राजस्थान के दुर्ग
राजस्थान के दुर्ग: इतिहास और स्थापत्य का अद्भुत संगम
राजस्थान, जिसे दुर्गों और गढ़ों का प्रदेश कहा जाता है, अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के बाद, भारत में राजस्थान ही वह राज्य है जहाँ सर्वाधिक गढ़ और दुर्ग मौजूद हैं. एक अनुमान के अनुसार, यहाँ 250 से अधिक किले और गढ़ हैं.
- मेवाड़ का योगदान: मेवाड़ के 84 किलों में से अकेले महाराणा कुम्भा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था, जो दुर्ग-निर्माण में उनके अतुलनीय योगदान को दर्शाता है.
- ढूंढाड़ क्षेत्र: मेवाड़ के बाद, ढूंढाड़ इलाके में भी 50 से अधिक किले पाए गए हैं, जो इस क्षेत्र की सामरिक महत्ता को उजागर करते हैं.
दुर्ग निर्माण की प्राचीन परंपरा और परिभाषाएँ
- शुक्रनीति के अनुसार: शुक्रनीति में दुर्ग को राज्य के सात अंगों में से एक माना गया है और इसे शरीर के प्रमुख अंग “हाथ” की संज्ञा दी गई है.
- शुक्रनीति के नौ भेद:
- एरण दुर्ग: खाई, काँटों और पत्थरों से दुर्गम मार्ग वाला किला.
- पारिख दुर्ग: जिसके चारों ओर बहुत बड़ी खाई हो.
- पारिध दुर्ग: इंट, पत्थर या मिट्टी की बड़ी-बड़ी दीवारों से घिरा हुआ.
- वन दुर्ग: घने, काँटेदार वृक्षों के समूह से चारों ओर से घिरा हुआ.
- धन्व दुर्ग: जिसके चारों तरफ दूर-दूर तक मरुभूमि फैली हो.
- जल दुर्ग: जिसके चारों ओर विशाल जलराशि हो.
- गिरि दुर्ग: एकांत में किसी पहाड़ी पर बना किला, जहाँ जल संचय का प्रबंध हो.
- सैन्य दुर्ग: शूरवीरों की व्यूह रचना से अभेद्य और अजय.
- सहाय दुर्ग: जहाँ शूर और सदा अनुकूल रहने वाले बंधुजन रहते हों.
- सर्वश्रेष्ठ दुर्ग: शुक्रनीति के अनुसार, सैन्य दुर्ग को इन सभी में सर्वोत्तम माना गया है.
कौटिल्य और विष्णु धर्मसूत्र के अनुसार दुर्गों का वर्गीकरण
प्राचीन भारतीय विचारकों ने भी दुर्गों के महत्व को समझते हुए उनका वर्गीकरण किया है.
- कौटिल्य के चार प्रकार:
- औदक दुर्ग (जल दुर्ग): राजस्थान का गागरोण दुर्ग इसी श्रेणी का उदाहरण है.
- पावंत दुर्ग (पर्वत दुर्ग): जो किसी ऊँची पहाड़ी पर बना हो. राजस्थान के अधिकांश प्रमुख दुर्ग इसी कोटि में आते हैं.
- धान्वन दुर्ग (मरुस्थल दुर्ग): जैसलमेर का दुर्ग इसका सटीक उदाहरण है.
- वन दुर्ग: जो घने बीहड़ वन में स्थित हो. राजस्थान के ‘मेवास’ दुर्ग इसी श्रेणी के माने जाते हैं.
- विष्णु धर्मसूत्र के छह प्रकार:
- धान्व दुर्ग: जल विहीन खुली भूमि पर स्थित.
- मही दुर्ग (स्थल दुर्ग): पत्थर या ईंटों से निर्मित.
- वार्क्ष दुर्ग: चारों ओर से कंटीले और लंबे वृक्षों से घिरा हुआ.
- जल दुर्ग: चारों ओर से जल से आवृत्त.
- नृदुर्ग: चतुरंगिणी सेना से सुरक्षित.
- गिरि दुर्ग: पहाड़ों पर स्थित दुर्ग, जहाँ चढ़ाई करना कठिन हो.
राजस्थान के दुर्गों की प्रमुख श्रेणियाँ और उदाहरण
राजस्थान के किलों को उनकी भौगोलिक स्थिति और विशेषताओं के आधार पर कई श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है.
- औदक दुर्ग: गागरोण, भैंसरोड़गढ़, चित्तौड़
- पार्वत दुर्ग: गागरोण, जालौर, सिवाणा, चित्तौड़, रणथंभौर, तारागढ़ (अजमेर-बूंदी), मेहरानगढ़, आमेर, जयगढ़, दौसा और कुचामन के दुर्ग.
- धान्वन दुर्ग: जैसलमेर, तन्नोट, सिवाणा, फलोदी, जालौर, नागौर, अनूपगढ़, सूरतगढ़, भटनेर.
- वन दुर्ग: सिवाणा, गागरोण, चित्तौड़, रणथंभौर, जालौर और मेवास दुर्ग.
- स्थल दुर्ग: बीकानेर का जूनागढ़, नागौर का अहिछत्रगढ़, चौमूं का चौमुहागढ़, भरतपुर का लोहागढ़, हनुमानगढ़ का भटनेर, माधोराजपुरा का दुर्ग.
- एरण दुर्ग: गागरोण, चित्तौड़, सिवाणा, जालौर.
- पारिख दुर्ग: चित्तौड़, भरतपुर का लोहागढ़, बीकानेर का जूनागढ़, नागौर का दुर्ग.
- पारिध दुर्ग: गागरोण, चित्तौड़, जालौर, बीकानेर, जैसलमेर, मेहरानगढ़, लोहागढ़.
- सैन्य दुर्ग: चित्तौड़ सहित अधिकांश दुर्ग इस श्रेणी में आते हैं.
- सहाय दुर्ग: सिवाणा.
यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल राजस्थान के दुर्ग
जून 2013 में, यूनेस्को ने राजस्थान के 6 प्रमुख दुर्गों को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया.
- आमेर महल
- गागरोण
- कुंभलगढ़
- जैसलमेर
- रणथंभौर
- चित्तौड़गढ़
राजस्थान के प्रमुख दुर्ग
चित्तौड़ दुर्ग: गौरव गाथाओं का अनूठा प्रतीक
राजस्थान के किलों में चित्तौड़गढ़ का दुर्ग क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा है. यह अपने शौर्य, बलिदान और ऐतिहासिक गौरव के लिए पूरे देश में एक विशिष्ट स्थान रखता है. गिरि दुर्गों में इसे राजस्थान का गौरव और सभी किलों का सिरमौर माना जाता है.
- लोकोक्ति: इसके लिए एक प्रसिद्ध कहावत है, “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढैयाँ.”
- कविवर अक्षयसिंह रत्नू: उन्होंने इस दुर्ग की शान में लिखा है:
जिण अजोड़ राखी जुड़यां मेवाड़ा सूं मरोड़।
किलां मोड़ बिलमा तणं, चित तोड़ण चित्तौड़।।
भौगोलिक स्थिति और सामरिक महत्व
यह दुर्ग गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम के पास, अरावली पर्वतमाला में स्थित मेसा के पठार पर बना हुआ है.
- ऊँचाई और आकार:
- यह 152 मीटर ऊँची पहाड़ी पर मछली के आकार में बना है.
- समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 1850 फीट है.
- इसकी लंबाई लगभग 8 कि.मी. और चौड़ाई 2 कि.मी. है.
- दुर्ग का कुल क्षेत्रफल 279 हैक्टेयर है.
• महत्व: दिल्ली से मालवा और गुजरात जाने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर होने के कारण प्राचीन और मध्यकाल में इसका विशेष सामरिक महत्व रहा है.
चित्तौड़ दुर्ग का गौरवशाली इतिहास
इस दुर्ग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसकी शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है.
- संस्थापक: ‘वीरविनोद’ के अनुसार, मौर्य राजा चित्रंग (चित्रांगद) ने इसे बनवाया और इसका नाम ‘चित्रकूट’ रखा, जो बाद में ‘चित्तौड़’ कहलाया.
- शासक:
- 8वीं शताब्दी में बप्पा रावल ने अंतिम मौर्य शासक मानमोरी को हराकर इस पर अधिकार किया.
- इसके बाद, मालवा के परमार, गुजरात के चालुक्य और फिर से गुहिल शासकों का आधिपत्य रहा.
- 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने इसे हस्तगत कर लिया.
- 1326 ई. में राणा हम्मीर ने गुहिल-सिसोदिया वंश को फिर से स्थापित किया.
- 1615 ई. की मेवाड़-मुगल संधि के बाद यह वापस गुहिल वंश के अधिकार में आ गया और 1947 तक उन्हीं का अधिकार रहा.
चित्तौड़ के तीन ऐतिहासिक साके
चित्तौड़ के इतिहास में तीन प्रमुख साके हुए, जो यहाँ के वीरों और वीरांगनाओं के अदम्य साहस और बलिदान को दर्शाते हैं.
- पहला साका (1303 ई.):
- आक्रमण: दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया.
- बलिदान: राणा रतनसिंह ने वीर गोरा-बादल के साथ मिलकर केसरिया किया, और रानी पद्मिनी के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने जौहर किया.
- दूसरा साका (1534 ई.):
- आक्रमण: गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने हमला किया.
- बलिदान: राजमाता हाड़ी कर्मवती के नेतृत्व में सैंकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर किया.
- तीसरा साका (1567 ई.):
- आक्रमण: मुगल बादशाह अकबर ने राणा उदयसिंह के शासनकाल में आक्रमण किया.
- बलिदान: यह साका जयमल राठौड़ और फत्ता (पत्ता) सिसोदिया के पराक्रम और महिलाओं के जौहर के लिए प्रसिद्ध है.
दुर्ग के प्रवेश द्वार और संरचना
यह राजस्थान का सबसे बड़ा ‘लिविंग फोर्ट’ है, जहाँ आज भी लोग रहते हैं.
- प्रमुख मार्ग: दुर्ग में प्रवेश का मुख्य मार्ग पश्चिम की ओर से है, जिसमें सात विशाल प्रवेश द्वार हैं.
- पहला द्वार (पाडनपोल): यहाँ प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह का स्मारक है.
- दूसरा और तीसरा द्वार (भैरवपोल-हनुमानपोल): इनके बीच में जयमल और कल्ला राठौड़ की छतरियाँ हैं.
- अन्य द्वार: गणेशपोल, जोड़लापोल, लक्ष्मणपोल.
- सातवाँ द्वार (रामपोल): यहाँ पत्ता सिसोदिया का स्मारक है.
- अन्य प्रवेश द्वार:
- सूरजपोल: यह पूर्व दिशा का प्राचीन प्रवेश द्वार है.
- लाखोटा की बारी: यह उत्तर दिशा की एक खिड़की है.
वास्तुशिल्प और प्रमुख स्थल
चित्तौड़ दुर्ग में कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं, जो इसके स्थापत्य की भव्यता को दर्शाते हैं.
- महाराणा कुम्भा का योगदान:
- कुम्भा ने किले का जीर्णोद्धार करवाकर इसे “विचित्रकूट” अर्थात् दुर्भेद्य बनाया.
- उन्होंने कीर्तिस्तम्भ (विजयस्तंभ), कुम्भश्याम मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, रामकुण्ड जैसे कई महत्वपूर्ण निर्माण करवाए.
- कुम्भा के महल के नीचे एक विशाल तहखाना है, जहाँ जौहर होने की जनश्रुति है.
- प्रमुख महल और भवन:
- रानी पद्मिनी के महल: यह दुर्ग का एक प्रमुख आकर्षण है.
- गोरा-बादल के महल: ये रानी पद्मिनी के महलों के दक्षिण-पूर्व में स्थित हैं.
- नौ कोठा मकान या नवलखा भंडार: इसे बनवीर ने बनवाया था और यह एक लघु दुर्ग के रूप में है.
- फतह प्रकाश महल: इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है.
- मंदिर और धार्मिक स्थल:
- कुम्भश्याम मंदिर: महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित, जहाँ मीराबाई हरिकीर्तन करती थीं.
- कालिका माता मंदिर: मूल रूप से यह 10वीं शताब्दी का एक प्राचीन सूर्य मंदिर था.
- श्रृंगार चौरी: यह एक जैन मंदिर है, जिसका जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के भंडारी वेलाक ने कराया था.
- कीर्ति स्तम्भ (जैन): यह सात मंजिला जैन स्मारक है, जिसे बघेरवाल जैन जीजा ने 10वीं-11वीं शताब्दी में बनवाया था.
- जल स्रोत:
- किले में जलापूर्ति के लिए रत्नेश्वर तालाब, कुम्भ सागर तालाब, गौमुख झरना, हाथीकुण्ड, भीमलत तालाब और झाली रानी की बावड़ी जैसे कई स्रोत थे.
- अन्य ऐतिहासिक स्थल:
- भामाशाह की हवेली, सलूम्बर और रामपुरा की हवेलियाँ, तोपखाना और हिंगलू आहाड़ा के महल.
- सुप्रसिद्ध फिल्म ‘गाइड’ के गीत “आज फिर जीने की तमन्ना है” के कुछ दृश्य इसी दुर्ग में फिल्माए गए थे.
कुम्भलगढ़ दुर्ग: मेवाड़ का अजेय गढ़
मत्स्येन्द्र दुर्ग के नाम से भी जाना जाने वाला कुम्भलगढ़ का किला क्षेत्रफल की दृष्टि से चित्तौड़ के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा दुर्ग है. यह मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर सादड़ी गाँव के पास स्थित है, जिसका सामरिक महत्व बहुत अधिक था.
- नामकरण: महाराणा कुम्भा के नाम पर इसका नाम पहले ‘कुम्भपुर’ और फिर ‘कुम्भलगढ़’ पड़ा.
- अन्य नाम: पहाड़ी किला होने के कारण इसे ‘कुम्भलमेरु’ या ‘कुम्भलमेर’ भी कहते हैं.
- स्थापत्य: यह गिरि दुर्ग स्थापत्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसका निर्माण प्राचीन भारतीय आदर्शों के अनुरूप किया गया है.
भौगोलिक विशेषताएँ और संरचना
यह दुर्ग कई छोटी-मोटी पहाड़ियों, जैसे नील, श्वेत, हेमकूट, निषाद, हिमवत और गंदमादन को मिलाकर बनाया गया है.
- ऊँचाई:
- ‘वीर विनोद’ के अनुसार, इसकी चोटी समुद्र तल से 3568 फीट ऊँची है.
- पहाड़ी की तलहटी से यह 700 फीट ऊँचा है.
- अविस्मरणीय दृश्य:
- इस किले के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि “यह इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है.”
- निर्माण की पृष्ठभूमि:
- महाराणा कुम्भा ने 1448 ई. में इस दुर्ग की नींव रखी.
- यह जिस स्थान पर बना है, वहाँ पहले मौर्य शासक सम्प्रति द्वारा निर्मित एक प्राचीन दुर्ग के अवशेष थे.
- किले का निर्माण लगभग दस वर्षों (1448-1458 ई.) में पूरा हुआ.
- इसका निर्माण वास्तुशास्त्र के विद्वान मंडन की देखरेख में हुआ था.
कुम्भलगढ़ का ऐतिहासिक महत्व
यह दुर्ग मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा और कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है.
- महत्वपूर्ण घटनाएँ:
- महाराणा प्रताप का जन्म इसी दुर्ग में हुआ था.
- उदयसिंह का राज्याभिषेक भी यहीं हुआ.
- महाराणा कुम्भा की हत्या (मामादेव कुंड के पास) का दुखद साक्षी भी यही दुर्ग है.
- मुगलों का आक्रमण:
- केवल एक बार, 1578 ई. में, मुगल सेनानायक शाहबाज खाँ इसे जीतने में सफल रहा, अन्यथा यह दुर्ग लगभग अविजित ही रहा.
- बाद में महाराणा प्रताप ने इसे वापस जीत लिया और तब से यह मेवाड़ के शासकों के पास ही रहा.
दुर्ग की अनूठी दीवार और स्थापत्य
कुम्भलगढ़ अपने स्थापत्य और सुरक्षा के लिए अद्वितीय है.
- दुर्ग की दीवार:
- इस दुर्ग का 36 किलोमीटर लंबा परकोटा है, जो अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड में दर्ज है.
- इसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार माना जाता है.
- इसे ‘भारत की महान दीवार’ भी कहते हैं.
- इसकी सुरक्षा दीवार इतनी चौड़ी है कि एक साथ आठ घुड़सवार चल सकते हैं.
- आंतरिक दुर्ग (कटारगढ़):
- कुम्भलगढ़ की स्थापत्य विशेषता उसके भीतर बने लघु दुर्ग ‘कटारगढ़’ के रूप में प्रकट हुई है.
- कर्नल टॉड ने इस दुर्ग की तुलना एट्रस्कन (Etruscan) दुर्ग से की है.
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
- उड़णा पृथ्वीराज की छतरी: किले की तलहटी में महाराणा रायमल के कुंवर पृथ्वीराज की छतरी बनी हुई है, जिसे ‘उड़णा पृथ्वीराज’ भी कहते हैं.
- कुम्भा की हत्या: मामादेव कुंड, महाराणा कुम्भा की उनके पुत्र ऊदा द्वारा की गई हत्या का साक्षी है.
दुर्ग के अंदर के प्रमुख स्थल
कुम्भलगढ़ दुर्ग में प्रवेश के लिए कई द्वार और अंदर कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं.
- प्रवेश द्वार:
- पहला दरवाजा (आरेठपोल): यह केलवाड़ा कस्बे से पश्चिम की ओर है.
- हल्लापोल, हनुमानपोल, विजयपोल: ये अन्य प्रमुख द्वार हैं.
- हनुमानपोल पर लगी हनुमान प्रतिमा महाराणा कुम्भा नागौर से विजय कर लाए थे.
- कटारगढ़ के भीतर:
- प्रवेश द्वार: भैरवपोल, नीबूपोल, चौगानपोल, पागड़ापोल और गणेशपोल.
- महल: महाराणा के महल, बादल महल, झाली रानी का मालिया (महल).
- कुम्भा महल: कटारगढ़ में सबसे ऊपर और सादगीपूर्ण तरीके से बना है.
- धार्मिक और अन्य स्थल:
- नीलकंठ महादेव मंदिर: विजयपोल के पास स्थित है.
- झालीबाव (बावड़ी) और मामादेव कुण्ड: ये कटारगढ़ के उत्तर में हैं.
- कुम्भास्वामी मंदिर: कुम्भा द्वारा निर्मित यह विष्णु मंदिर है. इसके बाहर एक पाषाण शिला पर कुम्भा ने अपनी प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई थी.
- मंदिरों की संख्या: इस किले में हिंदू और जैन धर्म के कुल मिलाकर 360 से अधिक मंदिर हैं.
- बावन देवरी मंदिर: यह 52 देवी-देवताओं के घर के रूप में जाना जाता है और अपने कई शिखरों के लिए प्रसिद्ध है.
आमेर दुर्ग, जयपुर: कछवाहा शासकों की शान
जयपुर से लगभग 11 किलोमीटर दूर, अरावली की पहाड़ियों पर स्थित आमेर का दुर्ग, कछवाहा शासकों की पुरानी राजधानी रहा है. इस दुर्ग को साहित्य और शिलालेखों में आमेर, अम्बिकापुर, अम्बर, अम्बरीश और अम्बावती जैसे कई नामों से पुकारा गया है.
- नामकरण के पीछे की कहानियाँ:
- एक जनश्रुति के अनुसार, यह नगर अम्बरीश ऋषि के तप का स्थान था, इसलिए इसे आमेर कहा जाने लगा.
- दूसरी कहानी कहती है कि कछवाहों ने जब यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की, तो काकिल नामक शासक ने, जो माँ अम्बा का भक्त था, इसे बसाकर इसका नाम आमेर रखा.
- कुछ प्राचीन ग्रंथों में इसका नाम आम्रदाद्रि भी मिलता है, जो दर्शाता है कि यह क्षेत्र कभी आम के पेड़ों से घिरा हुआ था.
- इतिहास:
- ज्ञात स्रोतों के अनुसार, पहले यहाँ सूसावत मीणाओं का वर्चस्व था, जिन्हें हराकर 10वीं या 11वीं शताब्दी में कछवाहों ने आमेर को अपनी राजधानी बनाया.
- 700 से अधिक वर्षों तक कछवाहों की राजधानी रहे इस दुर्ग पर बाहरी आक्रमणों का प्रभाव कम रहा, जिसका कारण उनका अद्भुत शौर्य और मुगल शासकों के साथ राजनीतिक मित्रता थी.
दुर्ग की स्थापत्य कला और संरचना
आमेर दुर्ग की स्थापत्य कला इसे अन्य दुर्गों से अलग करती है. जहाँ अन्य किलों में महल समतल भूमि पर बने होते हैं, वहीं आमेर के राजमहल पहाड़ी ढलान पर इस तरह से बनाए गए हैं कि ये खुद ही दुर्ग का रूप ले लेते हैं.
- पृष्ठ रक्षक: आमेर के राजमहल के ऊपर एक ऊँची पहाड़ी पर जयगढ़ का दुर्ग स्थित है, जो इसके पृष्ठ रक्षक के रूप में काम करता है.
- निर्माण शैली: राजा मानसिंह, मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह जैसे प्रतापी शासकों द्वारा निर्मित ये महल राजपूत शैली में बने हैं, जिनमें कहीं-कहीं मुगल शैली का प्रभाव भी दिखता है.
- दिलाराम का बाग: किले में जाने का रास्ता मावठा झील के किनारे स्थित दिलाराम के बाग से होकर गुजरता है, जिसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने 1664 में करवाया था.
स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने
आमेर के महल अपनी कला और भव्यता के लिए प्रसिद्ध हैं.
- शीश महल:
- यह आमेर के राजमहलों में सबसे प्रसिद्ध है, जहाँ छत और दीवारों पर शीशे की बारीकी से जड़ाई की गई है.
- यहाँ एक मोमबत्ती जलाने पर सैकड़ों प्रतिबिंब दिखाई देते हैं. दीवारों पर उभरे हुए फूल और तितलियाँ बनी हुई हैं.
- यश मंदिर (जस मंदिर):
- यह दीवान-ए-खास और गणेश पोल की छतों पर बने भवनों में से एक है.
- यहाँ सफेद संगमरमर की सुंदर जालीदार खिड़कियाँ हैं, जहाँ से रानियाँ दीवान-ए-खास के दृश्य देखती थीं.
- सुख मंदिर:
- यह राजाओं का ग्रीष्मकालीन निवास था, जो दीवान-ए-खास के ठीक सामने स्थित है.
- रानीवास और बालांबाई की साल:
- महाराजा मानसिंह के महल के पास रानीवास और उनकी परिचारिकाओं के भवन हैं.
- पुराने भवनों के पीछे राजा पृथ्वीराज की रानी के नाम पर ‘बालांबाई की साल’ बनी हुई है.
धार्मिक स्थल और कलात्मकता
आमेर के किले में कई मंदिर हैं, जो अपनी कला के लिए प्रसिद्ध हैं.
- प्रमुख मंदिर:
- शिलादेवी, जगतशिरोमणि, अम्बिकेश्वर महादेव और नृसिंहजी के मंदिर.
- जगतशिरोमणि मंदिर: इसमें भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह वही मूर्ति है जिसकी पूजा मीराबाई चित्तौड़ में करती थीं.
- इस मंदिर का निर्माण रानी कनकावती ने अपने दिवंगत पुत्र जगतसिंह की याद में करवाया था.
- कला पर विद्वानों के मत:
- बिशप हैबर: उन्होंने आमेर के महलों को क्रेमलिन और अलब्रह्मा से भी बढ़कर बताया.
- फर्ग्यूसन: उन्होंने कहा कि ये महल ऐसे दिखते हैं जैसे अचानक घाटी से निकल पड़े हों. उन्होंने इन्हें मुगल शैली के अधिक निकट माना.
- ब्राउन: उन्होंने जनाना भवनों को अकबरी कला में दक्ष कारीगरों द्वारा बनाया हुआ मानते हुए उन्हें आगरा फोर्ट के भवनों के समान बताया.
- ऐतिहासिक घटना:
- 1707 में मुगल सम्राट बहादुरशाह प्रथम ने आमेर को कुछ समय के लिए हस्तगत कर लिया था और इसका नाम ‘मोमिनाबाद’ रखा था.
- इस दौरान, उसने चित्रकारी पर सफेदी करवा दी थी, जिसे 2009 में पर्यटन विभाग ने विशेषज्ञों की मदद से फिर से बहाल किया.
दुर्ग के प्रमुख द्वार और आंतरिक संरचना
आमेर दुर्ग में प्रवेश करने के लिए कई भव्य द्वार हैं, जो अंदर की शानदार दुनिया का परिचय देते हैं.
- मुख्य प्रवेश द्वार (जयपोल):
- पहला प्रवेश द्वार जयपोल है, जिसके भीतर एक विशाल प्रांगण है जिसे जलेब चौक कहते हैं.
- इस चौक में पूर्व और पश्चिम में दो छोटे मेहराबदार दरवाजे हैं, जिन्हें सूरजपोल और चाँदपोल कहते हैं.
- शिलामाता का मंदिर:
- जलेब चौक से राजमहलों में जाने का प्रवेश द्वार सिंहपोल है, जिसके पास शिलामाता का मंदिर है.
- यहाँ महिषमर्दिनी की एक कलात्मक प्रतिमा स्थापित है, जिसे राजा मानसिंह बंगाल से विजय करके लाए थे.
- राजमहलों का क्रम:
- दीवान-ए-आम: यह एक विशाल आयताकार भवन है, जहाँ राजा का आम दरबार लगता था. इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था.
- गणेश पोल: यह एक भव्य और अलंकृत प्रवेश द्वार है, जिसके माध्यम से महलों के आंतरिक भाग में जाया जा सकता है. इसकी दीवारों पर आराइस और सोने का काम है.
- दीवान-ए-खास (जय मंदिर): यहाँ राजा अपने खास सामंतों से विचार-विमर्श करते थे. इसमें कांच और खुदाई का सुंदर काम हुआ है.
रणथम्भौर दुर्ग: हम्मीर की आन का प्रतीक
हम्मीर देव चौहान की आन-बान का प्रतीक, रणथम्भौर का किला राजस्थान का एक प्राचीन और प्रमुख गिरि दुर्ग है. दिल्ली, मालवा और मेवाड़ के बीच स्थित होने के कारण इस पर लगातार आक्रमण होते रहे.
- दुर्ग की विशेषताएँ:
- यह अरावली की सात ऊँची-नीची पहाड़ियों से घिरा है, इसलिए यह गिरि दुर्ग और वन दुर्ग दोनों की विशेषताओं को समेटे हुए है.
- यह इतनी विषम जगह पर बना है कि दुर्ग के बहुत पास जाने पर ही दिखाई देता है.
- नाम का अर्थ:
- इसका वास्तविक नाम रणस्तम्भपुर था, जिसका अर्थ है ‘रण की घाटी में स्थित नगर’.
- ‘रण’ उस पहाड़ी का नाम है जो किले के नीचे है, और ‘स्तंभ’ उस पहाड़ी का नाम है जिस पर किला बना है.
- प्रशंसा:
- अबुल फजल ने लिखा है: “यह दुर्ग पहाड़ी प्रदेश के बीच में है. इसीलिए लोग कहते हैं कि और दुर्ग नंगे हैं, पर यह बख्तरबंद है.”
- इतिहासकार ओझा ने इसे एक ऊँचे पहाड़ पर अंडाकार आकृति में बना बताया है, जिसके चारों ओर की पहाड़ियों को प्राकृतिक दीवारें कहा जा सकता है.
- ‘नाथावतों के इतिहास’ में इसकी तुलना शिवपिंड पर रखे हुए बेलपत्र से की गई है.
इतिहास और शासक
इस दुर्ग का निर्माण 8वीं शताब्दी के आसपास अजमेर के चौहान शासकों ने करवाया था.
- चौहान शासक:
- पृथ्वीराज का पुत्र गोविंदराज यहाँ का पहला सामंत शासक बना.
- हम्मीर देव चौहान ने 1282-1301 ई. तक शासन किया.
- खिलजी का आक्रमण (1292 ई.):
- जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर हमला किया, लेकिन सफल नहीं हो सका.
- निराशा में उसने कहा, “ऐसे सौ किलों को भी मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर नहीं मानता.”
रणथम्भौर का प्रसिद्ध साका (1301 ई.)
यह साका हम्मीर देव चौहान की शरणागत रक्षा के लिए प्रसिद्ध है, जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मदशाह को शरण दी थी.
- घेराबंदी: अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ हमला किया. घेराबंदी लगभग एक साल तक चली.
- विश्वासघात: हम्मीर के दो मंत्रियों, रतिपाल और रणमल, के विश्वासघात के कारण दुर्ग में अलाउद्दीन का अधिकार हो गया.
- बलिदान: हम्मीर की पत्नी रंगदेवी और उनकी पुत्री देवल दे के नेतृत्व में किले में जल जौहर हुआ, जो रणथम्भौर का पहला साका कहलाता है.
- हम्मीर हठ: हम्मीर की शरणागत रक्षा के लिए यह दोहा प्रसिद्ध है:
सिंघ गमन, सत्पुरुष वच, कदली फलै इक बार।
तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढे न दूजी बार।।
बाद के शासक और घटनाएं
अलाउद्दीन खिलजी के बाद रणथम्भौर कई शासकों के अधिकार में रहा.
- राणा सांगा: खानवा के युद्ध में घायल होने के बाद उन्हें यहीं लाया गया.
- रानी कर्मवती: 1533 ई. में उन्होंने यह किला बहादुरशाह को सौंप दिया.
- मुगलों का शासन: 1569 में बूंदी के राव सुरजन हाड़ा ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर रणथम्भौर उसे सौंप दिया. अकबर ने यहाँ एक शाही टकसाल भी स्थापित की.
- जयपुर रियासत: 18वीं शताब्दी में पचेवर के अनूपसिंह खंगारोत के प्रयासों से यह दुर्ग जयपुर रियासत में शामिल हो गया.
- पुरातत्व सर्वेक्षण: 1964 में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दिया गया.
प्रमुख स्थल और संरचनाएँ
रणथम्भौर दुर्ग में कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं.
- प्रवेश द्वार:
- नौलखा दरवाजा, हाथीपोल, गणेशपोल, सूरजपोल और त्रिपोलिया प्रमुख प्रवेश द्वार हैं.
- त्रिपोलिया को अंधेरी दरवाजा भी कहते हैं, जहाँ से महलों तक एक सुरंग जाती है.
- प्रमुख भवन:
- हम्मीर महल, रानी महल, सुपारी महल, बादल महल और जौरां-भौरा (अनाज का गोदाम).
- 32 खंभों की छतरी: यह हम्मीर के पिता जैत्रसिंह की समाधि है.
- अधूरी छतरी: राणा सांगा की रानी कर्मवती ने एक छतरी का निर्माण शुरू करवाया था, जो अधूरा रह गया.
- धार्मिक स्थल:
- पीर सदरुद्दीन की दरगाह, लक्ष्मी नारायण मंदिर, जैन मंदिर और पूरे देश में प्रसिद्ध गणेश जी का मंदिर.
- पद्मला तालाब, सागर तालाब और रानी तालाब जैसे जलाशय भी हैं. शत्रु के आक्रमण के समय इन तालाबों का पानी तोड़कर बहा दिया जाता था.
गागरोण दुर्ग, झालावाड़: जल दुर्गों का मुकुट
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के सबसे प्राचीन और शक्तिशाली किलों में से एक, गागरोण दुर्ग झालावाड़ से 4 किलोमीटर दूर स्थित है. यह अरावली पर्वतमाला की एक चट्टान पर, कालीसिंध और आहू नदियों के संगम पर बना है. तीन तरफ से नदियों से घिरा होने के कारण यह एक उत्कृष्ट जल दुर्ग है.
- नामकरण:
- इस दुर्ग को प्राचीन काल में धूलरगढ़ या डोडगढ़ भी कहा जाता था, क्योंकि यहाँ डोड (परमार) राजपूतों का शासन था.
- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसका संबंध भगवान कृष्ण के पुरोहित गर्गाचार्य से है, जिसके कारण इसे गर्गरथपुर भी कहा जाता था.
- फ़ारसी ग्रंथों में इसे करकून और कारकून जैसे नामों से जाना जाता है.
- स्थापना:
- डोड शासकों के बाद, यह दुर्ग खींची चौहानों के अधिकार में आ गया.
- चौहान कुल कल्पद्रुम के अनुसार, खींची राजवंश के संस्थापक देवनसिंह (धारू) ने 12वीं शताब्दी में डोड शासक बीजलदेव को हराकर इसका नाम गागरोण रखा.
शिहाब हाकिम ने इसकी सुंदरता की प्रशंसा करते हुए इसे “हिन्दुस्तान के किलों के कण्ठहार का बिचला मोती” कहा है.
गागरोण का साका और प्रमुख युद्ध
गागरोण अपने वीरतापूर्ण साकों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्होंने मेवाड़ और मालवा के इतिहास को प्रभावित किया.
- पहला साका (1423 ई.):
- इस साके के समय गागरोण के शासक अचलदास खींची थे.
- मांडू के सुल्तान अलपखाँ गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया, जिसमें अचलदास वीरगति को प्राप्त हुए.
- उनकी रानियों, जिनमें महारानी पुष्पावती (राणा मोकल की बेटी और कुम्भा की बहन) भी थीं, सहित हजारों वीरांगनाओं ने जौहर किया.
- इस युद्ध का एकमात्र समकालीन विवरण कवि शिवदास गाडण की रचना ‘अचलदास खींची री वचनिका’ में मिलता है.
- दूसरा साका (1444 ई.):
- महमूद खिलजी प्रथम के आक्रमण के समय यह साका हुआ.
- पाल्हणसी ने राणा कुम्भा से मदद मांगी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.
- अंत में पाल्हणसी जंगल में भटकते हुए मारे गए, और वीरों ने केसरिया तथा वीरांगनाओं ने जौहर किया.
- सुल्तान ने जीत के बाद गागरोण का नाम बदलकर ‘मुस्तफाबाद’ रख दिया.
मुगलों और हाड़ा शासकों का योगदान
बाद में, यह किला मेवाड़ के राणा सांगा और फिर मुगलों के अधिकार में रहा.
- अकबर और पृथ्वीराज राठौड़:
- 1561 में गागरोण का किला अकबर को सौंप दिया गया.
- अकबर ने यह दुर्ग बीकानेर के राजा कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज को जागीर में दिया. माना जाता है कि पृथ्वीराज ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वेलि क्रिसन रुक्मणी री’ यहीं रहकर लिखा था.
- हाड़ा शासकों का शासन:
- शाहजहाँ के शासनकाल में यह दुर्ग कोटा के राव मुकुंदसिंह को मिला.
- राव दुर्जनसाल ने किले के भीतर भगवान मधुसूदन का मंदिर बनवाया.
- झाला जालिमसिंह ने किले की सुरक्षा के लिए एक विशाल परकोटे ‘जालिमकोट’ का निर्माण करवाया.
दुर्ग की आंतरिक संरचना और महत्वपूर्ण स्थल
गागरोण दुर्ग अपनी प्राकृतिक सुरक्षा और आंतरिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है.
- सुरक्षा व्यवस्था:
- दुर्ग की बनावट पहाड़ी के अनुरूप होने से यह दूर से दिखाई नहीं देता.
- इसकी सुरक्षा के लिए तीनहरे परकोटे, विशाल बुर्ज और गहरी खाई है.
- प्रमुख प्रवेश द्वारों में सूरजपोल, भैरवपोल और गणेशपोल शामिल हैं.
- आंतरिक स्थल:
- दुर्ग में एक विशाल जौहर कुंड, राजा अचलदास और उनकी रानियों के महल, मधुसूदन मंदिर और शीतलामाता मंदिर हैं.
- सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती (मिट्ठे साहब) की दरगाह भी यहीं है, जिसे औरंगजेब ने बनवाया था.
- किले के पास एक ऊँची पहाड़ी गोध कराई है, जहाँ से कैदियों को मृत्युदंड दिया जाता था.
- पास ही संत पीपाजी की छतरी भी है, जिन्होंने राजपाट त्यागकर भक्ति का मार्ग अपनाया था.
- गागरोणी तोते:
दुर्ग के चारों ओर फैला आगझर वन पक्षियों से गुंजित रहता है. यहाँ के तोते मनुष्य की आवाज की हू-ब-हू नकल करने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं.
सोनार दुर्ग, जैसलमेर: थार का स्वर्णिम किला
थार रेगिस्तान के मध्य स्थित, जैसलमेर का किला सोनारगढ़ या गोल्डन फोर्ट कहलाता है. यह पूरी तरह से पीले पत्थरों से बना है, जो सूरज की किरणों में सोने जैसा चमकता है. इस किले के बारे में कहावत है:
घोड़ा कीजे काठ का, पिंड कीजे पाषाण,
बख्तर कीजे लोह का, तब देखों जैसाण.
- स्थापना:
- राव जैसल ने 12 जुलाई, 1155 ई. को इस दुर्ग की नींव रखी.
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार, राव जैसल केवल प्रवेश द्वार और कुछ भवन ही बनवा पाए थे. उनके पुत्र शालिवाहन द्वितीय ने अधिकांश निर्माण कार्य पूरा करवाया.
- इस किले को बनने में लगभग सात साल लगे.
दुर्ग की वास्तुकला और संरचना
जैसलमेर का किला स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
- बुर्ज और परकोटा:
- त्रिकूटा पहाड़ी पर बना यह किला दूर से अंगड़ाई लेते सिंह के समान दिखता है.
- यह दुनिया में सबसे ज्यादा 99 बुर्ज वाला दुर्ग है.
- इसका दोहरा परकोटा ‘कमरकोट’ कहलाता है, जो इसे अभेद्य बनाता है.
- निर्माण सामग्री:
- यह स्थानीय गहरे पीले पत्थरों को बिना चूने की सहायता के जोड़कर बनाया गया है.
- दूर से यह ऐसा लगता है, मानो पहाड़ पर लंगर डाले कोई जहाज खड़ा हो.
- प्रवेश द्वार:
- अक्षयपोल किले का मुख्य प्रवेश द्वार है.
- अन्य मजबूत दरवाजों में सूरजपोल, गणेशपोल और हवापोल शामिल हैं.
- आंतरिक महल:
- महाराजा अखैसिंह द्वारा निर्मित सर्वोत्तम विलास (शीश महल) और मूलराज द्वितीय द्वारा निर्मित रंगमहल अपनी जालियों और झरोखों के लिए प्रसिद्ध हैं.
- गज विलास और जवाहर विलास महल पत्थरों के बारीक काम के लिए जाने जाते हैं.
- बादल महल अपने प्राकृतिक परिवेश के लिए प्रसिद्ध है.
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
जैसलमेर दुर्ग धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का भी केंद्र है.
- मंदिर:
- यहाँ के प्राचीन जैन मंदिर (पार्श्वनाथ, संभवनाथ, ऋषभदेव) आबू के दिलवाड़ा मंदिरों से प्रतिस्पर्धा करते हैं.
- आदिनाथ का मंदिर 12वीं शताब्दी में बना सबसे प्राचीन मंदिर है.
- लक्ष्मीनारायण मंदिर भी अपनी शिल्प और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है.
- स्वांगिया देवी का मंदिर भी यहाँ स्थित है.
- जलाशय:
- जनश्रुति है कि किले में स्थित जैसल कुएँ का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से किया था.
- ग्रंथ भंडार:
- दुर्ग की एक महत्वपूर्ण विशेषता जिनभद्र सूरी ग्रंथ भंडार है, जिसमें ताड़पत्रों पर लिखे दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ हैं.
- आधुनिक महत्व:
- चित्तौड़गढ़ के बाद जैसलमेर ही एकमात्र ऐसा किला है, जहाँ आज भी बड़ी संख्या में लोग रहते हैं.
- प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजित रे ने इसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर ‘सोनार किला’ नाम से एक फिल्म भी बनाई थी.
जैसलमेर का साका: वीरता और बलिदान की गाथा
जैसलमेर का किला भाटी वीरों के पराक्रम और जौहर की कहानियों के लिए प्रसिद्ध है. यहाँ ढाई साके हुए, जिनमें से एक अर्द्ध साका कहलाता है.
- पहला साका:
- दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग को लगभग आठ साल तक घेरे रखा.
- इस युद्ध में भाटी शासक रावल मूलराज और कुंवर रतनसी समेत कई योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए, और महिलाओं ने जौहर किया.
- दूसरा साका:
- यह साका फ़िरोजशाह तुगलक के शासनकाल में हुआ.
- इसमें रावल दूदा, त्रिलोकसी और अन्य भाटी सरदारों ने वीरगति प्राप्त की, और जौहर हुआ.
- अर्द्ध साका (1550 ई.):
- यह साका जैसलमेर के राव लूणकरण के समय कंधार के शासक अमीर अली के छलपूर्ण हमले के दौरान हुआ.
- इसमें वीरों ने केसरिया तो पहना, लेकिन जौहर नहीं हुआ, इसलिए इसे ‘अर्द्ध साका’ कहा जाता है.
- इस संघर्ष में राव लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुए.
बीकानेर का किला (जूनागढ़): उत्तरी राजस्थान का गौरव
उत्तरी राजस्थान के सबसे मजबूत किलों में से एक जूनागढ़ थार मरुस्थल के बीच स्थित है, इसलिए इसे धान्वन दुर्ग की श्रेणी में रखा जाता है.
- स्थापना:
- बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी ने 1485 ई. में एक पुराने किले की नींव रखी थी.
- वर्तमान भव्य जूनागढ़ किले का निर्माण महाराजा रायसिंह ने करवाया था.
- निर्माण का आदेश:
- दयालदास की ख्यात के अनुसार, महाराजा रायसिंह ने 1585 में दक्षिण अभियान के दौरान अपने मंत्री करमचंद को नया किला बनवाने का आदेश दिया था.
- किले की नींव 30 जनवरी, 1589 को रखी गई और यह 17 जनवरी, 1597 को बनकर तैयार हुआ.
माना जाता है कि पुराने किले की जगह बनने के कारण ही इसे ‘जूनागढ़’ कहा गया.
किले की संरचना और स्थापत्य
जूनागढ़ की बनावट और वास्तुकला अद्भुत है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम शैलियों का सुंदर समन्वय दिखता है.
- आकृति: यह आगरा के लाल किले की तरह लाल पत्थरों से बना है. यह चतुष्कोण या चतुर्भुजाकार है और लगभग 1078 गज की परिधि में फैला है.
- सुरक्षा:
- किले की दीवारों में 37 विशाल बुर्जें हैं, जो लगभग 40 फीट ऊँची हैं.
- इसके चारों ओर 20-25 फीट गहरी और चौड़ी खाई (परिखा) है.
- प्रवेश द्वार:
- दो प्रमुख प्रवेश द्वार कर्णपोल और चांदपोल हैं.
- पाँच आंतरिक द्वार हैं: दौलतपोल, फतेहपोल, रतनपोल, सूरजपोल और ध्रुवपोल.
- सूरजपोल पर किले के संस्थापक राजा रायसिंह की प्रशस्ति लिखी है.
- सूरजपोल के पास 1567 के चित्तौड़ साके में शहीद हुए जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया की हाथी पर बैठी मूर्तियाँ स्थापित हैं.
भव्य महल और आंतरिक स्थल
जूनागढ़ के भीतर बने महल अपनी शिल्प और सुंदरता के लिए मशहूर हैं.
- प्रमुख महल:
- अनूप महल: यहाँ बीकानेर के राजाओं का राजतिलक होता था. दीवारों पर सोने की पच्चीकारी आज भी चमकदार है.
- फूल महल और गज मंदिर: ये शीशे की बारीक कटाई और सजीव चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं.
- चंद्र महल, रतन निवास, रंग महल, कर्ण महल, दलेल निवास, छत्र महल, लाल निवास, सरदार निवास, गंगा निवास, चीनी बुर्ज, सुनहरी बुर्ज, विक्रम विलास, सूरत निवास, मोती महल, कुंवरपदा और जालीदार बारहदरियाँ भी प्रमुख हैं.
- धार्मिक स्थल:
- किले में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर है.
- सूरजपोल के पास एक गणेशजी का मंदिर भी है.
- हर मंदिर में विवाह और अन्य उत्सव होते थे.
- अन्य आकर्षण:
- किले में एक समृद्ध संग्रहालय है, जिसमें दुर्लभ प्राचीन वस्तुएँ, शस्त्र, प्रतिमाएँ और हस्तलिखित ग्रंथ रखे हैं.
- महाराजा गंगासिंह के दो क्षतिग्रस्त लड़ाकू विमान भी यहाँ रखे हैं, जो उन्हें प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भेंट में मिले थे.
- दुर्गवासियों को पानी की आपूर्ति के लिए रामसर और रानीसर कुएँ हैं.
जूनागढ़ का इतिहास और प्रमुख घटनाएँ
मुगलों के साथ बीकानेर के शासकों की मित्रता के कारण, जूनागढ़ पर बड़े आक्रमण नहीं हुए.
- जोधपुर और नागौर से संघर्ष: 1740 ई. में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने बीकानेर पर हमला किया. महाराजा जोरावरसिंह ने सवाई जयसिंह से मदद मांगी, जिन्होंने जोधपुर पर चढ़ाई कर दी, जिससे अभयसिंह को घेरा उठाना पड़ा.
अंग्रेजों से संबंध: 1808 में जब एल्फिंस्टन काबुल जा रहे थे, तो महाराजा सूरतसिंह ने उन्हें किले की चाबियाँ भेंट कर कंपनी से संरक्षण की मांग की, लेकिन एल्फिंस्टन ने इसे स्वीकार नहीं किया.
मेहरानगढ़: रणबांकुरे राठौड़ों की गौरव गाथा
जोधपुर का किला मेहरानगढ़, राठौड़ों की वीरता और पराक्रम का प्रतीक है. इस किले का निर्माण जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने 12 मई, 1459 ई. को एक विशाल पहाड़ी पर करवाया था. इसी किले के चारों ओर उन्होंने जोधपुर शहर बसाया, जो उन्हीं के नाम पर कहलाया. जोधपुर से पहले मारवाड़ की राजधानी मंडोर थी.
- किले के नाम:
- अपनी विशालता के कारण यह मेहरानगढ़ कहलाया.
- मयूर (मोर) के आकार का होने के कारण इसे मयूरध्वजगढ़ भी कहते हैं.
- ख्यातों के अनुसार, इसका मूल नाम चिंतामणि था.
- सूर्यवंशी होने के कारण इसे मिहिरगढ़ भी कहा जाता था, जो बाद में मेहरानगढ़ बन गया.
- ‘चिड़िया टूक’ पहाड़ी:
- यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर बना है, उसका नाम प्रसिद्ध योगी चिड़ियानाथ के नाम पर ‘चिड़िया टूक’ पड़ा था.
- बलिदान की कहानी:
- लोककथा के अनुसार, किले की नींव में राजिया/राजाराम नामक व्यक्ति को जीवित गाड़ दिया गया था, ताकि यह किला राव जोधा के वंशजों के हाथ से कभी न निकले.
दुर्ग की संरचना और भव्यता
यह विशाल और मजबूत दुर्ग लगभग 400 फीट ऊँचा है.
- सुरक्षा दीवार:
- किले के चारों ओर एक मजबूत परकोटा है, जिसकी ऊँचाई 20 से 120 फीट तक है और चौड़ाई 12 से 20 फीट है.
- किले का क्षेत्रफल लगभग 500 गज लंबा और 250 गज चौड़ा है.
- प्रमुख प्रवेश द्वार:
- जयपोल: इसका निर्माण महाराजा मानसिंह ने 1808 में करवाया था. इसके किवाड़ महाराजा अभयसिंह के सामंत अमरसिंह अहमदाबाद से लूटकर लाए थे.
- फतेहपोल: महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर से मुगल आधिपत्य खत्म करने की खुशी में इसका निर्माण करवाया.
- लोहापोल: इसका निर्माण 1548 में राव मालदेव ने शुरू किया और महाराजा विजयसिंह ने पूरा करवाया. इस दरवाजे के पास धन्ना और भींवा के बलिदान की गाथा जुड़ी है.
- अन्य द्वार: ध्रुवपोल, सूरजपोल, इमरतपोल और भैरोंपोल.
इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ
मेहरानगढ़ ने अपने इतिहास में कई उतार-चढ़ाव देखे.
- बीका और सूजा: राव जोधा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बीका ने राजचिह्न लेने के लिए जोधपुर पर चढ़ाई की, लेकिन माता जसमादे के कहने पर वापस लौट गए.
- शेरशाह सूरी: 1544 में अफगान शासक शेरशाह सूरी ने इस किले पर अधिकार कर लिया और एक मस्जिद बनवाई.
- औरंगजेब का शासन: 1674 में महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने जोधपुर पर मुगल खालसा (प्रत्यक्ष शासन) लागू कर दिया.
- दुर्गादास का संघर्ष: वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ और अन्य सरदारों के अथक संघर्ष के बाद, 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर को वापस जीत लिया.
भव्य राजमहल और कला
मेहरानगढ़ के महल अपनी शानदार वास्तुकला और कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध हैं.
- विद्वानों के मत:
- ब्रिटिश लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने लिखा है कि “मेहरानगढ़ का निर्माण फरिश्ते, परियों और देवताओं की करामात है.”
- कर्नल जेम्स टॉड ने कहा कि “अंधे के बेटे इस महल की खिड़कियों से ही अपनी सल्तनत पर आधिपत्य रख सकते थे.”
- प्रमुख महल:
- मोतीमहल: महाराजा सुरसिंह द्वारा निर्मित, यह सुनहरे अलंकरण और सजीव चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है.
- फूलमहल: महाराजा अभयसिंह ने इसका निर्माण करवाया था और यह पत्थर पर बारीक खुदाई के लिए जाना जाता है.
- फतेह महल: जोधपुर पर से मुगल आधिपत्य खत्म होने की खुशी में महाराजा अजीतसिंह ने इसे बनवाया था.
- शृंगार चौकी: दौलतखाने के आंगन में बनी इस चौकी पर जोधपुर के राजाओं का राजतिलक होता था.
धार्मिक स्थल और तोपें
किले के भीतर कई मंदिर और ऐतिहासिक तोपें भी मौजूद हैं.
- प्रमुख मंदिर:
- चामुंडा माता मंदिर: राव जोधा ने किले की स्थापना के साथ ही इसका निर्माण करवाया था.
- नागणेची माता मंदिर: यह राठौड़ों की कुलदेवी का मंदिर है.
- मुरली मनोहरजी और आनंदघनजी के मंदिर.
- भूरे खाँ की मज़ार: दुर्ग के भीतर भूरे खाँ की मज़ार भी है.
- ऐतिहासिक तोपें:
- किले में कई ऐतिहासिक तोपें रखी हैं, जैसे किलकिला, शम्भुवाण, जमजमा, कड़क बिजली, गजनी खां, नुसरत आदि.
- किलकिला तोप महाराजा अजीतसिंह ने बनवाई थी.
- शम्भुवाण तोप महाराजा अभयसिंह को अहमदाबाद के सूबेदार सरबुलंद खां को हराने पर मिली थी.
- एक खास तोप दौलतखाने में रखी है, जिसके अंग मछली, मगरमच्छ, शेर और सिंह जैसे हैं, और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भी भेजा जाता है.
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- जल आपूर्ति: किले में पानी के मुख्य स्रोत राणीसर और पदमसर तालाब हैं.
- शहरपनाह: किले की तलहटी में बसे जोधपुर शहर के चारों ओर एक मजबूत दीवार (शहरपनाह) बनी है, जिसमें 101 विशाल बुर्ज और 6 दरवाजे हैं.
- संग्रहालय: 1922 में यहाँ एक संग्रहालय स्थापित किया गया, जहाँ जोधपुर राजपरिवार की कलाकृतियाँ, हथियार, पोशाकें और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएँ रखी गई हैं.
सिवाणा दुर्ग: मारवाड़ का 'अणखला किला'
मारवाड़ के पर्वतीय दुर्गों में ‘अणखला किला’ के नाम से प्रसिद्ध सिवाणा दुर्ग का विशेष महत्व है. यह बालोतरा जिले में चारों ओर रेतीले भाग से घिरा है, लेकिन इसके साथ ही छप्पन पहाड़ों का सिलसिला भी जुड़ा हुआ है.
- पहाड़ी और नाम:
- यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर बना है, वह इस श्रृंखला की सबसे ऊँची पहाड़ी है, जिसे हलदेश्वर का पहाड़ कहते हैं.
- इस दुर्ग का नामकरण वीरनारायण ने कुमथाना किया था.
- पहाड़ी पर बहुतायत में मिलने वाली कुमट झाड़ी के कारण इसे कुमट दुर्ग भी कहते थे.
- यह जालौर दुर्ग का सहायक दुर्ग था.
- स्थापना:
- सिवाणा की स्थापना परमार राजा भोज के पुत्र वीर नारायण ने 954 ई. में की थी.
- बाद में यह जालौर के सोनगरा चौहानों के अधिकार में आ गया.
- टोलेमी ने रेगिस्तान के बीच में स्थित पहाड़ियों में ‘जोआना’ नामक जिस नगर का वर्णन किया है, वह वास्तव में सिवाणा ही है.
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और पहला साका
सिवाणा को सबसे बड़ी चुनौती सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी से मिली.
- शासक: अलाउद्दीन के आक्रमण के समय सिवाणा का शासक सातलदेव था, जो जालौर के शासक कान्हड़देव का भतीजा था.
- पहला साका (1310 ई.):
- अलाउद्दीन ने 1305 ई. में पहला हमला किया, जिसका वीर सातलदेव और उनके पुत्र सोम (सोमेश्वर) ने डटकर मुकाबला किया.
- 1310 ई. में अलाउद्दीन के भीषण आक्रमण के दौरान, वीर सातलदेव और सोमेश्वर ने वीरगति प्राप्त की.
- दुर्ग की वीरांगनाओं ने जौहर किया, जो सिवाणा का पहला साका कहलाता है.
- खिलजी का कब्जा:
- अलाउद्दीन ने इस दुर्ग का अधिकार कमालुद्दीन गुर्ग को सौंप दिया और इसका नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रखा.
- अमीर खुसरो ने ‘खजाइन-उल-फतह’ में लिखा है कि राजपूत बहुत बहादुर थे, और सिर कटने के बाद भी लड़ते रहे.
मुगल काल और दूसरा साका
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद यह दुर्ग कई शासकों के हाथों में रहा, जिसमें दूसरा साका भी हुआ.
- राव मालदेव का आश्रय स्थल:
- 1538 ई. में राव मालदेव ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया और इसकी रक्षा व्यवस्था को मजबूत किया.
- गिरी-सुमेल युद्ध के बाद, शेरशाह की सेना का पीछा करने पर उन्होंने यहीं शरण ली थी.
- राव चंद्रसेन का प्रतिरोध:
- राव चंद्रसेन ने इसी किले को अपना केंद्र बनाकर अकबर की सेनाओं का लंबे समय तक प्रतिरोध किया.
- दूसरा साका (अकबर के शासनकाल में):
- मुगल बादशाह अकबर ने जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह को सिवाणा पर आक्रमण करने का आदेश दिया, क्योंकि वह यहाँ के शासक कल्ला राठौड़ से नाराज था.
- कल्ला राठौड़ ने शाही सेना का मुकाबला करते हुए वीरगति प्राप्त की.
- कहा जाता है कि सिर कटने के बाद भी कल्ला का धड़ लड़ता रहा, इसलिए उन्हें लोक देवता के रूप में पूजा जाता है.
- कल्ला की पत्नी हाड़ी रानी (बूंदी के राव सुरजन हाड़ा की पुत्री) ने अन्य वीरांगनाओं के साथ जौहर किया.
- इस साके के समय का एक प्रसिद्ध दोहा है:
किलो अणखलो यूं कहे, आव कल्ला राठौड़।
मो सिर उतरे मेहणो, तो सिर बांधै मौड़।।
प्रमुख धार्मिक स्थल
सिवाणा दुर्ग में हल्देश्वर महादेव मंदिर दर्शनीय है.
सोजत का किला, पाली: मारवाड़ का सीमावर्ती दुर्ग
सोजत का किला मारवाड़ और मेवाड़ के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती दुर्ग है. सूकड़ी नदी के किनारे बसा यह प्राचीन स्थान पहले तांबावती (त्रंबावती) के नाम से भी प्रसिद्ध था. यह कस्बा उजड़ने के बाद, हूल क्षत्रियों ने 1111 विक्रम संवत में इसे सेजल माता के नाम पर फिर से बसाया, जिसके बाद इसका नाम सोजत पड़ा.
- विभिन्न शासक:
- सोजत पर पंवार, हूल, सोनगरा चौहान, सींधल, सोलंकी, मेवाड़ के सिसोदिया, राठौड़ और मुगल शासकों का अधिकार रहा.
किले का निर्माण और इतिहास
- स्थापना:
- राव जोधा के बड़े पुत्र नीम्बा ने 1460 ई. में नानी सीरड़ी नामक पहाड़ी पर सोजत के वर्तमान दुर्ग का निर्माण करवाया.
- ‘जोधपुर राज्य की ख्यात’ में राव मालदेव को भी सोजत के किले का निर्माता माना गया है.
- राव चंद्रसेन और मुगल शासन:
- यह किला जोधपुर के स्वतंत्रता-प्रेमी शासक राव चंद्रसेन के अधिकार में रहा.
- अकबर ने चंद्रसेन से इसे छीनकर राव मालदेव के पुत्र राम को दे दिया. राम द्वारा बनवाया गया रामेलाव तालाब आज भी किले में मौजूद है.
- राठौड़ों का वर्चस्व:
- सोजत पर अधिकांश समय तक राठौड़ों का ही अधिकार रहा.
- जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने पुराने किले की मरम्मत करवाई और एक और पहाड़ी पर नयाकोट (नरसिंहगढ़) बनवाया था.
किले की संरचना
सोजत का किला एक छोटा पहाड़ी दुर्ग है, जो फिलहाल खंडित अवस्था में है.
- प्रमुख भवन और प्रवेश द्वार:
- जनानी ड्योढ़ी, दरीखाना और तबेला किले के प्रमुख भवन हैं.
- सूरजपोल और चांदपोल इसके मुख्य प्रवेश द्वार हैं.
जालौर दुर्ग: सोनगरा चौहानों का अजेय गढ़
पश्चिमी राजस्थान के सबसे प्राचीन और मजबूत किलों में से एक, जालौर दुर्ग सुकड़ी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है.
- प्राचीन नाम: प्राचीन साहित्य में इसे जाबालिपुर और जालहुर जैसे नामों से जाना जाता था.
- पहाड़ी का नाम: जिस विशाल पहाड़ी पर यह किला बना है, उसे सोनगिरी (स्वर्णगिरी), सुवर्णगिरी और कनकाचल भी कहते हैं.
- दुर्ग का नाम: इस कारण किले को सोनगढ़ या सोनलगढ़ भी कहा गया. यहीं से चौहानों की एक शाखा ‘सोनगरा’ कहलाई.
निर्माण और शासक
जालौर दुर्ग के निर्माण को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग राय है, लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना है.
- प्रतिहारों का शासन: प्रतिहारों के शासनकाल (750-1018 ई.) में जालौर एक समृद्ध नगर था.
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार, प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की और संभवतः इसी दुर्ग का निर्माण भी करवाया.
- परमारों का योगदान: डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा परमारों को इसका संस्थापक मानते हैं, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि उन्होंने प्रतिहारों द्वारा निर्मित इस प्राचीन दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया.
- चौहानों का आगमन: नाडौल के युवराज कीर्तिपाल चौहान ने परमारों को हराकर जालौर पर अधिकार किया. उनके वंशज ही ‘सोनगरे’ चौहान कहलाए.
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और साका
जालौर का दुर्ग अपनी अजेयता के लिए जाना जाता था, जिस पर आक्रमण करना किसी भी शासक के लिए आसान नहीं था.
- प्रशंसा: ‘ताज-उल-मासिर’ के लेखक हसन निजामी ने इसे “बहुत ही शक्तिशाली और अजेय दुर्ग” बताया, जिसके द्वार किसी भी विजेता द्वारा नहीं खोले जा सके.
- खिलजी का आक्रमण (1311-12 ई.):
- अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का एक प्रमुख कारण यह था कि 1298 ई. में यहाँ के शासक कान्हड़देव (तब युवराज) ने गुजरात से लौटती शाही सेना को अपने राज्य से गुजरने नहीं दिया था.
- अलाउद्दीन ने सिवाणा जीतने के बाद कमालुद्दीन को जालौर अभियान का जिम्मा सौंपा.
- लंबे घेरे के बाद, बीका नामक दहिया राजपूत सरदार के विश्वासघात के कारण, कान्हड़देव अपने पुत्र वीरमदेव के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.
- दुर्ग की सैकड़ों महिलाओं ने जौहर किया.
- अलाउद्दीन के बाद: अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया और यहाँ अलाई मस्जिद का निर्माण करवाया.
दुर्ग का सामरिक महत्व और अन्य घटनाएँ
अपनी सामरिक स्थिति के कारण जालौर दुर्ग ने कई भीषण प्रहार झेले, लेकिन यह मारवाड़ के शासकों का आश्रय स्थल भी रहा.
- राठौड़ों का अधिकार: मालदेव ने 1531-1562 में इस पर राठौड़ों का अधिकार स्थापित किया.
- ‘आभ फटै, घर ऊलटै…’: जोधपुर की गद्दी के लिए संघर्ष के दौरान महाराजा मानसिंह ने इसी दुर्ग में शरण ली थी. जब महाराजा भीमसिंह ने उन्हें दुर्ग खाली करने को कहा, तो उन्होंने वीरोचित जवाब दिया:
आभ फटै, घर ऊलटै, कटै बगतरों कोर।
सीस पड़े, धड़ तड़फड़े, जद छूटै जालौर।।
• स्वतन्त्रता आंदोलन: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेशीलाल व्यास, मथुरादास माथुर, फतहराज जोशी और तुलसीदास राठी जैसे नेताओं को यहाँ नजरबंद किया गया था.
दुर्ग के प्रमुख स्थल और स्थापत्य
जालौर दुर्ग लगभग 1,200 फीट ऊँची पहाड़ी पर बना है, जो 800 गज लंबा और 400 गज चौड़ा है.
- प्रवेश द्वार:
- दुर्ग में प्रवेश का मुख्य मार्ग शहर के भीतर से है.
- सूरजपोल किले का पहला प्रवेश द्वार है, जिसकी धनुषाकार छत कला और सुरक्षा का सुंदर मेल है.
- अन्य द्वार ध्रुवपोल, चाँदपोल और सिरेपोल भी मजबूत और विशाल हैं.
- प्रमुख ऐतिहासिक स्थल:
- महाराजा मानसिंह के महल और झरोखे
- दो मंजिला रानी महल
- प्राचीन जैन मंदिर, चामुंडा माता और जोगमाया के मंदिर
- संत मल्लिकशाह की दरगाह
- परमार कालीन कीर्ति स्तंभ
- तोपखाना:
- किले का आकर्षक तोपखाना मूल रूप से परमार राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी, जिसे बाद में मुस्लिम शासकों ने मस्जिद में बदल दिया.
- जलस्रोत:
- किले के भीतर जाबालिकुंड और सोहनबाव सहित कई जलाशय और बावड़ियाँ हैं.
- तुलना: कवि पद्मनाथ के ‘कान्हड़दे प्रबंध’ में जालौर के इस किले की तुलना चित्तौड़, चम्पानेर और ग्वालियर जैसे प्रसिद्ध दुर्गों से की गई है.
बूंदी का तारागढ़ किला: हाड़ाओं के शौर्य की गाथा
हाड़ा राजपूतों की अप्रतिम वीरता का प्रतीक, बूंदी का तारागढ़ किला गिरि दुर्ग का एक शानदार उदाहरण है. इसकी मजबूत और ऊँची दीवारें, विशाल प्रवेश द्वार और जल से भरे तालाब एक मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करते हैं.
- स्थापना:
- हाड़ा शासक देवासिंह (राव देवा) ने बूंदी में अपनी राजधानी स्थापित की.
- उनके वंशज राव बरसिंह ने 1354 ई. में मेवाड़, मालवा और गुजरात के संभावित आक्रमणों से सुरक्षा के लिए इस किले का निर्माण करवाया.
- ऊँचे पर्वत शिखर पर स्थित होने के कारण यह धरती से आसमान के तारे जैसा दिखाई देता था, इसलिए इसका नाम तारागढ़ पड़ा. अजमेर में भी इसी नाम का एक और दुर्ग है.
- वास्तुशिल्प:
- यह दुर्ग लगभग 1426 फीट ऊँचे पर्वत शिखर पर स्थित है और पाँच मील के क्षेत्र में फैला हुआ है.
- इसका स्थापत्य कछवाहा राजवंश की पूर्व राजधानी आमेर से मिलता-जुलता है.
ऐतिहासिक घटनाएँ और कुम्भा हाड़ा का बलिदान
बूंदी के तारागढ़ किले पर अधिकार करने के लिए कई प्रयास हुए.
- महाराणा लाखा और मिट्टी का किला:
- महाराणा लाखा (1382-1421 ई.) कई प्रयासों के बाद भी बूंदी के किले पर अधिकार नहीं कर पाए.
- उन्होंने एक मिट्टी का नकली किला बनवाया और उसे ध्वस्त करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी की.
- इस नकली किले की रक्षा के लिए कुम्भा हाड़ा ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया, जिससे यह लोकोक्ति चरितार्थ हुई:
बलहठ बंका देवड़ा, करतब बंका गौड़।
हाड़ा बांका गाढ़ में, रणबंका राठौड़।।
राजमहल और स्थापत्य कला की उत्कृष्टता
बूंदी के राजमहल अपनी सुंदरता और कला के लिए प्रसिद्ध हैं.
- कर्नल टॉड की प्रशंसा: इतिहासकार कर्नल टॉड ने बूंदी के राजमहलों को राजस्थान के सभी रजवाड़ों के महलों में सर्वश्रेष्ठ कहा है.
- रूडयार्ड किपलिंग का विवरण: 1886 में भारत आए ब्रिटिश लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने इन महलों के बारे में लिखा है, “ये महल मानव द्वारा नहीं, बल्कि प्रेतों द्वारा बनाए गए लगते हैं.” उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘किम’ का कुछ हिस्सा यहीं बैठकर लिखा था.
- प्रमुख महल:
- छत्र महल, अनिरुद्ध-महल, रतन महल, बादल महल, फूल-महल स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.
- इन महलों की सबसे बड़ी विशेषता इनके भीतर मौजूद दुर्लभ और जीवंत भित्तिचित्र हैं, जो बूंदी चित्रशैली का प्रतिनिधित्व करते हैं.
- चित्रशाला (रंगविलास): महाराव उम्मेदसिंह के शासनकाल में निर्मित यह चित्रशाला बूंदी चित्रशैली का बेहतरीन उदाहरण है.
दुर्ग के प्रमुख द्वार और संरचनाएँ
तारागढ़ किले में प्रवेश के कई प्रमुख द्वार हैं और इसके भीतर कई महत्वपूर्ण संरचनाएँ हैं.
- प्रवेश द्वार:
- हाथीपोल, गणेशपोल और हजारीपोल दुर्ग के मुख्य द्वार हैं.
- हजारी गेट से पहले राजा उम्मेदसिंह के घोड़े की प्रतिमा और उसके आगे हाथी शिव प्रसाद की प्रतिमा है, जिसे शाहजहाँ ने राजा छत्रसाल को दिया था.
- हाथीपोल के दोनों ओर हाथियों की दो सजीव पाषाण प्रतिमाएँ हैं, जिन्हें महाराव रतनसिंह ने स्थापित करवाया था.
- रतन दौलत दरीखाना: यह हाथीपोल के दूसरी ओर है, जहाँ बूंदी के राजाओं का राजतिलक होता था.
- सुरक्षा और संरचनाएँ:
- दुर्ग के चारों ओर तिहरा परकोटा बना हुआ है.
- किले में एक विशाल बुर्ज है जिसे भीमबुर्ज या चौबुर्ज कहते हैं, जिस पर एक बड़ी तोप ‘गर्भ गुंजन’ रखी है.
- गर्भ गुंजन तोप: इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि जब यह चलती थी, तो इसकी गर्जना से पेट तक थर्रा जाता था.
- अन्य स्थल: जीवरखा महल, दीवान-ए-आम, सिलहखाना, नौबतखाना, दूधा महल, अश्वशाला, चौरासी खंभों की छतरी, शिकार बुर्ज, तथा फूलसागर, जैतसागर और नवलसागर जैसे सरोवर बूंदी के वैभव की झलक प्रस्तुत करते हैं.
- बूंदी दुर्ग का सबसे प्राचीन निर्माण दूधा महल है, जबकि जीवरखा महल में हाड़ाओं का खजाना रखा जाता था.
तारागढ़, अजमेर: इतिहास का गवाह
अरावली पर्वतमाला के ऊँचे शिखर पर स्थित अजमेर का तारागढ़ किला कई नामों से प्रसिद्ध है, जैसे अजयमेरु और गढ़ बीटली.
- निर्माण:
- चौहान शासक अजयराज को इसका निर्माता माना जाता है, जिनके नाम पर यह किला अजयमेरु दुर्ग कहलाया.
- कुछ साक्ष्यों के अनुसार, शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों ने अरब खलीफाओं के आक्रमण से सुरक्षा के लिए इसे बनवाया था.
- डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मानना है कि राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज ने इसका कुछ हिस्सा बनवाया और अपनी पत्नी तारा के नाम पर इसका नाम रखा.
- गढ़ बीटली नाम:
- कुछ लोगों का मानना है कि यह उस पहाड़ी के नाम पर है, जिस पर यह बना है.
- एक अन्य मत के अनुसार, मुगल बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल में यहाँ के दुर्गाध्यक्ष वीठलदास गौड़ (1644-1656 ई.) ने इसका जीर्णोद्धार करवाया, जिसके नाम पर इसका नाम गढ़ बीटली पड़ा.
बाँको है गढ़ बीठली, बाँको भड़ बीसल्ल।
खाग खेचतो खेत मझ, दलमलतो अरिदल्ल।।
भौगोलिक विशेषताएँ और सामरिक महत्व
यह किला राजस्थान के लगभग केंद्र में स्थित है.
- ऊँचाई:
- कर्नल टॉड के अनुसार, इसकी ऊँचाई 800 फीट है.
- यह समुद्र तल से 2,855 फीट ऊँची पहाड़ी पर बना है और 80 एकड़ के क्षेत्र में फैला है.
- राजस्थान का जिब्राल्टर:
- विशप हैबर ने कहा था कि अगर इसका जीर्णोद्धार यूरोपीय तकनीक से हो, तो यह दूसरा जिब्राल्टर बन सकता है.
- इसी कारण इसे ‘राजस्थान का जिब्राल्टर’ भी कहा जाता है.
- इतिहासकार हरविलास शारदा के अनुसार, यह भारत का पहला गिरि दुर्ग हो सकता है.
आक्रमणों का केंद्र और ऐतिहासिक घटनाएँ
तारागढ़ किले ने महमूद गजनवी के समय से लेकर अंग्रेजों के नियंत्रण में आने तक कई आक्रमणों का सामना किया. हरविलास शारदा के अनुसार, राजस्थान के सभी किलों में सर्वाधिक आक्रमण तारागढ़ पर ही हुए.
- प्रमुख घटनाएँ:
- महमूद गजनवी: 1024 ई. में उसने घेरा डाला, लेकिन घायल होने के कारण उसे घेरा उठाना पड़ा.
- मुहम्मद गौरी: तराइन के दूसरे युद्ध के बाद उसने इस पर अधिकार कर लिया.
- पृथ्वीराज: 1505 में उसने मुस्लिम गवर्नर को मारकर इस पर अधिकार किया.
- मालदेव: उन्होंने किले का जीर्णोद्धार करवाया और अरहट से पानी पहुँचाने की व्यवस्था की.
- ‘रूठी रानी’ उमादे: मालदेव की पत्नी उमादे ने तारागढ़ को अपना निवास बनाया था.
- दाराशिकोह: धौलपुर युद्ध में हारने के बाद उसने यहीं शरण ली थी.
- मराठा: 1756 ई. में मराठा सेनानायक जयप्पा सिंधिया की हत्या के हर्जाने के रूप में यह किला मराठों को दे दिया गया.
दुर्ग के प्रमुख द्वार और संरचनाएँ
तारागढ़ आज पूरी तरह से जर्जर अवस्था में है, लेकिन इसके अवशेष इसकी भव्यता को दर्शाते हैं.
- प्रवेश द्वार:
- विजयपोल, लक्ष्मीपोल, फूटा दरवाजा, पानीपोल, हाथीपोल, अरकोट दरवाजा और बड़ा दरवाजा.
- बुर्ज:
- इसकी प्राचीर में 14 विशाल बुर्ज हैं, जिनमें घूँघट, गूँगड़ी, फूटी बुर्ज, श्रृंगार चंवरी, नक्कारची, जानू जानू नायक आदि प्रमुख हैं.
- जलस्रोत:
- किले के भीतर पाँच बड़े जलाशय हैं, जैसे नाना साहब का झालरा, गोल झालरा, इब्राहिम का झालरा और बड़ा झालरा.
- शेरशाह ने यहाँ पानी की कमी को देखते हुए हफ्फज जमाल चश्मे से पानी पहुँचाने की व्यवस्था करवाई थी, जिसे ‘शरी चश्म’ कहा गया.
- अन्य स्थल:
- भीतर प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरां साहेब (सैयद हुसैन खिंगसवार मीरान) की दरगाह है, जिन्होंने 1202 ई. में किले की रक्षा के लिए अपने प्राण दिए थे.
- पहाड़ी के नीचे एक प्राचीन गुफा शीशाखान है, जो गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गर्म रहती है.
- ऐसी जनश्रुति है कि अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान इसी गुफा से चामुंडा देवी मंदिर जाते थे.
जयगढ़ दुर्ग, जयपुर: रहस्यों से भरा अजेय किला
आमेर के राजमहल के पास की पहाड़ी पर स्थित जयगढ़ दुर्ग सदियों तक अपने रहस्यों के कारण एक विशेष पहचान बनाए रहा. यह दुर्ग स्वतंत्रता मिलने तक एक ऐसी जगह था, जहाँ सिर्फ महाराजा और उनके दो किलेदारों को ही प्रवेश की अनुमति थी.
- राजकोष की जनश्रुति: ऐसा माना जाता है कि कछवाहा राजाओं का गुप्त खजाना (दफीना) इसी दुर्ग में रखा हुआ था.
- कारागृह: यह दुर्ग एक कारागार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था, जहाँ कैद किए गए राजनीतिक कैदी अक्सर जीवित नहीं बचते थे. महाराजा सवाई जयसिंह के छोटे भाई विजयसिंह (चीमाजी) को धोखे से इसी दुर्ग में कैद किया गया था.
- गुप्त खजाने की खोज: प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में इस किले में गुप्त खजाने की खोज के लिए व्यापक खुदाई की गई थी, जिसने इसे देश-विदेश में चर्चित कर दिया.
निर्माण और इतिहास
यह मान्यता है कि इस दुर्ग का निर्माण महाराजा मानसिंह प्रथम ने अपनी राजधानी आमेर और अपने असीमित राजकोष की सुरक्षा के लिए करवाया था.
- वास्तविक निर्माता: इतिहासकार जगदीशसिंह गहलोत और डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, इस मजबूत दुर्ग का निर्माण आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था, और उन्हीं के नाम पर यह जयगढ़ कहलाया.
- जीर्णोद्धार: महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर की स्थापना से पहले जयगढ़ का जीर्णोद्धार करवाया.
- डॉ. ए.के. राय की पुस्तक: उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ जयपुर सिटी’ में लिखा है कि सवाई जयसिंह ने 1726-27 ई. में अपने दीवान विद्याधर को इस दुर्ग के उत्कृष्ट निर्माण के लिए सम्मानित किया था. यह निर्माण चील्ह का टोला (टीला) नामक पहाड़ी पर हुआ था.
दुर्ग की स्थापत्य विशेषताएँ
जयगढ़ एक उत्कृष्ट गिरि दुर्ग है, जिसका निर्माण प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के मानकों के अनुरूप किया गया है.
- सुरक्षा और जलापूर्ति:
- इसकी मजबूत और ऊँची दीवारें, घुमावदार विशाल बुर्ज और पानी जमा करने के लिए बने बड़े-बड़े टांके इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं.
- किले के चारों ओर पहाड़ियों पर बनी नालियों से बारिश का पानी बड़े-बड़े टांकों में जमा होता था. पानी को छानने के लिए फिल्टर की भी व्यवस्था थी.
- दुर्ग में सबसे बड़ा टांका लगभग 54 फीट गहरा है.
- रहस्यमय दुर्ग:
- यह राजस्थान का एकमात्र किला है जिस पर कभी कोई सीधा आक्रमण नहीं हुआ.
- इसे ‘रहस्यमय दुर्ग’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई गुप्त सुरंगें हैं, जिनसे होकर महलों के आंतरिक हिस्सों में जाया जा सकता है.
- दुर्ग का विस्तार लगभग 3 किलोमीटर की परिधि में है.
- प्रवेश द्वार:
- डूंगर दरवाजा: नाहरगढ़ की ओर से.
- अवनी दरवाजा: आमेर राजमहल के पास फूलों की घाटी से.
- भैरू दरवाजा (दुर्ग दरवाजा): सागर नामक जलाशय की ओर से.
प्रमुख भवन और तोप ढलाई का केंद्र
जयगढ़ में कई महत्वपूर्ण भवन और एक तोप ढालने का कारखाना है.
- प्रमुख भवन:
- सुभट निवास (दीवान-ए-आम), खिलबत निवास (दीवान-ए-खास), लक्ष्मी निवास, ललित मंदिर, विलास मंदिर, सूर्य मंदिर, आराम मंदिर और राणावतजी का चौक जैसे भवन हिंदू स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.
- राजाओं के मनोरंजन के लिए एक कठपुतली घर भी था.
- लघु दुर्ग (विजयगढ़ी):
- किले के भीतर एक छोटा आंतरिक दुर्ग है, जिसे वर्षों तक यहाँ कैद रहे विजयसिंह के नाम पर विजयगढ़ी कहा जाता है.
- बाद में इसे शस्त्रागार (सिलहखाना) के रूप में इस्तेमाल किया गया.
- विजयगढ़ी के पास एक सात मंजिला स्तंभ है, जिसे ‘दीया बुर्ज’ कहते हैं.
- तोप कारखाना और जयबाण तोप:
- जयगढ़ में तोप ढालने का कारखाना है.
- महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित ‘जयबाण’ नामक एक अति विशाल तोप है, जिसे पहियों पर खड़ी एशिया की सबसे बड़ी तोप माना जाता है.
- इस तोप की नली 20 फीट लंबी और वजन लगभग 50 टन है.
- इसकी मारक क्षमता लगभग 22 मील (लगभग 35 किमी) है.
- जनश्रुति है कि इसे केवल एक बार परीक्षण के लिए चलाया गया था, जिसका गोला चाकसू में गिरा था.
नाहरगढ़ का किला: जयपुर के मुकुट जैसा
जयपुर के मुकुट के समान, नाहरगढ़ का किला अरावली पर्वतमाला के एक छोर पर स्थित है. यह जयगढ़ और आमेर के बीच, जयपुर शहर की ओर झाँकता हुआ सा प्रतीत होता है.
- निर्माण: इस भव्य और मजबूत दुर्ग का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने करवाया था.
- मूल नाम: इसका पूर्व नाम सुदर्शनगढ़ है, जिसका प्रमाण किले के भीतर स्थित सुदर्शन कृष्ण का मंदिर है.
- वर्तमान नाम: यह दुर्ग नाहरगढ़ के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, जिसका नाम संभवतः नाहरसिंह भोमिया के नाम पर पड़ा है.
नाहरगढ़ के महल: शिल्प और सौंदर्य का संगम
नाहरगढ़ अपने भव्य महलों के लिए जाना जाता है, जो शिल्प और सौंदर्य से परिपूर्ण हैं.
- महलों की विशेषताएँ:
- चौकोर चौक, अलंकृत छज्जे और उन पर सजीव चित्रकारी इन महलों की प्रमुख विशेषता है.
- ये महल एक छोटी सुरंग से आपस में जुड़े हुए हैं.
- प्रमुख महल:
- महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) और उनके बाद सवाई माधोसिंह ने अपनी नौ पासवानों (प्रेयसियों) के नाम पर इन महलों का निर्माण करवाया.
- इन महलों के नाम हैं: सूरज प्रकाश, खुशहाल प्रकाश, जवाहर प्रकाश, ललित प्रकाश, आनंद प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, चाँद प्रकाश, फूल प्रकाश और बसंत प्रकाश.
- इन महलों की सबसे खास बात उनकी एकरूपता, रंगों का सुंदर संयोजन और मौसम के अनुसार हवा व रोशनी की व्यवस्था है.
- अन्य भवन:
- किले के अन्य प्रमुख भवनों में हवा मंदिर, महाराजा माधोसिंह का अतिथिगृह और सिलहखाना शामिल हैं.
- जयपुर के महाराजा सवाई जगतसिंह की प्रेयसी रसकपूर को भी कुछ समय के लिए नाहरगढ़ में कैद रखा गया था.
किले के नाम से जुड़ी जनश्रुति
किवदंती है कि जब महाराजा सवाई जयसिंह जयपुर की सुरक्षा के लिए इस दुर्ग का निर्माण करा रहे थे, तब जुझार नाहरसिंह ने बाधा डाली थी.
- समाधान: सवाई जयसिंह के राजगुरु और तांत्रिक रत्नाकर पौंडरीक ने नाहरसिंह बाबा को शांत किया.
- सम्मान: नाहरसिंह का ‘स्थान’ आंबागढ़ के पास एक चौबुर्जी गढ़ी में स्थापित किया गया, जहाँ वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं.
• निर्माण का समय: माना जाता है कि सवाई जयसिंह ने 1734 ई. में मराठों के संभावित आक्रमण से राजधानी की सुरक्षा के लिए इस किले का निर्माण करवाया था, जो जयपुर शहर बसाने के लगभग सात साल बाद हुआ था.
माधोराजपुरा का किला: जयपुर रियासत का महत्वपूर्ण गढ़
जयपुर से लगभग 59 किलोमीटर दक्षिण में, फागी से लगभग 9 किलोमीटर पूर्व में स्थित माधोराजपुरा का किला जयपुर रियासत के महत्वपूर्ण किलों में से एक था. यह किला नरूका शाखा के वीरों के शौर्य और पराक्रम की कहानियों से जुड़ा हुआ है.
- स्थापना और नामकरण:
- जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम ने मराठों पर विजय के बाद माधोराजपुरा कस्बा बसाया था.
- यह कस्बा जयपुर की तरह ही बसाया गया था, इसलिए इसे ‘नवां शहर’ भी कहा जाता था.
इतिहास और प्रमुख घटनाएँ
इस किले ने जयपुर रियासत के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रम देखे हैं.
- अमीर खाँ पिंडारी के साथ संघर्ष:
- लादणा के भारतसिंह नरूका ने पिंडारी लुटेरे अमीर खाँ को सबक सिखाने के लिए इस किले को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया.
- भारतसिंह के कामदार शंभु धाभाई ने अमीर खाँ की बेगमों और बच्चों को यहाँ बंधक बना लिया था.
- एक साल की घेराबंदी के बाद, अमीर खाँ को 1817 ई. में संधि करने के लिए मजबूर होना पड़ा. उसने धन देकर अपने परिवार को छुड़वाया.
- शाही बंदीगृह:
- जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह तृतीय की धाय रूपा बढ़ारण को उनके दरबार में षड्यंत्रों के कारण इसी किले में नजरबंद रखा गया था.
किले की संरचना और आंतरिक भवन
माधोराजपुरा का किला एक स्थल दुर्ग है, जो अपनी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता है.
- सुरक्षा व्यवस्था:
- किले के चारों ओर लगभग 20 फीट चौड़ी और 30 फीट गहरी खाई (परिखा) है.
- यह किला दोहरी सुरक्षा दीवारों (परकोटा) से घिरा है.
- प्रमुख स्थल:
- किले के मध्य में भोमियाजी का स्थान है. यह भोमिया करणसिंह नरूका का है, जो किले की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे.
- किले के भीतर जनाने महल, दासियों के भवन, चक्कीपाड़ा, शस्त्रागार (सिलहखाना), रानी वाला महल और अश्वशाला जैसे प्रमुख भवन मौजूद हैं.
दौसा का दुर्ग: कछवाहों की पहली राजधानी
- देवगिरी नामक एक ऊँची और विशाल पहाड़ी पर बना, दौसा का किला अपने आप में एक अनोखा दुर्ग है. कार्लाइल ने इसे राजपूताना के प्राचीन दुर्गों में शामिल किया है.
• किले का आकार और ऊँचाई:
• यह किला समुद्र तल से लगभग 1,643 फीट ऊँचा है और लगभग 4 मील की परिधि में फैला हुआ है.
• इसकी अनियमित आकृति सूप (छाजले) जैसी है.
• निर्माण:
• माना जाता है कि इस किले का निर्माण बड़गूजरों (गुर्जर प्रतिहारों) ने करवाया था.
• बाद में, कछवाहा शासकों ने इसमें कई नई बुर्जें, दीवारें और भवन बनवाए.
कछवाहा राजवंश और ऐतिहासिक घटनाएँ
दौसा को ढूँढाड़ के कछवाहा राजवंश की पहली राजधानी होने का गौरव प्राप्त है.
- कछवाहों का आगमन: 11वीं शताब्दी के आसपास कछवाहा राज्य के संस्थापक दूलहराय नरवर (मध्य प्रदेश) से यहाँ आए थे.
- सूजा का स्मारक: भारमल के शासनकाल में, आमेर के दिवंगत राजा पूरणमल के विद्रोही पुत्र सूजा (सूरजमल) का लाला नरूका ने दौसा में धोखे से वध कर दिया था.
- सूजा का स्मारक किले के मोरी दरवाजे के बाहर बना है, और वे प्रेतेश्वर भोमियाजी के नाम से पूजे जाते हैं.
- एक जनश्रुति के अनुसार, मिर्जा राजा जयसिंह को औरंगजेब के दरबार में शिवाजी को पेश करने में सूरजमल भोमिया ने अप्रत्यक्ष रूप से मदद की थी.
- मुगल काल:
- जनवरी 1562 ई. में, मुगल बादशाह अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत करने के लिए दौसा होकर गया था, जहाँ भारमल के भाई रूपसी बैरागी ने उससे मुलाकात की थी.
- बंदीगृह: जयपुर के नाबालिग महाराजा सवाई जयसिंह तृतीय की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु के बाद, जयपुर के दीवान संधी झुंथाराम और उनके भाई हुकमचंद को इसी किले में नजरबंद रखा गया था.
दुर्ग के प्रमुख स्थल
इस विशाल किले में कई महत्वपूर्ण संरचनाएँ हैं.
- प्रमुख दरवाजे:
- हाथी पोल
- मोरी दरवाजा
- किले का सामने वाला भाग दोहरी दीवारों से घिरा हुआ है.
- किले के भीतर के स्थल:
- मोरी दरवाजे के पास ‘राजाजी का कुआ’ है.
- यहाँ बैजनाथ महादेव का भव्य और प्राचीन मंदिर है.
- गढ़ी के भीतर नीलकंठ महादेव का मंदिर, अश्वशाला (घोड़ों का अस्तबल), ‘चौदह राजाओं की साल’ जैसे प्राचीन महल, सैनिकों के आवास और पानी जमा करने के लिए एक पुराना कुंड भी मौजूद हैं.
मांडलगढ़ दुर्ग: मेवाड़ का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार
भीलवाड़ा से लगभग 52 किलोमीटर उत्तर में स्थित मांडलगढ़ का दुर्ग, मेवाड़ के प्रमुख गिरि दुर्गों में से एक है. यह अरावली पर्वतमाला की एक विशाल घाटी में स्थित है.
- भौगोलिक स्थिति: यह दुर्ग बनास, बेड़च और मेनाल नदियों के त्रिवेणी संगम के निकट है, जो कौटिल्य की आदर्श दुर्ग की परिभाषा को पूरी तरह से चरितार्थ करता है.
- आकार और ऊँचाई:
- इसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों ही लगभग 800 मीटर हैं.
- यह समुद्र तल से लगभग 1,850 फीट ऊँचा है.
- इसका आकार कटोरीनुमा या मंडल जैसा है, जिसके कारण संभवतः इसका नाम मांडलगढ़ पड़ा.
किले के निर्माण की जनश्रुति
‘वीर विनोद’ के अनुसार, इस किले के नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है.
- मांडिया भील की कहानी: मांडिया नामक एक भील को बकरियाँ चराते समय एक पत्थर (पारस) मिला. उसने उस पत्थर पर अपना तीर रगड़ा, जिससे वह सोने का हो गया.
- चानणा गूजर का योगदान: मांडिया भील उस पारस को चानणा नामक गूजर के पास ले गया. गूजर ने वह पत्थर ले लिया और उससे यह किला बनवाया. उसने मांडिया भील के नाम पर ही इसका नाम मांडलगढ़ रखा.
ऐतिहासिक और सामरिक महत्व
‘वीर विनोद’ में अजमेर के चौहान शासकों को इस दुर्ग का निर्माता बताया गया है. मुगलों ने मांडलगढ़ के सामरिक महत्व को देखते हुए इसे मेवाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में इस्तेमाल किया.
- हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.):
- अकबर की शाही सेना ने महाराणा प्रताप के खिलाफ अपने सैनिक अभियान यहीं से चलाए.
- हल्दीघाटी युद्ध से पहले, कुंवर मानसिंह ने लगभग एक महीने तक मांडलगढ़ में रहकर अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार किया था.
- स्मारक: आमेर के जगन्नाथ कछवाहा और राव खंगार ने पास के पुर गाँव में शाही ठिकानों की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की. उनके स्मारक आज भी मेजा बाँध के पास मौजूद हैं.
प्रमुख भवन और जलस्रोत
इस किले में कई ऐतिहासिक और धार्मिक भवन हैं, जो इसकी पुरानी भव्यता को दर्शाते हैं.
- प्रमुख भवन:
- ऋषभदेव का जैन मंदिर.
- दो प्राचीन शिव मंदिर: ऊंडेश्वर और जलेश्वर महादेव.
- सैनिकों के लिए आवास और रूपसिंह द्वारा निर्मित महल.
- जलस्रोत:
- सागर और सागरी जलाशय.
- मेहता अगरचंद द्वारा निर्मित दो पातालतोड़ कुएँ.
- किले के पूर्व में जालेसर तालाब और उत्तर में देवसागर तालाब.
भरतपुर दुर्ग (लोहागढ़): जाट राजाओं की अजेय विरासत
राजस्थान का सिंहद्वार कहे जाने वाले भरतपुर का दुर्ग लोहागढ़ के नाम से प्रसिद्ध है. यह पूर्वी सीमांत का एक प्रहरी दुर्ग है, जो अपनी अभेद्यता और जाट राजाओं की वीरता के लिए जाना जाता है. यह भूमि दुर्ग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
- स्थापना और निर्माण:
- इस दुर्ग की स्थापना 1733 ई. में महाराजा सूरजमल ने की थी.
- किले की नींव एक कच्ची गढ़ी पर रखी गई, जिसे चौबुर्जा कहा जाता था.
- इसे पूरी तरह बनने में लगभग 8 साल लगे, और बाद में महाराजा जसवंतसिंह के समय तक इसमें विस्तार होता रहा.
- अपनी मजबूत बनावट के कारण, इसे हिंदुस्तान का सबसे अजेय किला माना जाता था.
किले की वास्तुकला और संरचना
लोहागढ़ का निर्माण भारतीय दुर्ग निर्माण पद्धति पर आधारित है और यह अपनी श्रेणी में विश्व का पहला दुर्ग माना जाता है.
- संरचना:
- यह आयताकार दुर्ग 6.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है.
- इसमें दोहरी सुरक्षा दीवारें हैं: भीतरी दीवार ईंट-पत्थरों की, जबकि बाहरी दीवार मिट्टी की है.
- मिट्टी की दीवार चौड़ी होने के कारण तोप के गोलों का इस पर कोई असर नहीं होता था.
- खाई और पानी:
- किले के चारों ओर एक चौड़ी खाई (परिखा) है, जिसमें मोतीझील से सुजानगंगा नहर के माध्यम से पानी लाया गया है.
- बुर्ज और दरवाजे:
- किले में 8 विशाल बुर्जें और 40 अर्द्धचंद्राकार बुर्जें हैं.
- दो प्रमुख दरवाजे हैं: उत्तरी द्वार अष्टधातु दरवाजा और दक्षिणी द्वार लोहिया दरवाजा.
- अष्टधातु दरवाजा महाराजा जवाहरसिंह 1765 ई. में दिल्ली के लाल किले से लूटकर लाए थे.
- जवाहर बुर्ज:
- आठ विशाल बुर्जों में सबसे प्रमुख जवाहर बुर्ज है, जिसे महाराजा जवाहरसिंह ने दिल्ली विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था.
- भरतपुर के शासकों का राजतिलक इसी बुर्ज पर होता था.
- अंग्रेजों पर जीत के प्रतीक के रूप में रोहवर्ज 1806 ई. में बनी.
आंतरिक संरचना और स्थल
किले के भीतर कई सुंदर महल और धार्मिक स्थल हैं.
- महल:
- रानी किशोरी महल, दादी-माँ का महल और वजीर की कोठी.
- महल खास और दरबार खास में अब एक अजायबघर बना दिया गया है.
- कमरा खास महल में 17 मार्च 1948 को मत्स्य संघ का उद्घाटन समारोह हुआ था.
- मंदिर:
- यहाँ गंगा मंदिर, राजेश्वरी देवी मंदिर और लक्ष्मण मंदिर जैसे बेजोड़ शिल्प वाले धार्मिक स्थल हैं.
अद्वितीय युद्ध और ब्रिटिश हार
यह किला अंग्रेजों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ.
- होल्कर को शरण: भरतपुर के शासक रणजीतसिंह ने अंग्रेजों के दुश्मन जसवंतराव होल्कर को यहाँ शरण दी.
- ब्रिटिश आक्रमण (1805):
- ब्रिटिश सेनापति लेक ने 1805 में पाँच बार लोहागढ़ पर जोरदार हमले किए, लेकिन किले को जीत नहीं पाए.
- ब्रिटिश तोपों के गोले मिट्टी की बाहरी दीवार में धँस गए और कोई नुकसान नहीं पहुँचा सके.
- अंत में, अंग्रेजों को संधि करनी पड़ी. इस घटना के बाद एक लोकगीत प्रसिद्ध हुआ: “गोरा हट जा रे, राज भरतपुर को.”
- अधिकार: ब्रिटिश सेनापति कोम्बर मेयर ने 27,000 सैनिकों और विशाल तोपखाने के साथ 18 जनवरी 1826 को आखिरकार दुर्ग पर अधिकार कर लिया
विजयमंदिर गढ़, बयाना: प्राचीन इतिहास का साक्षी
भरतपुर से लगभग 48 किलोमीटर दक्षिण में स्थित विजयमंदिर गढ़, एक प्राचीन दुर्ग है. इसका निर्माण मधुरा के यादव राजवंश के महाराजा विजयपाल ने 1040 ई. के आसपास मानी पहाड़ी पर करवाया था, और उन्हीं के नाम पर यह किला विजयमंदिर गढ़ कहलाया.
- किले के अन्य नाम:
- श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के समय में इसे शोणितपुर कहा जाता था.
- गुप्त काल में यह श्रीपथ के नाम से जाना जाता था.
- दिल्ली सल्तनत के अंतिम दिनों में इसे बयाना कहा जाने लगा.
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार, बयाना का प्राचीन नाम ‘भादानक’ था.
इतिहास और शासक
यह दुर्ग कई राजवंशों और मुस्लिम शासकों के अधीन रहा, जिसने इसे एक महत्वपूर्ण सामरिक केंद्र बना दिया.
- विजयपाल का बलिदान:
- ‘विजयपाल रासो’ के अनुसार, महाराजा विजयपाल ने 1102 विक्रम संवत में कंधार के शासक बूबक शाह से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की.
- ‘वीर विनोद’ के अनुसार, रानियों के बारूद से उड़ जाने के बाद 1046 ई. में राजा की मृत्यु हुई.
- मुस्लिम शासकों का आधिपत्य:
- गोरी, गुलाम, तुगलक, लोदी और अफगान वंशों ने इस पर शासन किया.
- फिरोज तुगलक अपनी मुहिम पर जाते हुए कई महीने यहाँ रुके.
- सिकंदर लोदी ने तो दिल्ली के बाद बयाना को अपनी दूसरी राजधानी घोषित कर दिया था.
- मुगलों का शासन:
- हुमायूँ के शासनकाल में उसके चचेरे भाई मोहम्मद जमान मिर्जा को यहीं कैद किया गया था.
- 1557 में शेरशाह सूरी और उसके बेटे के बाद, इस दुर्ग पर मुगल बादशाह अकबर का अधिकार हो गया.
- 18वीं शताब्दी में इस पर जाटों ने अधिकार कर लिया.
उत्कृष्ट नील उत्पादन और व्यापार
बयाना और उसके आसपास का क्षेत्र मध्ययुग में बेहतरीन गुणवत्ता वाले नील के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था.
- फ्रेंकोइस पैल्सर्ट का उल्लेख: 1618 में भारत आए डच यात्री फ्रेंकोइस पैल्सर्ट ने बयाना में नील की खेती और व्यापार के बारे में विस्तार से लिखा है.
स्मारक और स्थापत्य कला
इस किले में कई प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक हैं, जो यहाँ की समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं.
- विजय स्तंभ:
- गुप्त काल में बयाना के किले में ‘राजस्थान के प्रथम विजय स्तंभ’ का निर्माण हुआ था.
- भीमलाट:
- दुर्ग के भीतर लाल पत्थरों का एक ऊँचा लाट या स्तंभ है, जिसे भीमलाट कहते हैं.
- इस पर उत्कीर्ण शिलालेख के अनुसार, इसे विष्णुवर्द्धन ने 363 ई. में एक यज्ञ की समाप्ति पर बनवाया था.
- माना जाता है कि विष्णुवर्द्धन गुप्त शासक समुद्रगुप्त का सामंत था.
- मंदिर और मस्जिद:
- ऊषा मंदिर: 956 ई. में रानी चित्रलेखा द्वारा निर्मित यह मंदिर हिंदू स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है.
- इल्तुतमिश के शासनकाल में इस मंदिर को मस्जिद में बदल दिया गया और ऊषा की मूर्ति को खंडित कर दिया गया.
- मुस्लिम वास्तुकला:
- इब्राहिम लोदी के शासनकाल में बनी लोदी मीनार, बारहदरी, सराय सादुल्ला, अकबरी छतरी और जहाँगीरी दरवाजा यहाँ की मुस्लिम वास्तुकला के उदाहरण हैं.
बाला किला, अलवर: पूर्वी राजस्थान का गौरव
पूर्वी राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों में अलवर का बाला किला प्रमुख है. यह एक प्राचीन दुर्ग है, हालांकि इसके निर्माताओं के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है.
- नाम और स्थापना:
- जनश्रुति के अनुसार, 1106 विक्रम संवत में आमेर नरेश काकिलदेव के छोटे पुत्र अलघुराय ने इस पहाड़ी पर एक छोटा दुर्ग बनवाया और उसके नीचे ‘अलपुर’ नगर बसाया. इस प्राचीन नगर के अवशेष आज भी ‘रावण बेहरा’ के नाम से जाने जाते हैं.
- कनिंघम का मानना है कि यहाँ साल्व जाति के निवास के कारण इसका नाम साल्वपुर था, जो बाद में अलवर हो गया.
- शक्तियां का बदलाव:
- 12वीं शताब्दी के आसपास यह किला कछवाहों के हाथ से निकुम्भ क्षत्रियों (चौहानों) के अधिकार में आ गया. निकुम्भों ने इसे और मजबूत बनाकर एक दुर्भेद्य दुर्ग बना दिया.
मुगल और अन्य शासकों का प्रभाव
इस किले पर कई मुस्लिम शासकों और राजवंशों का अधिकार रहा है.
- खानजादों का शासन: निकुम्भों को हराकर अलावलखाँ खानजादे ने इस पर अधिकार कर लिया.
- अलावलखाँ का पुत्र हसनखाँ मेवाती राणा सांगा की तरफ से खानवा के युद्ध में बाबर के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ था.
- बाबर और हुमायूँ:
- खानवा की विजय के बाद बाबर ने इस पर अधिकार कर लिया और यह किला अपने पुत्र हिन्दाल को जागीर में दे दिया.
- बाबर ने एक रात यहाँ बिताई थी और यहीं से मेवात का खजाना हुमायूँ को सौंपा था.
- जहाँगीर और सलीम महल:
- मुगल बादशाह जहाँगीर इस दुर्ग में तीन साल तक रहा, जिसके कारण इसे ‘सलीम महल’ भी कहते हैं.
- भरतपुर के राजा सूरजमल:
- मुगलों के पतन के बाद, भरतपुर के राजा सूरजमल ने इस पर अधिकार कर लिया और यहाँ महल व एक कुंड ‘सूर कुंड’ बनवाया.
- अलवर रियासत:
- 1775 में अलवर के स्वतंत्र राज्य के संस्थापक राव प्रतापसिंह ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया. तब से लेकर भारत की आजादी तक यह कछवाहों की नरूका शाखा के अधीन रहा.
दुर्ग की संरचना और वास्तुशिल्प
यह किला जमीन से 1,000 फीट ऊँची पहाड़ी पर बना है, जिसकी दीवारें लगभग 6 मील की परिधि में फैली हुई हैं.
- बुर्ज और कंगूरे:
- किले की दीवारों में 15 बड़ी और 52 छोटी बुर्ज हैं.
- इन बुर्जों और दीवारों पर कुल 3,359 कंगूरे लगे हुए हैं.
- चौबुर्ज, काबुलखुर्द बुर्ज और नौगजा बुर्ज जैसी बुर्जों में सैनिकों की चौकियाँ थीं.
- प्रवेश द्वार:
- किले में पाँच प्रमुख प्रवेश द्वार हैं: पश्चिम में चाँदपोल, पूर्व में सूरजपोल, दक्षिण में लक्ष्मणपोल और जयपोल, और उत्तर में अंधेरी दरवाजा.
- आंतरिक भवन:
- दुर्ग के भीतर निकुम्भ शासकों द्वारा बनाए गए महल पारंपरिक हिंदू स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.
- 1832 में महाराजा प्रतापसिंह द्वारा निर्मित सीतारामजी का मंदिर भी यहाँ मौजूद है.
कांकवाड़ी का किला, अलवर: सरिस्का के बीहड़ वनों में
अलवर जिले में सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य के बीच स्थित कांकवाड़ी का किला एक ऐसा दुर्ग है, जिसमें गिरि दुर्ग और वन दुर्ग दोनों की विशेषताएँ हैं. राजस्थान के वन दुर्गों में यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
- अनूठी विशेषता: यह किला दूर से तो दिखाई देता है, लेकिन पास जाने पर घने पेड़ों के झुरमुट में छिप जाता है.
- बंदीगृह: जनश्रुति के अनुसार, यहाँ खतरनाक राजनीतिक कैदियों और युद्ध बंदियों को रखा जाता था. मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को इसी किले में कुछ समय के लिए कैद रखा था.
- निर्माण और जीर्णोद्धार:
- इस दुर्ग का निर्माण कछवाहा वंश के महाराजा सवाई जयसिंह ने करवाया था.
- बाद में, अलवर के महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया.
राजोरगढ़ (नीलकंठ), अलवर: बड़गूजरों की राजधानी
अलवर से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में, अरावली पर्वतमाला की एक ऊँची चोटी पर राजोरगढ़ का प्राचीन किला और नगर स्थित है. यह घने जंगल में एक निर्जन और सुनसान जगह पर है.
- प्राचीन नाम:
- राजोरगढ़ का प्राचीन नाम राज्यपुर था.
- यह 8वीं से 12वीं शताब्दी तक बड़गूजर राजपूतों की राजधानी रहा.
- नीलकंठ महादेव मंदिर:
- बड़गूजर राजवंश के प्रतापी शासक मथनदेव ने 10वीं शताब्दी में यहाँ भगवान शिव का एक भव्य और कलात्मक नीलकंठ महादेव मंदिर बनवाया.
- इसके बाद, यह नगर नीलकंठ-राजोरगढ़ के संयुक्त नाम से प्रसिद्ध हुआ.
- इस मंदिर के निर्माण का शिलालेख नृत्य करती हुई गणेश प्रतिमा के नीचे उत्कीर्ण था, जो अब अलवर के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित है.
किले का महत्व और अन्य स्थल
- सैन्य उपयोग: इस किले का उपयोग मुख्य रूप से सैनिक गतिविधियों और युद्ध अभियानों के लिए होता था.
- मुगलों का शासन:
- मुगल काल में इस पर मुगलों का अधिकार रहा.
- बादशाह शाहजहाँ ने आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को राजोरगढ़ जागीर में दिया था.
- मिर्जा राजा जयसिंह ने इस किले का जीर्णोद्धार करवाकर राजोरगढ़ नगर के चारों ओर एक सुरक्षा दीवार (शहरपनाह) का निर्माण करवाया.
- प्रमुख प्रतिमा:
- यहाँ जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की एक विशाल प्रतिमा है, जिसे ‘नीलगजा’ कहा जाता है.
- जैन धर्म की लोकप्रियता के कारण इसे ‘पारानगर’ भी कहा जाता था.
धौलपुर का शेरगढ़ दुर्ग: चम्बल के बीहड़ों में
धौलपुर नगर के दक्षिणी हिस्से में स्थित शेरगढ़ दुर्ग एक तरफ चम्बल नदी और तीन तरफ उसके ऊबड़-खाबड़ बीहड़ों से घिरा हुआ है.
- निर्माण:
- इसका निर्माण 1120 ई. में यदुवंशी शासक धर्मपाल ने करवाया था.
- धौलपुर शहर के संस्थापक राजा धोरपाल देव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया.
- शेरगढ़ नाम:
- 1500 ई. में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने इस पर अधिकार किया.
- 1540 ई. में जब यह दुर्ग शेरशाह सूरी के अधिकार में आया, तो उसने इसे नया रूप दिया. तभी से यह किला शेरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
- अन्य तथ्य:
- मुगल बादशाह अकबर ने भी एक रात यहाँ विश्राम किया था.
- दुर्ग के दरवाजे पर एक विशालकाय तोप ‘हनुहुंकार’ रखी थी, जिसे बाद में शहर के मुख्य बाजार में लाया गया.
आबू दुर्ग (अचलगढ़), सिरोही: हिन्दू ओलम्पस
सिरोही जिले में अरावली पर्वतमाला के ऊँचे शिखर आबू पर्वत पर स्थित अचलगढ़ दुर्ग एक प्राचीन किला है. कर्नल टॉड ने यहाँ के अनेक मंदिरों के कारण इसे ‘हिन्दू ओलम्पस’ (देव पर्वत) कहा है.
- निर्माण:
- मूल किला परमार शासकों द्वारा बनवाया गया था.
- 1452 ई. में महाराणा कुम्भा ने इसी प्राचीन दुर्ग के खंडहरों पर अचलगढ़ के नए दुर्ग का निर्माण करवाया.
- शासक:
- आबू के परमार राजवंश में धारावर्ष एक पराक्रमी शासक था.
- बाद में, गुजरात की तरफ से संभावित आक्रमणों से सुरक्षा के लिए इस दुर्ग का विशेष सामरिक महत्व था.
- अचलगढ़ पर ज्यादातर देवड़ा शाखा के चौहानों का अधिकार रहा.
महत्वपूर्ण घटनाएँ और स्थापत्य
- भंवराथल:
- एक जनश्रुति के अनुसार, जब गुजरात का सुल्तान महमूद बेगड़ा अचलेश्वर मंदिर से प्रतिमाओं को खंडित करके लौट रहा था, तब मधुमक्खियों के एक बड़े दल ने उस पर हमला कर दिया.
- इस घटना की स्मृति में वह स्थान ‘भंवराथल’ के नाम से प्रसिद्ध है.
- अचलेश्वर महादेव मंदिर:
- यहाँ शिवलिंग के स्थान पर एक गड्ढा है, जिसे ‘ब्रह्मखड्ढा’ कहते हैं. इस स्थान पर शिव के पैर का अंगूठा प्रतीकात्मक रूप में मौजूद है.
- मंदिर के प्रांगण में महमूद बेगड़ा द्वारा खंडित की गई पार्वती और नंदी की प्रतिमाएँ हैं. नंदी के पास दूर्सा आढ़ा की मूर्ति भी है.
- मंदकिनी कुंड:
- यह अचलेश्वर महादेव मंदिर के पास है. इसके किनारे परमार राज्य के संस्थापक आदि परमार की प्रतिमा है. कर्नल टॉड ने इस मूर्ति को भारत की बेहतरीन मूर्तियों में से एक बताया है.
- यहाँ सिरोही के महाराव मानसिंह की छतरी भी है, जिन्हें कल्ला परमार ने मारा था.
दुर्ग के प्रवेश द्वार और अवशेष
- प्रमुख द्वार:
- हनुमानपोल, गणेशपोल, चम्पापोल और भैरवपोल.
- आंतरिक अवशेष:
- दुर्ग के भीतर महाराणा कुम्भा के राजमहल, उनकी रानी ओखा रानी का महल, विशाल पानी के टांके, सावन-भादों झील और परमारों द्वारा निर्मित खतरे की सूचना देने वाली बुर्ज के खंडहर मौजूद हैं.
- जैन मंदिर:
- अचलगढ़ के पास पार्श्वनाथ का एक जैन मंदिर भी है, जिसके कलात्मक स्तंभों की तुलना कर्नल टॉड ने अजमेर के प्राचीन मंदिर के स्तंभों से की है.
खंडार का किला: रणथंभौर का पृष्ठरक्षक
सवाई माधोपुर से लगभग 40 किलोमीटर पूर्व में स्थित खंडार का किला, रणथंभौर के एक सहायक और पृष्ठरक्षक दुर्ग के रूप में प्रसिद्ध है.
- भौगोलिक स्थिति:
- इसके पूर्व में बनास और पश्चिम में गालंडी नदियाँ बहती हैं.
- दक्षिण में यह नहरों, तालाबों और अनियमित आकार की पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा है.
- इसमें गिरि दुर्ग और वन दुर्ग दोनों की विशेषताएँ हैं.
- यह दुर्ग त्रिभुजाकार है.
- प्रवेश द्वार और संरचना:
- दुर्ग का प्रवेश द्वार विशाल बुर्जों और घाघरानुमा दीवारों से जुड़ा हुआ है.
- किले के अंदर पहुँचने के लिए तीन विशाल और मजबूत दरवाजे हैं.
इतिहास और सैन्य महत्व
इस दुर्ग का निर्माण और उपयोग मुख्य रूप से सैन्य गतिविधियों के लिए होता था.
- निर्माण:
- लोककथाओं के अनुसार, इसका निर्माण 8वीं-9वीं शताब्दी में रणथंभौर के चौहान शासकों ने करवाया था.
- ‘हम्मीरायण’ में रणथंभौर के राव हम्मीर को खंडार और जादौनवाटी का शासक बताया गया है.
- शासकों का आधिपत्य:
- अलाउद्दीन खिलजी: 1301 ई. में रणथंभौर के साथ यह किला भी उसके अधिकार में आ गया.
- राणा सांगा: बाद में यह मेवाड़ के राणा सांगा के पास रहा.
- अकबर: बूंदी के राव सुरजन हाड़ा ने रणथंभौर के साथ खंडार का किला भी अकबर को सौंप दिया था.
- जयपुर रियासत: महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम के शासनकाल में पचेवर के अनूपसिंह खंगारोत यहाँ के किलेदार थे. उनके नेतृत्व में जयपुर की सेना ने मराठा सेनापति जनकूजी सिंधिया** को हराकर रणथंभौर दुर्ग को जयपुर राज्य में शामिल किया था.
प्रमुख स्थल
खंडार के किले के भीतर कई महत्वपूर्ण भवन और जलस्रोत मौजूद हैं.
- प्रमुख स्थल:
- रानी का महल
- चतुर्भुज मंदिर और देवी मंदिर
- सतकुंडा, लक्ष्मणकुंड, बाणकुंड, झीरीकुंड जैसे जलाशय.
तवनगढ़ (त्रिभुवनगढ़): करौली का ऐतिहासिक दुर्ग
बयाना से लगभग 23 किलोमीटर दक्षिण में एक पहाड़ी पर मध्यकाल का प्रसिद्ध दुर्ग तवनगढ़ (तिमनगढ़) या त्रिभुवनगढ़ स्थित है. यह दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक मजबूत किला है.
- निर्माण और नामकरण:
- इसका निर्माण 11वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बयाना के तवनपाल (त्रिभुवनपाल) ने करवाया था, जो महाराजा विजयपाल के पुत्र थे.
- अपने निर्माता के नाम पर इसे तवनगढ़ कहा गया, और किले की पहाड़ी को त्रिभुवनगिरि कहा जाता है. इसे त्रिपुरार नगरी भी कहते थे.
- मुस्लिम शासन के बाद इसका नाम बदलकर ‘इस्लामाबाद’ कर दिया गया
स्थापत्य और आंतरिक संरचना
तवनगढ़ की स्थापत्य कला में इसके मजबूत और विशाल प्रवेश द्वार प्रमुख हैं.
- प्रवेश द्वार: जगन प्रोल और सूर्य प्रोल इसके मुख्य प्रवेश द्वार हैं.
- नगर व्यवस्था: पूरा नगर किले के भीतर ही बसा हुआ था, जिसमें लगभग 60 दुकानों वाला एक विशाल बाजार भी था.
- प्रमुख भवन और स्थल:
- खास महल, बड़ा चौक, ननद भौजाई का कुआँ, राजगिरि, दुर्गाध्यक्ष के महल और सैनिकों के आवास.
- किसी समय यह दुर्ग एक छोटे लेकिन समृद्ध नगर के रूप में था, और इसे ‘मूर्तियों का खजाना’ कहा जाता था.
- सांस्कृतिक महत्व:
- अपनी प्राचीन प्रतिमाओं के कारण यह किला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है.
- दुर्भाग्यवश, यहाँ की कई मूर्तियाँ बड़े पैमाने पर चोरी होकर विदेशों में बेच दी गईं
प्रमुख शासक और ऐतिहासिक घटनाएँ
- मुहम्मद गौरी: डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार, 1195 ई. में मुहम्मद गौरी ने तवनगढ़ पर अधिकार कर लिया था.
- अर्जुनपाल: 14वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यादववंशीय शासक अर्जुनपाल ने इसे वापस जीत लिया. उन्होंने 1348 ई. में कल्याणजी का मंदिर बनवाकर कल्याणपुरी नामक नगर बसाया, जिसे अब करौली कहा जाता है.
- सिकंदर लोदी: 1516 ई. में सिकंदर लोदी ने इस पर अधिकार कर लिया.
- बाबर: मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल में आलमशाह यहाँ का दुर्गाध्यक्ष था.
भैंसरोड़गढ़, चित्तौड़गढ़: 'राजस्थान का वैल्लौर'
चित्तौड़गढ़ से 110 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला की एक विशाल घाटी के बीच स्थित भैंसरोड़गढ़ दुर्ग एक अनोखा जल दुर्ग है. यह चंबल और बामनी नदियों के संगम पर बना है, जिसके कारण यह साल भर तीन तरफ से पानी से घिरा रहता है. अपनी इस खास भौगोलिक स्थिति की वजह से इसे ‘राजस्थान का वैल्लौर’ कहा जाता है, जो जल दुर्ग का एक बेहतरीन उदाहरण है.
किले के निर्माण से जुड़ी कहानी
इस दुर्ग के निर्माण के बारे में कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक दिलचस्प लोककथा प्रचलित है.
लोककथा: कर्नल टॉड के अनुसार, इस दुर्ग का निर्माण भैंसाशाह नामक एक व्यापारी और रोड़ा चारण नामक एक बंजारे ने करवाया था. उन्होंने इसे पर्वतीय लुटेरों से अपने व्यापारिक काफिले (कारवाँ) की रक्षा के लिए बनवाया था, ताकि बारिश के मौसम में यह उनका सुरक्षित आश्रय बन सके
प्रमुख शासक और ऐतिहासिक घटनाएँ
भैंसरोड़गढ़ पर कई राजवंशों का अधिकार रहा है, लेकिन यह ज्यादातर मेवाड़ के अधीन रहा.
- विभिन्न राजवंश: डोड शाखा के परमारों, राठौड़ों, शक्तावतों और चूंडावतों के बाद यह हाड़ाओं को मिला.
- मराठा आक्रमण: लालसिंह चूंडावत के उत्तराधिकारी मानसिंह के शासनकाल में, मराठों ने भैंसरोड़गढ़ पर हमला किया. हालांकि, मीणाओं, भीलों और आदिवासियों के मजबूत प्रतिरोध के कारण उन्हें घेरा उठाना पड़ा.
अलाउद्दीन खिलजी: कर्नल टॉड के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस किले पर बड़ा हमला किया था, जिसके बाद किले में कोई भी प्राचीन इमारत नहीं बची थी.
कर्नल जेम्स टॉड की प्रशंसा
इस किले की सुंदरता से प्रभावित होकर कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था, “यदि उन्हें राजस्थान में एक जागीर की पेशकश की जाए, तो वह भैंसरोड़गढ़ को ही चुनेंगे.”
भटनेर दुर्ग, हनुमानगढ़: उत्तरी सीमा का प्रहरी
घग्घर नदी के पूर्वी तट पर स्थित भटनेर का किला भाटियों की वीरता और पराक्रम का साक्षी है. यह एक अत्यंत प्राचीन दुर्ग है, जिसे मूल रूप से मिट्टी से बनाया गया था. इसे ‘उत्तरी सीमा का प्रहरी’ कहा जाता था, क्योंकि मध्य एशिया से होने वाले अधिकांश आक्रमण इसी ओर से होते थे. दिल्ली-मुल्तान मार्ग पर होने के कारण इसका सामरिक महत्व बहुत अधिक था.
- निर्माण: जनश्रुति के अनुसार, इस दुर्ग का निर्माण तीसरी शताब्दी के अंत में भाटी राजा भूपत ने करवाया था.
- संरचना: यह मरुस्थल में स्थित होने के कारण धान्वन दुर्ग की श्रेणी में आता है. किले का निर्माण पकी हुई ईंटों और चूने से हुआ है, और इसमें 52 बीघा भूमि पर फैली विशाल बुर्जें और गहरे कुएँ हैं.
इतिहास के प्रमुख आक्रमण और घटनाएँ
भटनेर को अपनी सामरिक स्थिति के कारण कई आक्रमण झेलने पड़े.
- महमूद गजनवी (1001 ई.): महमूद गजनवी ने इस पर अधिकार कर लिया था.
- सुल्तान बलबन: उनके चचेरे भाई शेरखाँ यहाँ के शासक थे, जिन्होंने किले की मरम्मत करवाई. शेरखाँ की मृत्यु 1269 ई. में भटनेर में ही हुई और उनकी कब्र किले के भीतर मौजूद है.
- तैमूर का आक्रमण (1398 ई.): तैमूर के बर्बर आक्रमण ने भटनेर को लगभग वीरान कर दिया. इस हमले में भाटी राजा राव दूलचंद पराजित हुए. यहाँ की हिंदू महिलाओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं द्वारा भी जौहर करने के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं.
राठौड़ों का अधिकार और नाम परिवर्तन
- राव जैतसिंह (1527 ई.): बीकानेर के शासक राव जैतसिंह ने पहली बार राठौड़ों का आधिपत्य स्थापित किया. उनके सेनापति खेतसी, हुमायूँ के भाई कामरान से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे.
- राव कल्याणमल (1549 ई.): राव कल्याणमल के भाई ठाकुरसी ने चायलों से किला छीना. बाद में, अकबर ने ठाकुरसी के पुत्र बाघा की वीरता से खुश होकर किला उन्हें वापस दे दिया.
महाराजा सूरतसिंह (1805 ई.): बीकानेर के महाराजा सूरतसिंह ने 1805 ई. में पाँच महीने के घेरे के बाद जाब्ता खाँ भट्टी से भटनेर ले लिया. चूँकि यह जीत मंगलवार के दिन हुई थी, इसलिए उन्होंने इसका नाम बदलकर हनुमानगढ़ रख दिया और किले में हनुमानजी का मंदिर बनवाया.
दुर्ग के वर्तमान हालात और महत्वपूर्ण लेख
वर्तमान में यह दुर्ग जर्जर अवस्था में है.
- प्रवेश द्वार: किले के एक प्रवेश द्वार पर एक राजा के साथ छह स्त्रियों की आकृतियाँ हैं. दूसरे प्रवेश द्वार पर 1608 ई. का फारसी लेख उत्कीर्ण है, जिसके अनुसार राव मनोहर कछवाहा ने शाही आदेश पर मनोहरपोल नामक दरवाजा बनवाया था.
गौरव गाथाएँ: भटनेर का यह किला ‘उत्तर भड़ किंवाड़’ (उत्तरी भटियों का रक्षक) के उपनाम से प्रसिद्ध भाटियों और राठौड़ों की कई गौरव गाथाओं को अपने में समेटे हुए है
शेरगढ़ (कोशवर्द्धन), बारां: परवन नदी का प्रहरी
हाड़ौती अंचल में स्थित शेरगढ़ का प्राचीन दुर्ग बारां से 65 किलोमीटर दूर अटरू तहसील में, परवन नदी के बाएं किनारे पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है. यह एक ऐसा किला है जो जल दुर्ग, गिरि दुर्ग और एरण दुर्ग तीनों श्रेणियों में आता है.
- नामकरण:
- पहले इस दुर्ग का नाम ‘कोशवर्द्धन’ था, जो संभवतः इसी नाम के पर्वत शिखर पर रखा गया था.
- शेरशाह सूरी ने अपने मालवा अभियान के दौरान इस पर कब्जा करके इसे ‘शेरगढ़’ नाम दिया.
स्थापत्य और आंतरिक संरचना
तवनगढ़ की स्थापत्य कला में इसके मजबूत और विशाल प्रवेश द्वार प्रमुख हैं.
- प्रवेश द्वार: जगन प्रोल और सूर्य प्रोल इसके मुख्य प्रवेश द्वार हैं.
- नगर व्यवस्था: पूरा नगर किले के भीतर ही बसा हुआ था, जिसमें लगभग 60 दुकानों वाला एक विशाल बाजार भी था.
- प्रमुख भवन और स्थल:
- खास महल, बड़ा चौक, ननद भौजाई का कुआँ, राजगिरि, दुर्गाध्यक्ष के महल और सैनिकों के आवास.
- किसी समय यह दुर्ग एक छोटे लेकिन समृद्ध नगर के रूप में था, और इसे ‘मूर्तियों का खजाना’ कहा जाता था.
- सांस्कृतिक महत्व:
- अपनी प्राचीन प्रतिमाओं के कारण यह किला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है.
- दुर्भाग्यवश, यहाँ की कई मूर्तियाँ बड़े पैमाने पर चोरी होकर विदेशों में बेच दी गईं
इतिहास और शासक
इस भव्य दुर्ग के निर्माताओं के बारे में सटीक जानकारी नहीं है, लेकिन इसका इतिहास काफी समृद्ध है.
- प्राचीनतम साक्ष्य: 9वीं सदी के एक शिलालेख से पता चलता है कि यहाँ के पर्वत शिखर का नाम कोशवर्द्धन था और इस पर नागवंशीय शासकों का अधिकार था.
- प्रमुख शासक: नागवंशीय क्षत्रिय, डोड परमार, खींची चौहान, मांडू के सुल्तान, अफगान शासक शेरशाह सूरी, मुगल बादशाह और कोटा के हाड़ा शासकों ने यहाँ शासन किया.
- झाला जालिमसिंह का योगदान: फर्रुखसियर ने यह किला कोटा के महाराव भीमसिंह को दिया था. बाद में, महाराव उम्मेदसिंह के दीवान जालिमसिंह झाला ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और दुर्ग के भीतर एक भव्य ‘झालाओं की हवेली’ बनवाई.
- अमीर खाँ की शरण: अंग्रेजों से बचने के लिए, अमीर खाँ ने अपनी तीन बेगमों और माँ के साथ जालिमसिंह के आग्रह पर इसी दुर्ग में शरण ली थी.
शाहबाद दुर्ग, बारां: कुण्डा खोह का प्रहरी
हाड़ौती अंचल का एक मजबूत और अभेद्य दुर्ग शाहबाद दुर्ग बारां से लगभग 80 किलोमीटर दूर, कोटा-शिवपुरी मार्ग पर एक ऊँचे पर्वत शिखर पर स्थित है. यह चारों ओर घने जंगल, दो प्राकृतिक झरनों (कुण्डा खोह) और एक तालाब से घिरा होने के कारण औदुक दुर्ग की श्रेणी में आता है. दिल्ली, मालवा और दक्षिण जाने वाले मार्ग पर होने से इस किले का सामरिक महत्व भी बहुत अधिक था.
- निर्माण:
- इस दुर्ग के निर्माण की सही तिथि ज्ञात नहीं है.
- एक मान्यता के अनुसार इसका निर्माण 9वीं शताब्दी में परमार शासकों ने करवाया था.
दूसरी मान्यता यह है कि इसका निर्माता चौहान राजा मुकटमणिदेव था, जो रणथंभौर के शासक हम्मीर देव चौहान के वंशज थे
इतिहास और प्रमुख शासक
यह दुर्ग कई शासकों के अधीन रहा, और इसके नाम में भी बदलाव होते रहे.
- राणा कुम्भा: उन्होंने मांडू के सुल्तान को हराकर इस दुर्ग को मेवाड़ राज्य में मिला लिया था.
- शेरशाह सूरी: माना जाता है कि शेरशाह सूरी ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था. उन्होंने इसका नाम ‘सलेहाबाद’ रखा, जो बाद में उनके पुत्र के नाम पर ‘सलीमाबाद’ और फिर ‘सल्लाबाद’ हो गया.
- औरंगजेब: औरंगजेब के समय इसे ‘शाहबाद’ कहा जाने लगा.
- उन्हें इस दुर्ग से विशेष लगाव था और वे अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान इसे विश्राम स्थल के रूप में उपयोग करते थे.
- उनके शासनकाल में मुगल फौजदार मकबूल द्वारा निर्मित जामा मस्जिद मुगल स्थापत्य का एक सुंदर उदाहरण है. इसकी 150 फीट ऊँची मीनारें इसे राजस्थान की सबसे बड़ी मस्जिद बनाती हैं.
- कोटा के हाड़ा शासक: 1714 में कोटा के महाराव भीमसिंह प्रथम ने इसे जीत लिया. स्वतंत्रता मिलने तक यह कोटा और बाद में झालावाड़ रियासत का हिस्सा रहा.
दुर्ग की संरचना और प्रमुख आकर्षण
यह किला अपनी अनूठी वास्तुकला और विशिष्ट विशेषताओं के लिए जाना जाता है.
- सुरक्षा:
- किले में तीन प्रवेश द्वार और कई विशाल बुर्जें हैं.
- कुछ साल पहले तक, यहाँ 18 तोपें रखी थीं, जिनमें ‘नवलबाण’ नामक तोप दूर तक मार करने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थी.
- जलाशय:
- किले के जलस्रोतों में बड़ी बावड़ी सबसे प्रमुख है.
- वास्तुकला:
- किले का अलंकृत दरवाजा और बादल महल अपनी शिल्प और स्थापत्य के कारण दर्शनीय हैं.
- अललपंख प्रतिमाएँ:
- प्रवेश द्वार पर ‘अललपंख’ नामक दो विशाल प्रतिमाएँ लगी थीं. अललपंख एक पंखयुक्त हाथी है जो पाँच छोटे-छोटे हाथियों को लेकर उड़ता हुआ दिखाया गया है. ये प्रतिमाएँ अब कोटा के जिलाधीश कार्यालय में रखी हैं.
नागौर का किला (अहिछत्रपुर दुर्ग): नागवंश का गौरव
नागौर एक प्राचीन और ऐतिहासिक नगर है, जिसके कई नाम हैं, जैसे नागदुर्ग, नागठर, नागपुर और अहिछत्रपुर. महाभारत में भी अहिछत्रपुर का वर्णन मिलता है, जिस पर पहले पांचाल नरेश द्रुपद का शासन था. नागौर के इन नामों से पता चलता है कि इसका संबंध नागवंशी क्षत्रियों से था. इस किले को ‘फोर्ट ऑफ हुडेड कोबरा’ या ‘नागराज का फण’ भी कहा जाता है.
- स्थापना:
- यह लगभग 36 एकड़ में फैला है.
- ख्यातों के अनुसार, चौहान राजा सोमेश्वर के सामंत कैमास ने 1211 विक्रम संवत में इस किले की नींव रखी थी.
- सामरिक महत्व:
- दिल्ली और सिंध के बीच के रास्ते पर होने के कारण, इस किले का सामरिक महत्व बहुत अधिक था.
- डॉ. दशरथ शर्मा ने इसे चौहानों के सबसे मजबूत किलों में से एक माना है.
इतिहास के प्रमुख शासक और घटनाएँ
इस किले ने कई युद्ध और शासकों के बदलाव देखे हैं.
- मुस्लिम शासन:
- 1192 ई. में तराइन के दूसरे युद्ध के बाद, यह किला मुहम्मद गौरी के अधिकार में आ गया.
- राव मालदेव ने 1536 ई. में नागौर के मुस्लिम शासक को हराकर इस पर अधिकार किया और इसका जीर्णोद्धार भी करवाया.
- अकबर ने 1570 ई. में अजमेर के बाद नागौर आकर यहाँ दो महीने बिताए. उन्होंने यहाँ ‘शुक्र तालाब’ का निर्माण करवाया.
- अकबर के नागौर प्रवास के दौरान ही मारवाड़ के राव चंद्रसेन और बीकानेर के राजा कल्याणमल ने अपने पुत्र रायसिंह के साथ अकबर से मुलाकात की थी. बाद में अकबर ने यह किला रायसिंह को जागीर में दे दिया.
- अमरसिंह राठौड़:
- नागौर को असली गौरव और प्रसिद्धि अमरसिंह राठौड़ के शौर्य से मिली.
- आगरा के भरे दरबार में, फौज बख्शी सलाबत खाँ द्वारा गंवार कहे जाने पर अमरसिंह ने उसे अपनी कटार से मार दिया. तभी से ‘कटारी अमरेस री’ लोक में प्रसिद्ध हो गई.
- बख्तसिंह का योगदान:
- जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के छोटे भाई बख्तसिंह ने इस किले का जीर्णोद्धार करवाया और इसकी सुरक्षा को मजबूत बनाया.
- उन्होंने कला को प्रोत्साहन दिया, जिससे नागौर कला का केंद्र बन गया.
- जनरल कनिंघम के अनुसार, बख्तसिंह ने नागौर में कई मस्जिदों को तोड़कर उनके पत्थरों को शहर की दीवारों में चिनवा दिया था. आज भी शहर की दीवारों पर अरबी-फारसी के लेख उल्टे-पुल्टे लगे दिखते हैं.
दुर्ग की संरचना और वास्तुकला
नागौर का किला एक उत्कृष्ट स्थल और धान्वन दुर्ग है.
- सुरक्षा व्यवस्था:
- किले में दोहरी मजबूत दीवारें और चारों ओर पानी से भरी गहरी खाई है, जो इसे अभेद्य बनाती है.
- इसकी दीवारों की लंबाई लगभग 5000 फीट है, जिसमें 28 विशाल बुर्जें हैं.
- किले का कुल घेरा लगभग 2100 गज का है.
- प्रवेश द्वार:
- किले के 6 विशाल दरवाजे हैं: सिराईपोल, विचलीपोल, कचहरीपोल, सूरजपोल, धूपीपोल और राजपोल.
- नागौर शहर के चारों ओर भी एक मजबूत दीवार है, जिसमें जोधपुरी, अजमेरी, नाकास, माही, नया और दिल्ली दरवाजा जैसे 6 प्रवेश द्वार हैं.
- वास्तुकला की विशेषता:
- किले के बाहर से चलाए गए तोपों के गोले इसके महलों को नुकसान पहुँचाए बिना ही ऊपर से निकल जाते थे.
- किले के भीतर बादल महल और शीश महल के सुंदर भित्तिचित्र विशेष रूप से दर्शनीय हैं.
- अकबर ने किले के भीतर एक सुंदर फव्वारा भी बनवाया था.
अकबर का किला (मैगजीन), अजमेर: मुगल वास्तुकला का बेजोड़ नमूना
अजमेर के नया बाजार में स्थित, अकबर का किला मुगल बादशाह अकबर ने 1571-72 ई. के बीच इंडो-इस्लामिक शैली में बनवाया था. इस किले को अकबर का दौलतखाना और मैगजीन (शस्त्रागार) जैसे नामों से भी जाना जाता है.
- निर्माण का उद्देश्य:
- अकबर ने इस किले का निर्माण मालवा और गुजरात के सैन्य अभियानों को सफल बनाने और सैनिकों के लिए उचित आवास की व्यवस्था करने के लिए करवाया था.
- लगभग तीन साल में बनकर तैयार हुआ यह किला, राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जो पूरी तरह से मुस्लिम स्थापत्य शैली में बना है.
- संरचना और प्रवेश द्वार:
- यह किला वर्गाकार है और इसके चारों कोनों पर लगभग 54 फीट ऊँची अष्टकोणीय बुर्जें बनी हैं.
- इसका सबसे आकर्षक हिस्सा 54 फीट ऊँचा और 43 फीट चौड़ा विशाल प्रवेश द्वार है, जिसमें सुंदर जाली और झरोखे बने हैं.
इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ
यह किला कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है.
- हल्दीघाटी युद्ध की योजना: 18 जून, 1576 को हुए हल्दीघाटी युद्ध की अंतिम योजना इसी किले में तैयार की गई थी.
- जहाँगीर का दरबार: मुगल बादशाह जहाँगीर इस किले के मुख्य द्वार के झरोखे में बैठकर आम जनता को दर्शन देते थे.
- सर टॉमस रो की मुलाकात: 10 जनवरी, 1616 को इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के राजदूत सर टॉमस रो ने इसी किले के झरोखे के सामने जहाँगीर से मुलाकात कर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी.
मैगजीन और राजपूताना म्यूजियम
- अंग्रेजों का कब्जा: 1801 में अंग्रेजों ने इस किले पर अधिकार कर इसे अपना शस्त्रागार (मैगजीन) बना लिया, जिसके बाद यह ‘मैगजीन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. 1857 के गदर के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों के परिवारों ने इसी दुर्ग में शरण ली थी.
- राजपुताना म्यूजियम: 1902 में लॉर्ड कर्जन की अजमेर यात्रा के बाद, 1908 में इस किले में ‘राजपुताना म्यूजियम’ की स्थापना की गई.
- एजीजी कॉल्विन ने इस संग्रहालय का उद्घाटन किया था.
- इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा को इसका पहला क्यूरेटर बनाया गया.
- यह संग्रहालय प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों और अन्य दुर्लभ पुरा-संपदाओं के लिए प्रसिद्ध है.
- वर्तमान में, यह किला और संग्रहालय ‘अजमेर का किला एवं संग्रहालय’ के नाम से जाना जाता है.
चूरू का किला: चांदी के गोले चलाने वाला एकमात्र दुर्ग
चूरू का किला बीकानेर रियासत के अधीन एक जागीरी दुर्ग था, जो चूरू कस्बे के मुख्य बाजार में स्थित है. यह दुर्ग इतिहास में अपनी तरह की एक अनोखी घटना के लिए प्रसिद्ध है, जब यहाँ से दुश्मनों पर चांदी के गोले दागे गए थे.
- निर्माण:
- वर्तमान चूरू दुर्ग का निर्माण 1694 ई. में बीकानेर के राठौड़ सामंत कुशलसिंह ने करवाया था.
- उस समय बीकानेर के राजा अनूपसिंह थे.
1814 का युद्ध: जब तोप से निकले चांदी के गोले
1814 ई. में, महाराजा सूरतसिंह ने अपने सेनापति अमरचंद सुराना के नेतृत्व में चूरू पर आक्रमण कर दिया.
- घेराबंदी: बीकानेर की सेना ने चूरू दुर्ग को घेर लिया और तोपों से गोले बरसाने शुरू कर दिए.
- वीरता और समर्पण:
- चूरू के ठाकुर शिवजीसिंह ने डटकर मुकाबला किया. जब किले में बारूद के गोले खत्म होने लगे, तो लुहारों ने लोहे और शीशे के गोले बनाए.
- जब शीशा भी समाप्त हो गया, तो जनता ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए अभूतपूर्व साहस दिखाया. सेठ-साहूकारों और आम लोगों ने अपने घरों से चांदी लाकर ठाकुर को सौंप दी.
- लुहारों और सुनारों ने तुरंत उन चांदी से तोप के गोले बनाए.
- चमत्कार:
- जब तोपों से निकले चांदी के गोले शत्रु सेना पर गिरे, तो वे हैरान रह गईं.
- जनता के इस अद्भुत त्याग और भावनाओं का सम्मान करते हुए बीकानेर की सेना ने घेरा उठा लिया.
- इस घटना ने इस किले को दुनिया का एकमात्र ऐसा किला बना दिया, जिसने अपनी रक्षा के लिए चांदी के गोले चलाए.
- युद्ध का अंत:
- इसी दौरान, 27 नवंबर 1814 को ठाकुर शिवजीसिंह का निधन हो गया.
- अंत में, उनके पुत्र पृथ्वीसिंह ने किला बीकानेर रियासत को समर्पित कर दिया.
चौमूँ का किला (चौमुँहागढ़): धाराधारगढ़ के नाम से भी प्रसिद्ध
जयपुर से लगभग 33 किलोमीटर उत्तर में स्थित चौमूँ का किला अपनी अनूठी वास्तुकला और मजबूत सुरक्षा के लिए जाना जाता है. यह किला चौमुँहागढ़ कहलाता था, और इसी के चारों तरफ कस्बा बसने के कारण इसका नाम चौमूँ पड़ा. यह भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है और जागीरी ठिकानों में इसका विशेष महत्व था.
- निर्माण:
- ठाकुर कर्णसिंह ने 1595-97 ई. के बीच बेणीदास नामक संत के आशीर्वाद से इस किले की नींव रखी.
- ठाकुर रघुनाथसिंह के शासनकाल में इसे ‘रघुनाथगढ़’ भी कहा गया.
- इसे ‘धाराधारगढ़’ के नाम से भी जाना जाता है.
आंतरिक भवन और स्थापत्य
चौमूँ के किले में कई आलीशान और भव्य महल हैं.
- प्रमुख महल:
- कृष्ण निवास, रतन निवास, शीश महल और मोती महल.
- देवी निवास जयपुर के अल्बर्ट हॉल की प्रतिकृति जैसा दिखता है.
- धार्मिक स्थल:
- किले के मंगलपोल पर गणेशजी का मंदिर, मोहनलालजी का मंदिर और सीतारामजी के मंदिर यहाँ के शासकों की धार्मिक आस्था को दर्शाते हैं.
- नगर व्यवस्था:
- जयपुर की तरह ही, चौमूँ के सामंत शासकों ने अपने कस्बे में चौपड़, त्रिपोलिया और कटला बाजार विकसित किए.
- सुरक्षा और प्रवेश द्वार:
- यह कस्बा एक मजबूत परकोटे से सुरक्षित था, जिसमें बजरंग पोल (रावण दरवाजा), होली दरवाजा, चवड़ी दरवाजा और पीहाला दरवाजा जैसे विशाल प्रवेश द्वार थे.
किले की सुरक्षा और प्रमुख घटनाएँ
इस किले को अपनी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के कारण कभी भी पूरी तरह से कब्जा नहीं किया जा सका.
- मजबूत दीवारें: ठाकुर मोहनसिंह ने इसकी दीवारों को मजबूत बनवाया और चारों ओर एक गहरी खाई (परिखा) का निर्माण करवाया.
- आक्रमण: प्रसिद्ध हमलावरों रजाबहादुर और समरू बेगम ने बांडी नदी के किनारे से इस किले पर गोले बरसाए, लेकिन वे इसे भेद नहीं पाए.
कुचामन का किला: जागीरी किलों का सिरमौर
कुचामन का किला, जो पूर्व में जोधपुर रियासत के मेड़तिया राठौड़ों का एक प्रमुख ठिकाना था, को जागीरी किलों का सिरमौर कहा जाता है. इसके बारे में एक प्रसिद्ध कहावत है: “ऐसा किला राणी जाये के पास भले ही हो, ठुकराणी जाये के पास नहीं.”
- नामकरण:
- माना जाता है कि जिस पहाड़ी पर कुचामन बसा है, वहाँ पहले कुचबंधियों की बस्ती थी, जिसके नाम पर इसका नाम कुचामन पड़ा.
- यह क्षेत्र लंबे समय तक गौड़ क्षत्रियों के अधीन रहा, इसलिए इसे गौड़ाटी भी कहा जाता था
- निर्माण और इतिहास:
- जनश्रुति के अनुसार, मेड़तिया शासक जालिमसिंह ने वनखंडी नामक महात्मा के आशीर्वाद से इस किले की नींव रखी.
- विक्रम संवत 1715 में रघुनाथसिंह मेड़तिया ने गौड़ों को हराकर इस भू-भाग पर अधिकार किया.
- 1727 ई. में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने जालिमसिंह मेड़तिया को कुचामन की जागीर दी.
- यहाँ के शासक हमेशा जोधपुर रियासत के प्रति वफादार रहे, जिसकी प्रशंसा कवि बांकीदास ने अपनी ख्यात में की है.
- वास्तुकला और आंतरिक स्थल:
- यह एक सुंदर गिरि दुर्ग है, जिसमें कई बुर्जें, महल, रनिवास और अन्न भंडार हैं.
- सुनहरी बुर्ज अपने सोने के काम के लिए, रानी के महल और कांच महल (शीश महल) अपनी शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध हैं.
- यहाँ का हवामहल राजपूत स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है.
किले में जल संग्रह के लिए पाँच विशाल टांके हैं, जिनमें पाताल्या हौज और अंधेरया हौज प्रमुख हैं.
अन्य महत्वपूर्ण दुर्ग
भानगढ़ दुर्ग:
- अलवर जिले में, सरिस्का उद्यान के पास स्थित यह किला तीन तरफ पहाड़ियों से घिरा है.
- इसका निर्माण आमेर के राजा भगवंतदास ने 1573 ई. में करवाया था.
- यह लगभग तीन शताब्दियों तक आबाद रहा, और राजा माधोसिंह ने इसे अपना ठिकाना बनाया.
- तांत्रिक का श्राप: लोककथाओं के अनुसार, राजकुमारी रत्नावती और एक तांत्रिक के बीच की घटना के कारण, तांत्रिक ने श्राप दिया कि यहाँ के सभी लोग मर जाएँगे और उनकी आत्माएँ यहीं भटकती रहेंगी.
- इस कारण, सूर्यास्त के बाद इस दुर्ग में किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं है.
लक्ष्मणगढ़ दुर्ग, सीकर: सीधी बुर्जों का अनूठा किला
सीकर के राजा लक्ष्मणसिंह ने 1862 ई. में 300 फुट ऊँची पहाड़ी पर लक्ष्मणगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया. यह अपनी खास बनावट के लिए जाना जाता है, जहाँ पूरी दीवार के बजाय सीधी खड़ी बुर्जें एक-दूसरे से जुड़कर किले को घेरे हुए हैं.
- अनूठी बनावट:
- इस दुर्ग की बुर्जें सीधी खड़ी हैं और शीर्ष पर अंदर की ओर झुकी हुई हैं, जो इसे राजस्थान का एक अनूठा किला बनाती हैं.
- किले की दीवारें सीधे बुर्जों और झरोखों से बनी हैं, जिससे इसकी पहचान अलग है.
- जल प्रबंधन:
- इस किले में बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए बहुत प्रभावी व्यवस्था थी.
- यहाँ 25 फीट गहरे भूमिगत जल भंडार हैं, जो ऊपर से अलग-अलग दिखते हैं लेकिन अंदर से आपस में जुड़े हुए हैं.
मंडोर दुर्ग, जोधपुर: रावण की ससुराल का वीरान किला
जोधपुर से लगभग 9 किलोमीटर उत्तर में मंडोर दुर्ग के खंडहर स्थित हैं. इस नगर का प्राचीन नाम ‘मांडलव्यपुर’ था, जो महर्षि मांडव्य की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध था.
- पौराणिक कथा:
- जनश्रुति के अनुसार, मंडोर (प्राचीन नाम मंडोवर) के राजा मंदोदर (मय दानव) ने इस नगर का निर्माण किया था.
- उन्होंने अपनी पुत्री मंदोदरी का विवाह राक्षसों के राजा रावण से इसी नगर में किया था.
- इतिहास:
- 1459 ई. में राव जोधा ने मंडोर दुर्ग को असुरक्षित माना और अपने लिए मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया.
- इसके बाद, मंडोर दुर्ग वीरान हो गया और पूरी तरह से टूट-फूट जाने के कारण इसे ‘उल्टा किला’ भी कहते हैं.
मंडोर दुर्ग, जोधपुर: रावण की ससुराल का वीरान किला
जोधपुर से लगभग 9 किलोमीटर उत्तर में मंडोर दुर्ग के खंडहर स्थित हैं. इस नगर का प्राचीन नाम ‘मांडलव्यपुर’ था, जो महर्षि मांडव्य की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध था.
- पौराणिक कथा:
- जनश्रुति के अनुसार, मंडोर (प्राचीन नाम मंडोवर) के राजा मंदोदर (मय दानव) ने इस नगर का निर्माण किया था.
- उन्होंने अपनी पुत्री मंदोदरी का विवाह राक्षसों के राजा रावण से इसी नगर में किया था.
- इतिहास:
- 1459 ई. में राव जोधा ने मंडोर दुर्ग को असुरक्षित माना और अपने लिए मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया.
- इसके बाद, मंडोर दुर्ग वीरान हो गया और पूरी तरह से टूट-फूट जाने के कारण इसे ‘उल्टा किला’ भी कहते हैं.
गढ़ पैलेस, कोटा: चंबल नदी का विशाल दुर्ग
कोटा का गढ़ पैलेस चौहानों के प्रमुख दुर्गों में से एक है. यह चंबल नदी के किनारे बना है और अपनी विशालता के लिए जाना जाता है.
- स्थापना:
- इसकी स्थापना बूंदी के राव देवा के पुत्र जैतसिंह ने कोटिया भील पर विजय प्राप्त करने के बाद गुलाब महल के रूप में की थी, जो अब गढ़ का हिस्सा है.
- यह एक स्थल दुर्ग है, जिसमें भारतीय और मुगल शैलियों का समन्वय है.
- विशाल परकोटा:
- कर्नल टॉड ने लिखा था कि आगरा के किले को छोड़कर किसी भी किले का परकोटा कोटा गढ़ जितना बड़ा नहीं है.
- इसका परकोटा 10 किलोमीटर की परिधि में फैला है, जिसमें 6 विशाल दरवाजे हैं.
- आंतरिक संरचना:
- दुर्ग में कई महल हैं, जैसे जैतसिंह महल, माधोसिंह महल, बड़ा महल, केसर महल और हवा महल.
- झाला हवेली के भित्तिचित्रों के बारे में कार्ल खंडालावाला ने कहा था कि ये एशिया में बेजोड़ हैं.
- गढ़ पैलेस में राव माधोसिंह संग्रहालय भी है, जो रियासती संस्कृति को दर्शाता है.
- यहाँ स्थित हवामहल, जिसका निर्माण महाराव रामसिंह द्वितीय ने करवाया था, जयपुर के हवामहल से मेल खाता है.
सज्जनगढ़ (मानसून पैलेस), उदयपुर: सौ रोगों की दवा
उदयपुर से 3 किलोमीटर पश्चिम में बांसदरा पहाड़ी पर स्थित, सज्जनगढ़ को अब मानसून पैलेस के नाम से जाना जाता है.
- निर्माण:
- महाराणा सज्जनसिंह (1874-1884 ई.) ने इसे अपनी शिकारगाह और राजमहल के रूप में बनवाया था.
- यह पहाड़ी समुद्र तल से 3100 फीट की ऊँचाई पर है.
- कहावत: प्राकृतिक परिवेश के कारण यहाँ रोगनाशक हवा बहती थी, इसलिए इसके बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है: “सज्जनगढ़ की हवा, सौ रोगों की दवा.”
बनेड़ा दुर्ग, शाहपुरा: मेवाड़ का एक प्राचीन गढ़
शाहपुरा जिले के बनेड़ा कस्बे में, महाराणा कुंभा ने 15वीं शताब्दी में एक दुर्ग का निर्माण करवाया था.
- इतिहास:
- महाराणा सांगा ने यह दुर्ग श्रीनगर के जागीरदार करमचंद पंवार को दिया था.
- 1681 ई. में इसे मेवाड़ के महाराणा राजसिंह प्रथम के पुत्र भीमसिंह को प्रदान किया गया.
- समय के साथ, यह दुर्ग जीर्ण-शीर्ण हो गया
ऊंटाला (वल्लभनगर) दुर्ग, उदयपुर: चुंडावतों और शक्तावतों की वीरता का साक्षी
उदयपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर वल्लभनगर कस्बे को पहले ऊंटाला कहा जाता था, जो मेवाड़ रियासत का एक प्रसिद्ध ठिकाना था. यहाँ गुहिलों का एक प्राचीन दुर्ग स्थित है.
- साहसिक प्रतियोगिता:
- 1596 ई. में महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद, मुगल सेनापति ने ऊंटाला पर अधिकार कर लिया.
- महाराणा अमरसिंह ने जब ऊंटाला पर चढ़ाई की, तो सेना के अग्रभाग (हरावल) में रहने के अधिकार को लेकर चुंडावतों और शक्तावतों के बीच विवाद हो गया.
- महाराणा ने फैसला दिया कि जो पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा, वही हरावल में रहेगा.
- इस प्रतियोगिता में, जैतसिंह चुंडावत ने अपना सिर काटकर पहले दुर्ग में फेंक दिया, जिससे चुंडावतों का हरावल में रहने का अधिकार बना रहा
गीजगढ़, दौसा: नौका की आकृति वाला दुर्ग
- स्थापत्य:
- सिकंदरा से 7 किमी दूर गीजगढ़ दुर्ग एक पहाड़ी पर बना है.
- यह एक जहाज या नौका की आकृति में बना हुआ भव्य दुर्ग है, जिसमें 6 विशाल बुर्जें हैं.
- यहाँ हाथी डूबन रनिवास, शस्त्रागार, बारूदखाना और कई मंदिर हैं.