
पद्मावत: एक प्रेमगाथा या इतिहास?
मलिक मुहम्मद जायसी की कालजयी रचना, ‘पद्मावत’, 1540 ई. में शेरशाह सूरी के समय अवधी भाषा में लिखी गई थी। यह एक प्रेम कहानी है जिसने सदियों से लोगों को मंत्रमुग्ध किया है।
पद्मावती और राजा रतनसिंह की कहानी
- सिंहलद्वीप की राजकुमारी: सिंहलद्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री पद्मावती, अपने अलौकिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध थीं। उनके पास हीरामन नाम का एक तोता था।
- तोते का चित्तौड़ पहुँचना: यह तोता उड़कर एक शिकारी के पास पहुँचा, जिसने उसे एक ब्राह्मण को बेच दिया। ब्राह्मण ने उसे चित्तौड़ के राजा रतनसिंह को एक लाख रुपये में बेच दिया।
- पद्मावती का बखान: रतनसिंह की रानी ने अपने सौंदर्य का घमंड किया, तो तोते ने पद्मावती के रूप का वर्णन किया। यह सुनकर राजा रतनसिंह पद्मावती के प्रेम में इतने मोहित हो गए कि वे योगी बनकर सिंहलद्वीप चले गए।
- योगी राजा का मिलन: अनेक राजकुमारों के साथ, राजा रतनसिंह ने कई संकटों का सामना किया और आखिरकार सिंहलद्वीप पहुँचे। तोते ने पद्मावती को राजा के बारे में बताया, जिससे पद्मावती भी उनसे प्रेम करने लगीं।
- प्रेम और विवाह: वसंत पंचमी के दिन एक मंदिर में दोनों की मुलाकात हुई। बाद में, पकड़े जाने पर रतनसिंह को सूली पर चढ़ाने का आदेश मिला, लेकिन जब राजा गंधर्वसेन को सच्चाई पता चली, तो उन्होंने पद्मावती का विवाह रतनसिंह से करवा दिया।
नागमती का विरह और राघव चेतन का छल
- नागमती का संदेश: चित्तौड़ की पटरानी नागमती अपने पति के विरह में व्याकुल थीं। उन्होंने एक पक्षी के माध्यम से अपना विरह संदेश रतनसिंह तक पहुँचाया।
- राघव चेतन का देश निकाला: चित्तौड़ लौटने पर रतनसिंह अपनी दोनों रानियों के साथ शांतिपूर्वक जीवन बिताने लगे। तभी राघव चेतन नामक एक विद्वान और जादूगर ब्राह्मण का आगमन हुआ। उसकी तंत्र-मंत्र की कला का पता चलने पर रतनसिंह ने उसे देश निकाला दे दिया।
- पद्मिनी का कंगन: पद्मावती ने राघव चेतन को दक्षिणा देने के लिए बुलाया और झरोखे से अपना कंगन उसकी झोली में डाल दिया। कंगन की चमक से राघव चेतन इतना मुग्ध हो गया कि वह मूर्छित हो गया।
- अलाउद्दीन खिलजी की लालसा: राघव चेतन दिल्ली पहुँचा और उसने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सामने पद्मावती के सौंदर्य का ऐसा बखान किया कि अलाउद्दीन भी उन पर मोहित हो गया।
अलाउद्दीन का चित्तौड़ पर आक्रमण
- युद्ध की शुरुआत: अलाउद्दीन ने रतनसिंह को एक पत्र भेजकर पद्मावती को सौंपने की माँग की। स्वाभिमानी राजा रतनसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और दूत को निकाल दिया।
- आठ साल का घेरा: अलाउद्दीन ने क्रोधित होकर चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी और आठ साल तक घेराबंदी की, लेकिन वह किले को जीत नहीं सका। दिल्ली में संकट की खबर मिलने पर उसने छल का सहारा लिया।
- दर्पण का धोखा: अलाउद्दीन ने संधि का बहाना बनाया। रतनसिंह ने उसका आतिथ्य किया। इसी दौरान, एक दर्पण में पद्मावती का प्रतिबिंब देखकर अलाउद्दीन और भी उन्मादित हो गया।
- रतनसिंह की कैद: रतनसिंह जब अलाउद्दीन को छोड़ने किले से बाहर निकले, तो सुल्तान ने धोखे से उन्हें बंदी बना लिया और पद्मावती को सौंपने पर ही रिहा करने की शर्त रखी।
गोरा-बादल की वीरता और जौहर
- साध्वी का छल: पद्मावती तक यह खबर पहुँचाने के लिए अलाउद्दीन ने एक सुंदर वेश्या को साध्वी के वेश में भेजा। राजा के कष्टों का समाचार सुनकर पद्मावती ने अपने चाचा गोरा और भाई बादल के साथ मिलकर एक योजना बनाई।
- पालकियों का षड्यंत्र: पद्मावती ने 1600 पालकियों में अपनी सखियों के भेष में वीर राजकुमारों को बिठाया और दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने अलाउद्दीन को बताया कि वह राजा से एक घड़ी मिलना चाहती हैं।
- रतनसिंह की मुक्ति: पालकियों में छिपे राजपूतों ने राजा को मुक्त कराया। गोरा ने अलाउद्दीन की सेना से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की, जबकि बादल राजा और रानी को सकुशल चित्तौड़ ले आए।
- जौहर: अलाउद्दीन ने दोबारा आक्रमण किया। जब राजपूतों को लगा कि वे हार जाएँगे, तो पद्मावती, नागमती और अन्य रानियों ने जौहर कर अपने सतीत्व की रक्षा की। अंत में, राजपूत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए और चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का कब्जा हो गया।
‘पद्मावत’ एक रूपक कथा
- जायसी का संदेश: जायसी ने इस कथा को एक रूपक बताया है। उन्होंने कहा है कि चित्तौड़ शरीर का, राजा रतनसिंह मन का, सिंहलद्वीप हृदय का, पद्मावती बुद्धि का, और तोता गुरु का प्रतीक है।
- राघव चेतन और अलाउद्दीन: राघव चेतन शैतान का और सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी माया का प्रतीक है। जायसी चाहते थे कि पाठक इस कहानी को इसी दृष्टि से देखें।
ऐतिहासिक साक्ष्यों से भिन्नता
- इतिहास बनाम कविता: जायसी की ‘पद्मावत’ एक कविताबद्ध कथा है, न कि एक पूर्णतः ऐतिहासिक दस्तावेज। इसे इतिहास के तौर पर मानना उचित नहीं है।
- प्रमुख भिन्नताएँ:
- राजा रतनसिंह ने एक वर्ष भी राज्य नहीं किया था, इसलिए उनका योगी बनकर सिंहलद्वीप जाना संभव नहीं लगता।
- अलाउद्दीन ने आठ साल तक नहीं, बल्कि केवल छह महीने तक घेराबंदी की थी।
- कथा में वर्णित सिंहलद्वीप का राजा गंधर्वसेन ऐतिहासिक रूप से मौजूद नहीं था।
- कथा में कुंभलगढ़ के राजा देवपाल का जिक्र है, जबकि उस समय तक कुंभलगढ़ का निर्माण ही नहीं हुआ था।
टॉड और फिरिश्ता की कथाएँ
- फिरिश्ता का ‘तारिख फिरिश्ता’: मुहम्मद कासिम फिरिश्ता ने पद्मावत के लगभग 70 साल बाद अपनी पुस्तक लिखी। उन्होंने भी पद्मावती की कहानी को अपने तरीके से पेश किया, जिसमें पद्मावती को राजा की पुत्री बताया गया था।
- कर्नल टॉड का लेखन: कर्नल जेम्स टॉड ने भी मेवाड़ के भाटों की कथाओं के आधार पर पद्मावती की कहानी लिखी। उन्होंने पद्मावती का संबंध राजा भीमसिंह से जोड़ा और लक्ष्मणसिंह को बालक राजा बताया, जो ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार गलत है।
निष्कर्ष: इन सभी कथाओं का मूल आधार एक ही है: अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की, राजा रतनसिंह युद्ध में मारे गए, और रानी पद्मावती ने जौहर किया। बाकी सभी विवरण संभवतः काल्पनिक हैं।
मालदेव सोनगरा (1311 ई. से 1321 ई. तक) के बारे में:
- मालदेव रतनसिंह का भांजा था और कान्हड़देव का भाई था।
- अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद सल्तनत का प्रशासन कमजोर हो गया, और मालदेव ने इस अवसर का लाभ उठाया।
- 1321 ई. में सिसोदा ठिकाने के हम्मीर ने मालदेव को पराजित कर दिया और उसके बाद मालदेव का निधन हो गया।
- 1326 ई. में, हम्मीर ने मालदेव के पुत्र बलबीर से मेवाड़ छीन लिया।
राणा हम्मीर (1326 ई. - 1364 ई.)
- हम्मीर का जन्म: हम्मीर का जन्म एक चंदणा राजपूत लड़की से हुआ था, जो मेवाड़ के राजकुमार अरिसिंह की पत्नी थीं। अरिसिंह उनकी वीरता और साहस से प्रभावित होकर उनसे विवाह किया था।
- बचपन और ननिहाल: पिता के भय से अरिसिंह ने अपनी पत्नी और पुत्र हम्मीर को ऊनवा गाँव में रखा था, जहाँ हम्मीर का पालन-पोषण हुआ।
- मुंझा का वध: अरिसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई अजयसिंह ने हम्मीर को अपने पास बुलाया। हम्मीर ने गोंडवाड़ के लुटेरे मुंझा बालेचा को मारकर अपना शौर्य सिद्ध किया।
- उत्तराधिकारी का चयन: हम्मीर की वीरता से प्रसन्न होकर अजयसिंह ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। अजयसिंह के पुत्र, सज्जनसिंह और क्षेमसिंह, इससे नाराज होकर दक्षिण चले गए।
- मेवाड़ का उद्धारक: अजयसिंह की मृत्यु के बाद, हम्मीर ने चित्तौड़ और पूरे मेवाड़ पर अधिकार कर लिया। इसी कारण उन्हें “मेवाड़ का पुनः उद्धारक” कहा जाता है। उन्होंने महाराणा की उपाधि धारण की।
राणा हम्मीर की उपलब्धियाँ
- सिंगोली का युद्ध: हम्मीर ने मालदेव के पुत्र जैसा को हराया, जिसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद तुगलक से मदद ली। सिंगोली के युद्ध में हम्मीर ने सुल्तान को हराकर तीन महीने तक कैद में रखा।
- मंदिर निर्माण: हम्मीर ने चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता का मंदिर बनवाया।
- सिसोदिया राजवंश के संस्थापक: हम्मीर को सिसोदिया राजवंश का संस्थापक माना जाता है।
- प्रशंसा और उपाधियाँ:
- गीतगोविन्द पर कुम्भा की टीका “रसिकप्रिया” में उन्हें “वीर राजा” कहा गया है।
- कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में उन्हें “विषमघाटी पंचानन” (विकट आक्रमणों में सिंह के समान) कहा गया है।
राणा हम्मीर की उपलब्धियाँ
कर्नल टॉड ने उन्हें “प्रबल हिन्दू राजा” कहा है।
राणा मोकल (1421 ई. - 1433 ई.)
- मोक्कल ने चित्तौड़ दुर्ग में समाधीश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।
- जब राणा लाखा का निधन हुआ, तब मोक्कल की उम्र लगभग 12 साल थी।
- राज्य का सारा कामकाज उनके चाचा चूंडा संभालते थे।
- मोक्कल की मां हंसाबाई को चूंडा पर शक हुआ कि कहीं वह राज्य पर अधिकार न कर लें।
- जब चूंडा को इस बात का पता चला, तो वह अपमानित होकर माण्डू (मालवा) चले गए।
- हंसाबाई ने जल्द ही अपने भाई रणमल को मारवाड़ से बुलाकर मेवाड़ में ऊँचे पद दिए, जिससे दरबार में राठौड़ों का प्रभाव बढ़ने लगा।
महाराणा मोक्कल की मृत्यु
- 1433 ई. में अहमदाबाद के सुल्तान अहमदशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया।
- मोक्कल अपनी सेना के साथ उसे रोकने गए। उनके साथ पासवान के पुत्र चाचा और मेरा भी थे।
- एक हाड़ा सरदार के कहने पर मोक्कल ने एक पेड़ की ओर इशारा करके चाचा और मेरा से उसका नाम पूछा।
- चाचा और मेरा इस बात को अपना अपमान समझ बैठे, क्योंकि वे खातिन के पुत्र थे और खाति जाति ही पेड़ों की पहचान करती है।
- उन्होंने मोक्कल को मारने का फैसला किया और महपा परमार जैसे कई लोगों को अपने साथ मिला लिया।
- इन लोगों ने मोक्कल के शिविर में हमला किया, जिसमें मोक्कल सहित उनके कई सैनिक मारे गए।
राणा कुंभा (1433-1468 ई.)
- पिता मोक्कल और माता परमार राजकुमारी सौभाग्य देवी थीं।
- इनके दादा का नाम राणा लाखा था।
ऐतिहासिक स्रोत
- कुंभा से संबंधित लगभग 60 अभिलेख हैं, लेकिन प्रमुख स्रोत नीचे दिए गए हैं।
राजवर्णन (एकलिंग माहात्म्य का भाग-1)
- यह कुंभा द्वारा लिखा गया था।
- इसका दूसरा भाग कान्ह व्यास ने कुंभा के निर्देश पर लिखा था।
रसिक प्रिया
- यह जयदेव के गीत गोविन्द ग्रंथ पर कुंभा द्वारा लिखी गई एक टीका (व्याख्या) है।
- इसमें कुंभा की उपाधियों और उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.)
- यह कुंभलगढ़ दुर्ग के मामादेव मंदिर में स्थापित है।
- इसके रचयिता महेश थे।
- इसमें कुंभा की राजनीतिक विजयों, राज्य विस्तार और सांस्कृतिक उपलब्धियों का वर्णन है।
- इसमें कुंभा को धर्म और पवित्रता का अवतार कहा गया है।
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.)
- इसके रचयिता अत्रि और महेश थे, जिन्हें “अभिकवि” भी कहा जाता है।
- यह विजय स्तम्भ की नौवीं मंजिल पर उत्कीर्ण है।
- यह कुंभा की विजयों, उपाधियों और उनके द्वारा रचित ग्रंथों की जानकारी देती है।
- इसमें राणा हम्मीर से लेकर कुंभा तक का इतिहास मिलता है, और हम्मीर को “विषम घाटी पंचानन” कहा गया है।
राणा कुंभा की उपाधियाँ
- हालगुरू: पहाड़ी किलों के स्वामी होने के कारण।
- राणारासो: साहित्यकारों के आश्रयदाता होने के कारण।
- राजगुरू: राजनीति में निपुण होने के कारण।
- अभिनवभर्त्ताचार्य: संगीत में विशाल ज्ञान के कारण। कुंभा एक वीणा वादक भी थे।
- हिन्दू सुल्तान: तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों और सुल्तानों द्वारा दी गई उपाधि।
- चापगुरू: धनुर्विद्या में निपुण होने के कारण।
- शैल गुरू: पर्वतों के स्वामी।
- दान गुरू: दानवीर होने के कारण।
- परम गुरू: राजाओं में सबसे बड़े गुरु होने के कारण।
- कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में कुंभा को “नव्य भारत” भी कहा गया है।
राणा कुंभा प्रारंभिक चुनौतियाँ
- पिता मोक्कल की हत्या से राज्य की आंतरिक स्थिति कमजोर हो गई थी।
- मालवा, गुजरात और नागौर के मुस्लिम शासक मेवाड़ पर अधिकार करने की कोशिश कर रहे थे।
राणा कुंभा के प्रमुख अभियान
1. मारवाड़ समस्या
- चाचा और मेरा का दमन: कुंभा ने रणमल की सहायता से चाचा और मेरा को मरवा डाला। रणमल और राघवदेव के बीच विवाद के कारण मेवाड़ दरबार में राठौड़ और सिसोदिया गुट बन गए।
- रणमल की हत्या: रणमल मेवाड़ पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा था, जिससे सिसोदिया सरदार चिंतित थे। आखिरकार, भारमली के सहयोग से महपा और अक्का ने रणमल की हत्या कर दी।
- आवल-बावल संधि (1453-54 ई.): रणमल के पुत्र जोधा और कुंभा के बीच यह संधि हुई। इस संधि से मारवाड़ और मेवाड़ की सीमा तय हुई और जोधा ने अपनी पुत्री शृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से कर दिया। शृंगार देवी ने चित्तौड़ में घौसुण्डा बावड़ी बनवाई थी।
2. सिरोही और बूँदी विजय
- कुंभा ने आबू के शासक सैसमल देवड़ा को हराकर सिरोही पर अधिकार कर लिया।
- रणमल के नेतृत्व में बूँदी के शासक बेरीशाल को हराकर गागरोन (झालावाड़) और माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) पर कब्जा किया।
3. मालवा-गुजरात के मुस्लिम शासकों से संघर्ष
- सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): इस युद्ध में कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को हराया। इस जीत की खुशी में कुंभा ने विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया।
- नागौर की लड़ाई: कुंभा ने शम्स खां को हराकर नागौर पर अधिकार कर लिया। इससे नाराज होकर शम्स खां ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन से मदद ली, लेकिन कुंभा ने उसे भी हरा दिया।
- चम्पानेर की संधि (1456-57 ई.): महमूद खिलजी और कुतुबुद्दीन ने मिलकर कुंभा के खिलाफ एक संधि की, लेकिन वे कुंभा को हराने में असफल रहे।
कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
स्थापत्य कला
- कुंभा को राजस्थान स्थापत्य कला का जनक माना जाता है।
- वीर विनोद ग्रंथ के अनुसार, कुंभा ने मेवाड़ के 84 में से 32 किलों का निर्माण करवाया।
- प्रमुख दुर्ग: कुंभलगढ़, अचलगढ़, बंसती, बैराठ, भोमठ और मचान दुर्ग।
- चित्तौड़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता कुंभा को ही माना जाता है।
विजय स्तम्भ
- इसे विष्णु ध्वज और मूर्तियों का अजायबघर भी कहा जाता है।
- कुंभा ने 1437 ई. की सारंगपुर विजय के उपलक्ष्य में इसका निर्माण 1440-1448 ई. के बीच करवाया।
- यह 9 मंजिल की इमारत है, जिसकी ऊँचाई 122 फीट है और इसमें 157 सीढ़ियाँ हैं।
- इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार “अल्लाह” शब्द लिखा है।
- यह राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न है।
- 1949 में इस पर डाक टिकट जारी किया गया था।
- कर्नल टॉड ने इसे कुतुबमीनार से श्रेष्ठ बताया था।
मंदिर निर्माण
- कुंभा स्वामी मंदिर: कुंभा ने अपने प्रत्येक दुर्ग में इस मंदिर का निर्माण करवाया।
- शृंगार चंवरी मंदिर: यह कुंभा की पुत्री रमाबाई के विवाह की चंवरी थी, जो बाद में 17वें जैन तीर्थंकर शांतिनाथ के मंदिर में बदल गई।
- रणकपुर के जैन मंदिर: पाली में स्थित इन मंदिरों का निर्माण कुंभा के समय जैन व्यापारी धरणकशाह ने करवाया था। इनका वास्तुकार देपाक था।
- मीरा मंदिर: चित्तौड़ दुर्ग में स्थित इस श्याम मंदिर का निर्माण भी कुंभा ने ही करवाया था।
साहित्यिक उपलब्धियाँ
- कुंभा स्वयं एक अच्छे वीणा वादक थे।
- उनके संगीत गुरु सारंग व्यास थे।
कुंभा द्वारा रचित ग्रंथ
- संगीत राज: संगीत का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ, जिसमें संगीत की तीनों विधाओं (गीत, वाद्य, नृत्य) का समावेश है।
- संगीत मीमांसा
- कामराज रतिसार (कामशास्त्र पर आधारित)
- सुड़ प्रबंध
कुंभा के दरबारी विद्वान
- कान्हा व्यास: एकलिंग माहात्म्य के रचनाकार।
- अत्रि और महेश: कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के रचयिता।
- मण्डन: कुंभा के सर्वश्रेष्ठ शिल्पी और कुंभलगढ़ दुर्ग के वास्तुकार थे। उनके ग्रंथों में राजवल्लभ, प्रासाद मण्डन और वास्तुमण्डन प्रमुख हैं।
- रमाबाई: कुंभा की पुत्री जो एक विदुषी महिला थीं, उन्हें “वागीश्वरी” भी कहा जाता था।
महाराणा कुंभा की मृत्यु
- अपने अंतिम दिनों में कुंभा को उन्माद रोग हो गया था।
- 1468 ई. में कुंभलगढ़ दुर्ग के मामादेव कुंड पर उनके पुत्र ऊदा (उदा) ने उनकी हत्या कर दी।
महाराणा उदा/उदयसिंह (1468-1473 ई)
- उदा को मेवाड़ का “पितृहंता” कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने पिता राणा कुंभा की हत्या की थी।
- इस कृत्य के कारण, मेवाड़ के सरदारों ने उन्हें शासक के रूप में स्वीकार नहीं किया।
- सरदारों ने राव चूंडा के पुत्र कांधल की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया कि उदा के छोटे भाई रायमल को अगला राणा बनाया जाएगा।
- रायमल उस समय अपने ससुराल ईडर में थे। उन्हें बुलाया गया और उन्होंने सेना के साथ उदा पर आक्रमण कर दिया।
- जावर और दाड़िगंपुर में हुए युद्धों में रायमल की जीत हुई और उन्होंने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
- उदा भागकर कुंभलगढ़ चले गए, लेकिन वहाँ से भी उन्हें भगा दिया गया।
- इसके बाद, वह अपने पुत्रों सेसमल और सूरजमल के साथ पहले सोजत और फिर बीकानेर गए।
- अंत में, उदा ने माण्डू के सुल्तान ग्यासशाह की शरण ली, जहाँ बिजली गिरने से उनकी मृत्यु हो गई।
राणा रायमल (1473-1509 ई.)
- रायमल की 11 रानियां, 13 पुत्र और 2 पुत्रियां थीं।
- उनके प्रमुख पुत्रों में पृथ्वीराज, जयमल, और संग्राम सिंह (सांगा) शामिल थे।
- रायमल ने सुथार अर्जुन की देखरेख में एकलिंग जी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और रामशंकर, समयासंकट जैसे तालाब भी बनवाए।
उत्तराधिकारी संघर्ष
- एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि संग्राम सिंह को ही राजयोग है।
- इस पर पृथ्वीराज ने नाराज होकर तलवार से सांगा पर हमला किया, जिससे सांगा की एक आँख फूट गई।
- चौड़ा के चाचा सारंगदेव ने भीमलगांव की चारणी से भी यही भविष्यवाणी सुनी।
- पृथ्वीराज और जयमल ने मिलकर सांगा को मारने की कोशिश की। सांगा वहाँ से भाग निकले और श्रीनगर (अजमेर) के कर्मचंद पंवार के यहाँ शरण ली।
- सांगा ने बाद में कर्मचंद पंवार की पुत्री से विवाह किया। जब सांगा राणा बने, तो उन्होंने कर्मचंद को “रावत” की उपाधि दी।
जयमल की मृत्यु
- टोडा (टोंक) के शासक सोलंकी राव सुल्तान थे, जिन पर लल्ला खाँ ने अधिकार कर लिया था।
- सुल्तान की पुत्री ताराबाई बहुत सुंदर थीं। जयमल ने उनसे विवाह करने की शर्त रखी कि वह उन्हें पहले दिखा दें, जिसे सुल्तान ने अपमानजनक माना।
- जयमल ने बदनौर पर हमला किया, जहाँ राव सुल्तान ने शरण ली थी।
- जयमल और सुल्तान के साले सांखला रत्नसिंह के बीच युद्ध हुआ, जिसमें दोनों मारे गए।
पृथ्वीराज और ताराबाई
- राव सुल्तान ने घोषणा की कि वह अपनी पुत्री ताराबाई का विवाह उसी से करेंगे जो उसे टोडा वापस दिलाएगा।
- पृथ्वीराज ने लल्ला खाँ पर हमला किया और उसे मार दिया।
- पृथ्वीराज ने लल्ला खाँ की सहायता के लिए आए अजमेर के सूबेदार मालू खाँ को भी हरा दिया।
- शर्त के अनुसार, पृथ्वीराज ने ताराबाई से विवाह किया और अजमेर दुर्ग का नाम उनकी पत्नी के नाम पर तारागढ़ कर दिया।
पृथ्वीराज की मृत्यु
- पृथ्वीराज की बहन आनंदा बाई का विवाह सिरोही के राव जगमाल से हुआ था, जो उन्हें परेशान करते थे।
- पृथ्वीराज जगमाल को समझाने के लिए सिरोही गए, लेकिन वापस आते समय जगमाल ने उन्हें धोखे से जहर मिली हुई गोलियां दे दीं।
- कुंभलगढ़ के पास इन गोलियों को खाने से पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।
- उन्हें “उड़ना” पृथ्वीराज भी कहा जाता था, क्योंकि वह बहुत तेज थे। कुंभलगढ़ दुर्ग में उनकी 12 खंभों की छतरी बनी हुई है।
राजपूतों में स्त्रियों की स्थिति (परिवर्तन)
- महारानी/राजमाता: मुख्य रानी।
- खवासल/पासवान: वह दासी जिसे राजा आभूषण पहनने की अनुमति देते थे। यह मुख्य रानी के बाद प्रमुख होती थी।
- पड़दायल: वह दासी जिसे राजा उपपत्नी के रूप में स्वीकार करते थे।
- डावड़ी/दावड़ी: वह दासी जो राजा की पत्नी तो होती थी, लेकिन उसे पत्नी का दर्जा प्राप्त नहीं था।
अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ
- चित्तौड़ी बेगम: 1503 ई. में मालवा के शासक नसिरुद्दीन ने मेवाड़ पर आक्रमण कर राणा रायमल के सामंत भवानीदास की पुत्री से विवाह कर लिया, जो बाद में चित्तौड़ी बेगम कहलाई।
- सूरजमल: ये राणा कुंभा के छोटे भाई खेमकरण के पुत्र थे। इन्होंने कांठल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, जो बाद में प्रतापगढ़ राज्य बना।
महाराणा संग्राम सिंह/सांगा (1509-1528 ई.)
- कर्नल टॉड ने इन्हें “सैनिकों का भग्नावशेष” कहा क्योंकि इनके शरीर पर 80 घाव थे।
- इन्हें “हिन्दूपथ” या “हिन्दुपति” भी कहा जाता था।
- याद रखें: हिंदू सुल्तान कुंभा को, हिंदू बादशाह मालदेव को और हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को कहा जाता है।
राज्याभिषेक और प्रारंभिक जीवन
- जब राणा रायमल बीमार हुए, तो उन्हें सांगा के श्रीनगर (अजमेर) में होने की जानकारी मिली।
- रायमल की मृत्यु के बाद, 4 मई 1509 को सांगा मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे।
- उन्होंने अपने आश्रयदाता कर्मचंद पंवार को अजमेर की जागीर, “रावत” की उपाधि और प्रथम श्रेणी के सरदार का दर्जा दिया।
प्रमुख संघर्ष और युद्ध
1. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
- जब सांगा गद्दी पर बैठे, दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी थे। उनकी मृत्यु के बाद इब्राहिम लोदी सुल्तान बना।
- खातौली का युद्ध (1518 ई.): कोटा में हुए इस युद्ध में सांगा ने इब्राहिम लोदी को बुरी तरह हराया। युद्ध में सांगा का एक हाथ कट गया और वह हमेशा के लिए लंगड़े हो गए। इस विजय के बाद भी, सांगा ने अपने घावों के कारण खुद को सिंहासन के योग्य नहीं समझा, लेकिन सरदारों के आग्रह पर वह दोबारा गद्दी पर बैठे।
- बांडी (धौलपुर) का युद्ध (1519 ई.): इब्राहिम लोदी ने अपनी पिछली हार का बदला लेने के लिए सेना भेजी, लेकिन सांगा ने इस युद्ध में भी उन्हें हरा दिया। इस जीत के बाद सांगा ने मालवा के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।
2. मालवा से संघर्ष
- मालवा के शासक महमूद खिलजी-II और उनके प्रधानमंत्री मेदिनी राय के बीच मतभेद हो गए।
- मेदिनी राय ने सांगा से मदद मांगी, और सांगा ने उन्हें गागरोन और चंदेरी की जागीरें दीं।
- गागरोन का युद्ध (1519 ई.): महमूद खिलजी ने मेदिनी राय को दंडित करने के लिए गागरोन पर आक्रमण किया। इस युद्ध में सांगा ने गुजरात की सेना के सहयोग से आए महमूद खिलजी को बुरी तरह हराया और उसे 3 महीने तक बंदी बनाकर रखा।
- सांगा ने बाद में महमूद खिलजी को रिहा कर दिया और उसे सम्मानपूर्वक मालवा की गद्दी पर बैठाया।
3. गुजरात से संघर्ष
- संघर्ष का मुख्य कारण ईडर राज्य के उत्तराधिकार का विवाद था।
- सांगा ने अपने सहयोगी रायमल को ईडर का शासक बनवाया।
- गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने भारमल का समर्थन किया और सांगा को अपमानित किया।
- सांगा ने जोधपुर के राव गांगा और मेड़ता के बीरमदेव जैसे सरदारों की मदद से गुजरात पर आक्रमण कर अहमदनगर को जीत लिया।
- इससे मुजफ्फर शाह नाराज होकर वापस चला गया, लेकिन 1520 ई. में उसने दोबारा हमला किया। मंदसौर के पास हुई लड़ाई में भी सांगा ने गुजरात की सेना को संधि करने पर मजबूर कर दिया।
बाबर का भारत में आगमन
- बाबर, काबुल का शासक था, जो तैमूर लंग और चंगेज खाँ दोनों के वंश का था।
- बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि उन्हें भारत पर आक्रमण करने का न्योता दौलत खाँ लोदी, आलम खाँ लोदी और महाराणा सांगा ने दिया था।
- पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526 ई.): बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। इस युद्ध में बाबर ने तोपखाने और तुलुगमा पद्धति का इस्तेमाल किया।
- युद्ध जीतने के बाद, बाबर ने ‘कलंदर’ की उपाधि धारण की।
बयाना और खानवा का युद्ध
बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई.)
- बाबर ने आगरा के पास बयाना दुर्ग पर कब्जा कर लिया, जिसे सांगा ने एक सीधी चुनौती माना।
- सांगा ने अपनी विशाल सेना के साथ बयाना पर हमला किया और मुगलों को बुरी तरह हराया।
- इस हार के बाद मुगल सैनिकों का मनोबल गिर गया था।
खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.)
- बाबर ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए शराब न पीने की कसम खाई, ‘तमगा’ कर माफ किया और इसे ‘जिहाद’ (धर्म युद्ध) घोषित किया।
- युद्ध में बाबर ने तोपखाने और तुलुगमा पद्धति का इस्तेमाल किया, जिसका राजपूतों को कोई अनुभव नहीं था।
- युद्ध के दौरान सांगा के सिर में एक तीर लगा और वे मूर्छित हो गए।
- झाला अज्जा ने सांगा का राजचिह्न धारण कर युद्ध जारी रखा, लेकिन राजपूतों की सेना को हार का सामना करना पड़ा।
- बाबर ने इस जीत के बाद ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।
सांगा की हार के कारण
- बयाना के बाद की गलती: सांगा ने बयाना की जीत के बाद बाबर को तैयारी करने का मौका दिया।
- पुरानी युद्ध पद्धति: राजपूत पुरानी युद्ध पद्धति से लड़ रहे थे, जबकि बाबर के पास तोपखाने और तुलुगमा पद्धति थी।
- हाथी पर युद्ध: सांगा का हाथी पर बैठकर युद्ध लड़ना उन्हें आसानी से निशाना बनाने का अवसर दे गया।
- विश्वासघात: रायसीन के सलहदी तंवर ने सांगा के साथ विश्वासघात करके बाबर का साथ दिया।
कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
बाबर का भारत में आगमन
- बाबर, काबुल का शासक था, जो तैमूर लंग और चंगेज खाँ दोनों के वंश का था।
- बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि उन्हें भारत पर आक्रमण करने का न्योता दौलत खाँ लोदी, आलम खाँ लोदी और महाराणा सांगा ने दिया था।
- पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526 ई.): बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। इस युद्ध में बाबर ने तोपखाने और तुलुगमा पद्धति का इस्तेमाल किया।
- युद्ध जीतने के बाद, बाबर ने ‘कलंदर’ की उपाधि धारण की।
बयाना और खानवा का युद्ध
बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई.)
- बाबर ने आगरा के पास बयाना दुर्ग पर कब्जा कर लिया, जिसे सांगा ने एक सीधी चुनौती माना।
- सांगा ने अपनी विशाल सेना के साथ बयाना पर हमला किया और मुगलों को बुरी तरह हराया।
- इस हार के बाद मुगल सैनिकों का मनोबल गिर गया था।
खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.)
- बाबर ने सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए शराब न पीने की कसम खाई, ‘तमगा’ कर माफ किया और इसे ‘जिहाद’ (धर्म युद्ध) घोषित किया।
- युद्ध में बाबर ने तोपखाने और तुलुगमा पद्धति का इस्तेमाल किया, जिसका राजपूतों को कोई अनुभव नहीं था।
- युद्ध के दौरान सांगा के सिर में एक तीर लगा और वे मूर्छित हो गए।
- झाला अज्जा ने सांगा का राजचिह्न धारण कर युद्ध जारी रखा, लेकिन राजपूतों की सेना को हार का सामना करना पड़ा।
- बाबर ने इस जीत के बाद ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।
सांगा की हार के कारण
- बयाना के बाद की गलती: सांगा ने बयाना की जीत के बाद बाबर को तैयारी करने का मौका दिया।
- पुरानी युद्ध पद्धति: राजपूत पुरानी युद्ध पद्धति से लड़ रहे थे, जबकि बाबर के पास तोपखाने और तुलुगमा पद्धति थी।
- हाथी पर युद्ध: सांगा का हाथी पर बैठकर युद्ध लड़ना उन्हें आसानी से निशाना बनाने का अवसर दे गया।
- विश्वासघात: रायसीन के सलहदी तंवर ने सांगा के साथ विश्वासघात करके बाबर का साथ दिया।
महाराणा सांगा की मृत्यु , बहादुर शाह का चित्तौड़ पर आक्रमण
महाराणा सांगा की मृत्यु
- खानवा युद्ध के बाद सांगा ने दोबारा बाबर से लड़ने की कसम खाई और चित्तौड़ जाने से इनकार कर दिया।
- जनवरी 1528 में बाबर ने चंदेरी के मेदिनी राय पर आक्रमण किया।
- सांगा, मेदिनी राय की मदद के लिए जा रहे थे, लेकिन युद्ध के विरोधी उनके मंत्रियों ने उन्हें जहर दे दिया।
- 30 जनवरी 1528 को कालपी के पास उनकी मृत्यु हो गई।
- बाबर ने सांगा की वीरता और शक्ति की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि उनके जैसा राजा होने के कारण ही भारत में मुगलों का राज्य जम नहीं पाया।
सांगा के उत्तराधिकारी
1. भोजराज
- सांगा के सबसे बड़े पुत्र, जिनका जन्म सोलंकी रायमल की पुत्री कुंवर बाई से हुआ था।
- उनका विवाह मेड़ता के रावदूदा की पोत्री मीरा राठौड़ से हुआ, जिन्हें ‘राजस्थान की राधा’ भी कहा जाता है।
- भोजराज की मृत्यु विवाह के सात साल बाद, खानवा के युद्ध में हो गई।
2. राणा रत्नसिंह द्वितीय (1528-1531 ई.)
- महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद रत्नसिंह मेवाड़ के शासक बने।
- सांगा ने अपनी पत्नी हाड़ी रानी कर्मावती के पुत्रों विक्रमादित्य और उदयसिंह को रणथंभौर की जागीर दे दी थी, जो रत्नसिंह को पसंद नहीं था।
- महाराणा रत्नसिंह ने बूंदी के हाड़ा सूरजमल के साथ शिकार के दौरान छल से युद्ध किया, जिसमें दोनों की मृत्यु हो गई।
3. राणा विक्रमसिंह (1531-1536 ई.)
- रत्नसिंह की मृत्यु के बाद विक्रमादित्य मेवाड़ के राणा बने।
- वह अयोग्य शासक थे और अपने सरदारों का अपमान करते थे, जिससे वे नाराज होकर अपने ठिकानों पर लौट गए।
बहादुर शाह का चित्तौड़ पर आक्रमण
- पहला आक्रमण (1534 ई.): गुजरात के शासक बहादुर शाह ने मेवाड़ की कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर आक्रमण किया। भयभीत होकर विक्रमादित्य की मां रानी कर्मावती ने संधि करके बहादुर शाह को मालवा के जिले, एक सोने की पेटी और धन देकर घेरा उठवा दिया।
- दूसरा आक्रमण (1535 ई.): बहादुर शाह ने दोबारा चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
- कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता मांगी, लेकिन बहादुर शाह ने इसे ‘जिहाद’ घोषित करके हुमायूँ को रोक दिया।
- कर्मावती ने नाराज सरदारों को पत्र लिखकर वापस बुलाया और देशप्रेम की भावना जगाई।
- सभी सरदार लौट आए, और विक्रमादित्य व उदयसिंह को बूंदी भेज दिया गया।
- देवलिया के रावत बाघ सिंह के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया किया।
- रानी कर्मावती के नेतृत्व में 13,000 रानियों ने जौहर किया।
- इस प्रकार, मार्च 1535 में चित्तौड़ का दूसरा साका पूरा हुआ।
विक्रमादित्य की हत्या और उदयसिंह का बचाव
- बहादुर शाह के चित्तौड़ से चले जाने के बाद, मेवाड़ के सरदारों ने विक्रमादित्य को वापस बुलाकर फिर से शासक बनाया।
- हालांकि, विक्रमादित्य के व्यवहार में कोई सुधार नहीं हुआ।
- 1536 ई. में उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज की पासवान रानी के पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी।
- जब बनवीर ने उदयसिंह को मारने की कोशिश की, तब पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को सुरक्षित किले से बाहर निकाला।
महाराणा उदयसिंह (1537-1572 ई.)
उदयसिंह का राज्याभिषेक और चित्तौड़ पर अधिकार
- पन्नाधाय ने उदयसिंह को लेकर कई जगहों पर शरण ली और अंत में उन्हें कुंभलगढ़ में आशा महाजन के संरक्षण में छोड़ा।
- जब सरदारों को पता चला कि उदयसिंह जीवित हैं, तो उन्होंने 1537 ई. में कुंभलगढ़ में उनका राज्याभिषेक कर दिया।
- पाली के अखैराज सोनगरा ने अपनी पुत्री जैंवता बाई का विवाह उदयसिंह से कर दिया, जिससे उदयसिंह को और भी समर्थन मिला।
- उदयसिंह ने अपने ससुर और अन्य सरदारों के साथ मिलकर बनवीर पर आक्रमण किया।
- 1540 ई. में हुए इस युद्ध में उदयसिंह की विजय हुई और वह अपने पैतृक राज्य के स्वामी बन गए। बनवीर के भाग्य के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।
मालदेव से विवाद
- जोधपुर के शासक मालदेव ने जयमल राठौड़ की पुत्री से जबरन विवाह करने की कोशिश की।
- जयमल ने अपनी पुत्री का विवाह उदयसिंह से कर दिया, जिससे मालदेव नाराज हो गया।
- मालदेव ने कुंभलगढ़ पर हमला किया, लेकिन वह हार गया।
- इसी घटना के बाद, उदयसिंह के राज्य में नागणेची माता की पूजा का रिवाज शुरू हुआ।
शेरशाह सूरी और उदयसिंह
- गिरी-सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी की जीत के बाद, वह मेवाड़ की ओर बढ़ा।
- उदयसिंह ने लड़ना उचित न समझते हुए, दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह को भेज दीं और उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।
- इस तरह, उदयसिंह अफगानों की अधीनता स्वीकार करने वाले मेवाड़ के पहले शासक बने।
हरमाड़ा का युद्ध (1557 ई.)
- हाजी खाँ पठान ने अपनी प्रेमिका रंगराय के विवाद में उदयसिंह से मदद मांगी।
- मदद के बदले उदयसिंह ने रंगराय की मांग की, जिसे हाजी खाँ ने ठुकरा दिया।
- नतीजतन, हाजी खाँ ने उदयसिंह के खिलाफ मालदेव से मदद मांगी।
- अजमेर के निकट हरमाड़ा में हुए इस युद्ध में उदयसिंह की हार हुई।
उदयपुर की स्थापना (1559 ई.)
- अपने पौत्र अमर सिंह के जन्म की खुशी में, उदयसिंह ने कैलाशपुरी का दौरा किया।
- वहाँ एक साधु की सलाह पर, उन्होंने एक नया शहर बसाने का फैसला किया, जिसे आज उदयपुर के नाम से जाना जाता है।
- उन्होंने पिछौला तालाब के पास एक महल की नींव रखी, जिसे ‘पानेड़ा’ कहा गया। इसी स्थान पर मेवाड़ के महाराणाओं का राजतिलक होता था।
- इसी दौरान, उन्होंने उदयसागर झील का निर्माण भी करवाया।
अकबर का चित्तौड़ पर आक्रमण (1567 ई.)
अकबर का चित्तौड़ पर आक्रमण (1567 ई.)
- अकबर, जो गुजरात से व्यापारिक संबंध बनाना चाहता था, मेवाड़ को अधीन करना आवश्यक मानता था।
- आक्रमण के कारण:
- उदयसिंह ने मालवा के शासक बाज बहादुर को शरण दी थी।
- उन्होंने मेड़ता के जयमल राठौड़ को भी शरण दी थी, जिन्हें अकबर ने हराया था।
- जब अकबर ने आक्रमण की योजना बनाई, तो उदयसिंह के पुत्र शक्तिसिंह ने अपने पिता को इस बारे में सूचित किया।
- सरदारों की सलाह पर, उदयसिंह अपने परिवार के साथ पहाड़ों में चले गए और जयमल राठौड़ व फत्ता चूड़ावत को दुर्ग की कमान सौंप दी।
चित्तौड़ का तीसरा साका (1568 ई.)
- अकबर ने साबात (सुरंग) और तोपखाने का उपयोग कर दुर्ग की घेराबंदी की।
- भोजन सामग्री समाप्त होने पर, सरदारों ने साका करने का निर्णय लिया।
- फत्ता की पत्नी फूलकंवर के नेतृत्व में रानियों ने जौहर किया।
- अकबर की बंदूक से जयमल घायल हो गए। तब उनके भतीजे कल्ला राठौड़ ने उन्हें कंधे पर बैठाकर युद्ध किया।
- कल्ला राठौड़, इतिहास में ‘चार हाथों वाले देवता’ के रूप में प्रसिद्ध हुए।
- ईसरदास चौहान और फत्ता चूड़ावत जैसे कई सरदार वीरगति को प्राप्त हुए।
- अकबर ने 25 फरवरी 1568 को चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया, लेकिन इस दौरान उसने 30,000 निर्दोष लोगों की हत्या करवाई, जो उसके जीवन पर एक काला दाग है।
- अकबर ने जयमल और फत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उनकी गज पर सवार मूर्तियां आगरा में लगवाईं।
महाराणा उदयसिंह की मृत्यु
- चित्तौड़ पर मुगलों का अधिकार होने के बाद, उदयसिंह कुंभलगढ़ में रहे।
- 28 फरवरी 1572 (होली के दिन) को गोगुंदा में उनकी मृत्यु हो गई।
- उनके पुत्र शक्तिसिंह के नाम पर सिसोदियों की ‘सक्तावत’ शाखा, और उनके अन्य पुत्रों के नाम पर ‘अगरावत’ और ‘सीयावत’ जैसी शाखाएं बनीं।
मेवाड़ राजवंश: गौरवपूर्ण इतिहास .