राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ: कांस्य युग से लौह युग तक
I. सिंधु घाटी/कांस्य युगीन सभ्यता (Bronze Age Civilization)
राजस्थान में इस नगरीय सभ्यता के अवशेष महत्वपूर्ण हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता: मुख्य तथ्य
• नामकरण: सिंधु सभ्यता नाम जॉन मार्शल द्वारा दिया गया।
• प्रथम खोज: 1826 में चार्ल्स मेनन ने हड़प्पा के टीले की ओर सर्वप्रथम ध्यान आकर्षित किया।
• प्रवेश द्वार: हड़प्पा (प्रथम खोजा गया स्थल) को सिंधु घाटी का प्रवेश/तोरण द्वार कहा जाता है।
• विस्तार: यह सभ्यता त्रिभुजाकार रूप में लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है।
• कालक्रम: रेडियो कार्बन पद्धति $\text{(C}^{14})$ के अनुसार, इसका समय डी.पी. अग्रवाल ने 2350 से 1750 ई. पूर्व निर्धारित किया है।
• प्रमुख केंद्र: यह मध्य व उत्तरी-पश्चिमी भारत के साथ-साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक विस्तृत थी।
• सबसे बड़ी इमारत: सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी संरचना अन्नागार थी।
• सामाजिक व्यवस्था: समाज मुख्य रूप से मातृसत्तात्मक था।
• विशेषता: यह एक कांस्य युगीन और नगरीय सभ्यता थी—भारत में प्रथम नगरीय क्रांति का साक्ष्य।
• मापन: इसमें 16 की इकाई (16 के गुणज) का विशेष महत्व था।
महत्वपूर्ण सिंधु स्थल
• हड़प्पा (पाकिस्तान): प्रथम स्थल, रावी नदी के बाएं तट पर स्थित; नटराज की नृत्य मुद्रा में मूर्ति मिली। (उत्खनन: 1920-21, माधव स्वरूप वत्स व दयाराम साहनी)
• मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान): दूसरा महत्वपूर्ण स्थल। (उत्खनन: 1922, राखलदास बनर्जी)
• लोथल (गुजरात): भोगवा नदी के किनारे प्रमुख व्यापारिक नगर; यहाँ से गोदीवाड़ा (बन्दरगाह) के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
• धोलावीरा (गुजरात): नगर तीन भागों में विभक्त मिला (एकमात्र); स्टेडियम और सुनामी के साक्ष्य भी मिले।
• राखीगढ़ी (हरियाणा): भारत में स्थित सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है।
• रोपड़/रूपनगर (पंजाब): भारत में खोजा गया सिंधु घाटी का प्रथम स्थान; यहाँ मनुष्य के साथ कुत्ते को दफनाने के साक्ष्य मिले।
• चंहुदड़ों (पाकिस्तान): यहाँ से अधर राज प्रसाधन सामग्री और मनके निर्माण के कारखाने मिले हैं।
II. ताम्र पाषाणिक संस्कृति (Chalcolithic Culture)
यह वह काल है जब मानव ने पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग करना शुरू किया।
ताम्र पाषाणिक संस्कृति: पृष्ठभूमि
• अर्थ: पत्थर (पाषाण) और तांबे (ताम्र) के उपयोग का काल।
• तांबे की खोज: मानव ने सर्वप्रथम 5000 ईसा पूर्व तांबे की खोज की थी।
• सामाजिक स्वरूप: यह मुख्य रूप से ग्रामीण, पशुचारी व कृषक समुदाय से संबंधित थी।
• निवास स्थान: ये लोग पहाड़ियों और नदियों के आस-पास रहते थे।
• मृदभांड: गैरिक मृदभाण्ड और विशेष रूप से काले व लाल (कृष्ण-लोहित) मृदभाण्ड सर्वाधिक प्रचलित थे, जो चाक से बनाए जाते थे।
• सर्वाधिक उपकरण: सर्वाधिक तांबे के उपकरण (424 ताम्र वस्तुएँ) मध्य प्रदेश के गुनेरिया से प्राप्त हुए हैं।
राजस्थान के प्रमुख ताम्र पाषाणिक स्थल
• कालीबंगा: हनुमानगढ़ (घग्घर नदी)
• गणेश्वर: नीमकाथाना (कांतली नदी)
• आहड़: उदयपुर (आयड़/बेड़च नदी)
• गिलुण्ड: राजसमंद (बनास नदी)
• बालाथल: उदयपुर
• ओझियाणा: भीलवाड़ा
III. कालीबंगा सभ्यता (Hanumangarh)
कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन राजस्थान का एक महत्वपूर्ण स्थल है।
कालीबंगा: मुख्य बिंदु
• स्थान: हनुमानगढ़ जिला, घग्घर नदी के किनारे (सरस्वती नदी का अवशेष)।
• शाब्दिक अर्थ: पंजाबी भाषा में ‘बंगा’ का अर्थ ‘चूड़ी’ होता है, इसलिए कालीबंगा का अर्थ है ‘काली चूड़ियाँ’।
• खोज: 1951-52 में अमलानंद घोष द्वारा।
• उत्खनन: 1961-69 तक ब्रजवासी लाल (बी.बी. लाल) व बालकृष्ण थापर (बी.के. थापर) द्वारा।
• महत्व: दशरथ शर्मा ने इसे सिंधु घाटी की तीसरी राजधानी कहा है।
• समय: रेडियो कार्बन पद्धति द्वारा 2350 से 1750 ई. पूर्व।
• विशेष नाम: इसे ‘दीन-हीन बस्ती’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ कच्ची ईंटों के मकान मिले हैं।
• प्राक्-हड़प्पा मृदभांड: अमलानंद घोष ने इन्हें ‘सोथी मृदभांड’ कहा।
कालीबंगा की विशिष्टताएँ
• कृषि: जुते हुए खेत के एकमात्र साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुए हैं।
• फसल: मुख्य फसलें गेहूँ व जौ थीं; समकोण पर दो फसलें एक साथ बोई जाती थीं।
• नगर नियोजन: नगर दो भागों में विभक्त (पश्चिमी-दुर्गीकृत, पूर्वी-अदुर्गीकृत)।
• सड़कें: समकोण पर काटती सड़कें (ग्रीन/शतरंज प्रणाली)।
• नालियाँ: लकड़ी की बनी हुई नालियाँ और पक्की व ढकी हुई नालियों की व्यवस्था।
• धार्मिक साक्ष्य: 7 अग्निवेदिकाएँ (हवन कुण्ड) मिली हैं जिनमें जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं, जो बली प्रथा के प्रचलन को दर्शाती हैं।
• समाधियाँ: युग्म समाधियाँ और शव गाड़ने की प्रथा (सिर उत्तर, पैर दक्षिण)। ये पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।
• अद्वितीय तथ्य: यह सिंधु सभ्यता का एकमात्र स्थल है जहाँ से मातृदेवी की मूर्तियां प्राप्त नहीं हुई हैं।
• चिकित्सा: बालक की खोपड़ी मिली है जिसमें छह छेद हैं—यह शल्य चिकित्सा (Surgery) का प्राचीनतम साक्ष्य माना गया।
• अन्य अवशेष: भूकंप के साक्ष्य, तांबे के बैल की आकृति, बेलनाकार मुहरें, स्वास्तिक का चिह्न, खिलौना गाड़ी, काले मृद पात्र।
• लिपि: दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी, जिसे सर्पाकार, गोमूत्राकार या बोस्ट्रॉफेदम कहते हैं। इसे अभी तक पढ़ा नहीं गया है।
IV. 🟢 गणेश्वर सभ्यता (Neem Ka Thana)
गणेश्वर सभ्यता ताम्र सभ्यताओं की जननी के रूप में विख्यात है।
गणेश्वर: मुख्य बिंदु
• स्थान: नीमकाथाना जिला, कांतली नदी के किनारे।
• खोज: 1972 में रतनचन्द्र अग्रवाल द्वारा।
• उत्खनन: 1978 में रतनचन्द्र अग्रवाल व विजय कुमार द्वारा।
• उपनाम: ‘ताम्र सभ्यताओं की जननी’ और ‘पुरातत्व का पुष्कर’।
• समय: 2800 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व।
• निर्माण सामग्री: भवन निर्माण में पत्थर का उपयोग होता था; पत्थर के पूल और मकान मिले हैं।
• तांबे की शुद्धता: यहाँ प्राप्त तांबे की सामग्री में 99 प्रतिशत तांबा था।
• उपकरण: 2000 तांबे के उपकरण मिले, जिनमें तांबे का मछली पकड़ने का कांटा और दोहरी पेचदार पिनें प्रमुख हैं।
• व्यापार: सिंधु घाटी में तांबा यहीं से निर्यात होता था।
• मृदपात्र: यहाँ के मृदपात्र ‘कृष्णवर्णी मृदपात्र/गैरूक मृदपात्र’ कहलाते हैं।
💡 ध्यान रहे: ताम्र सभ्यताओं की जननी – गणेश्वर; ताम्रवती नगरी – आहड़; तांबा जिला – नीमकाथाना (पूर्व में झुंझुनूं)।
V. 🟤 आहड़ सभ्यता (Udaipur)
आहड़ सभ्यता बनास संस्कृति के नाम से भी जानी जाती है।
आहड़: मुख्य बिंदु
• स्थान: उदयपुर जिला, आयड़/बेड़च नदी के किनारे।
• अन्य नाम: ताम्रवती नगरी (शिलालेखों में), आघाटपुर (10वीं-11वीं शताब्दी में), और स्थानीय नाम धूलकोट।
• खोज: 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा।
• उत्खनन: 1961-62 में हंसमुख धीरजलाल सांकलिया व वी.एन. मिश्र द्वारा।
• संस्कृति: आयड़ नदी के आस-पास पनपने के कारण इसे ‘बनास संस्कृति’ भी कहते हैं।
• अंतिम संस्कार: यह मेवाड़ के महाराणाओं का दाह संस्कार स्थल था, इसलिए इसे ‘महासतियों का टीला’ भी कहा जाता है।
• मृदभांड: लाल-भूरे व काले मृदभांड (कृष्ण-लोहित) प्रयोग में लेते थे, जिन पर रेखीय व सफेद बूंदों वाले डिजाइन थे।
• भंडारण: बड़े अनाज रखने के मृद्भांडों को स्थानीय भाषा में गोरे व कोट कहते थे।
• पुनर्निर्माण: यह सभ्यता आठ बार बनी व उजड़ी।
आहड़ की विशिष्टताएँ
• अर्थव्यवस्था: पशुपालन मुख्य आधार था; ये तांबा गलाना जानते थे (यहाँ से ताम्र उद्योग था)।
• वस्तुएँ: ‘बनाशियल वूल’ (बैल की मूर्ति), बहुमुखी चूल्हे, पैर से चालित चक्की, सूत कातने के चरखे, लोहे की वस्तुएँ, ईरानी धूप-दीप पात्र मिले हैं।
• धातु साक्ष्य: भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्राचीनतम साक्ष्य आहड़ से मिला है।
• खाद्यान्न: चावल व बाजरा मुख्य खाद्यान्न फसल थी।
• अंतर: जहाँ कालीबंगा नगरीय थी, वहीं आहड़ सभ्यता ग्रामीण थी।
• अंतर्राष्ट्रीय संबंध: यहाँ से 6 यूनानी ताम्र मुद्राएं व 3 मोहरें मिली हैं (जिन पर अपोलो देवता व त्रिशूल का चित्र है), जो ईरान से संबंध दर्शाती हैं।
• जल प्रबंधन: पानी सोखने के लिए गड्ढे मिले, जिनमें घड़े के ऊपर घड़ा रखते थे।
VI. लौह युगीन सभ्यताएँ (Iron Age Civilizations)
लोहे का उपयोग शुरू होने के बाद की सभ्यताएँ।
लौह युग: पृष्ठभूमि
• प्रथम साहित्यिक उल्लेख: लोहे का प्रथम साहित्यिक उल्लेख अथर्ववेद में हुआ है, जहाँ लोहे को ‘श्याम अयस’ या ‘कृष्ण अयस’ कहा गया है।
• प्राचीनतम साक्ष्य (भारत): प्रथम पुरातात्विक साक्ष्य 1000 ईसा पूर्व में अतरंजीखेड़ा (एटा, यू.पी.) से प्राप्त हुआ है।
• पहला हल: सर्वप्रथम अतरंजीखेड़ा व नोह से लोहे से निर्मित हल्की हाल प्राप्त हुई।
• विशेष मृदभांड: लौहयुगीन सभ्यता के लोग ‘चित्रित धूसर मृदभांड’ का प्रयोग करते थे।
राजस्थान के प्रमुख लौह युगीन स्थल
स्थल | जिला | नदी/विशेषता | प्रमुख खोज | उपनाम |
रेड | टोंक | ढील नदी किनारे | 3075 पंचमार्क/आहत सिक्के (भारत के प्राचीनतम सिक्के), लोहे के विशाल भंडार। | प्राचीन राजस्थान का टाटा नगर |
सुनारी | नीमकाथाना | कांतली नदी किनारे | लोहे को पिघलाने की दो भट्टियां (खुले प्रकार की)। | – |
जोधपुरा | जयपुर ग्रामीण | साबी नदी किनारे | लोहे की प्राचीनतम भट्टियां, शुंग-कुषाणकालीन व मौर्यकालीन अवशेष। | – |
ईशवाल | उदयपुर | – | प्राचीन औद्योगिक नगर, लौह युगीन अवशेष, ऊँट के दांत। | – |
नगर | टोंक | – | 6000 तांबे के सिक्के (मालव जनपद के), महिषासुर मर्दिनी व रति-कामदेव की मूर्तियाँ। | खेड़ा सभ्यता |
नगरी | चित्तौड़गढ़ | – | प्राचीन नाम मध्यमिका; शिवि जनपद के सिक्के, गुप्तयुगीन मंदिर, नटराज शिव मूर्ति के प्राचीनतम साक्ष्य। | – |
नोह | भरतपुर | रुपारेल नदी किनारे | 5 संस्कृतियों के अवशेष, 1.5 मीटर ऊंची यक्ष की मूर्ति (‘जोख बाबा‘), 1700 वर्ष पुरानी पक्षी चित्रित ईंटें। | – |
बैराठ | जयपुर | बाणगंगा नदी किनारे | मौर्यकालीन बौद्ध मंदिर व मठ (हीनयान), भाब्रू शिलालेख (बुद्ध, धम्म, संघ का उल्लेख), 36 मुद्राएं (8 पंचमार्क, 28 इण्डोग्रीक)। | विराट नगर |
बैराठ सभ्यता: विशेष विवरण
• बौद्ध केंद्र: मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का केंद्र।
• उत्खनन: 1936-37 में दयाराम साहनी द्वारा।
• शिलालेख: कैप्टन बर्ट ने बीजक की डूंगरी से भाब्रू शिलालेख खोजा (बुद्ध, धम्म, संघ का उल्लेख)।
• महाभारत: पांडवों ने यहाँ एक वर्ष का अज्ञातवास बिताया था।
• विनाश: शैवधर्म के अनुयायी हूणों (मिहिर कुल) ने इसका ध्वंस किया।
• मुद्राएँ: सूती कपड़े में लिपटी 36 मुद्राएं मिलीं, जिनमें 28 इण्डोग्रीक शासकों की थीं।
VII. अन्य प्रमुख पुरातात्विक स्थल
• बरोर (श्रीगंगानगर): हड़प्पाकालीन स्थल, जहाँ मिट्टी के बर्तनों में काली मिट्टी प्राप्त हुई है (देश में अद्वितीय)।
• गरदड़ा (बूँदी): भारत की प्राचीनतम ‘बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग्स’ (शैल चित्र) प्राप्त हुई हैं।
• भीनमाल (जालौर): यहाँ से शक क्षत्रपों के सिक्के और यूनानी दुहत्थी सुराही मिली है।
• मण्डोर (जोधपुर ग्रामीण): एक शिलापट्ट पर गुप्तकालीन कृष्णलीला का चित्रांकन मिला है।
• तिलवाड़ा (बाड़मेर): लूणी नदी के किनारे, अग्निकुण्ड में मानव अस्थिभस्म मिली।
• बागौर (भीलवाड़ा): कोठारी नदी किनारे; भारत में पशुपालन के प्राचीनतम पाषाणकालीन साक्ष्य मिले।