Chauhan dynasty (चौहान राजवंश)

चौहान राजवंश: अजमेर शाखा का विस्तृत इतिहास

चौहानों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धांत

  • अग्निकुंड सिद्धांत: नैणसी, टॉड और सूर्यमल्ल मिश्रण ने इसे स्वीकार किया है.
  • वत्सगोत्रीय ब्राह्मण: बिजौलिया शिलालेख के अनुसार चौहान वत्सगोत्रीय ब्राह्मण थे. दशरथ शर्मा भी इस मत का समर्थन करते हैं.
  • विदेशी उत्पत्ति: टॉड और स्मिथ चौहानों को विदेशी मानते हैं.
  • ‘खज’ जाति से उत्पन्न: डॉ. भण्डारकर ने यह मत प्रस्तुत किया है.
  • महर्षि वशिष्ठ की संतान: सुन्धा माता अभिलेख में ऐसा उल्लेख है.
  • सूर्यवंशी: हम्मीर महाकाव्य और डॉ. गौरीशंकर हीरानंद ओझा इस मत के समर्थक हैं.
  • अग्निवंशी: भाटों और चारणों द्वारा यह मत दिया गया है.
  • इंद्र का वंशज: रायपाल के सेवाड़ी के लेख में चौहानों को इंद्र का वंशज बताया गया है.

ब्राह्मण वंशीय: कायम खां रासो और चंद्रवती के लेख भी चौहानों को ब्राह्मण वंशीय मानते हैं.

चौहानों का प्रारंभिक काल

  • चौहान प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहारों के सामंत थे.
  • कुलदेवी: चौहानों की कुलदेवी शाकम्भरी माता हैं.
  • अन्य कुलदेवियाँ: सीकर के चौहानों की जीण माता और जालौर के चौहानों की आशापुरा माता हैं.
  • कुलदेवता: हर्षनाथ जी (सीकर) चौहानों के कुलदेवता हैं.

मूल पुरुष: ‘चहमान’ नाम का व्यक्ति चौहानों का मूल पुरुष रहा है

चौहानों के मूल स्थान और प्रारंभिक राजधानी

  • सपादलक्ष/सांभर: चौहान इस क्षेत्र के इर्द-गिर्द रहते थे, जिसे सवा लाख गाँव होने के कारण ‘सपादलक्ष’ कहा जाता था.
  • प्रारंभिक राजधानी: अहिछत्रपुर (नागौर), जो जांगलप्रदेश की राजधानी भी थी.
  • अन्य मुख्य नगर: अहिछत्रपुर और पूर्णतल्ल.
  • अन्नत गोचर: नागों की प्रबलता के कारण चौहानों की आदि भूमि को अन्नत गोचर भी कहते थे.
  • वनस्पति: शमी, करीर, पीलू की प्राकृतिक उपज के कारण यह क्षेत्र जांगल नाम से प्रसिद्ध था.
  • शासक उपाधि: सांभर के चौहान शासक संभरीश कहलाए.
  • बाद की राजधानी: शाकम्बरी (सांभर) से बदलकर अजमेर बन गई, जिसका वर्णन जयानक ने पृथ्वीराज विजय में किया है.
  • कवि जयानक: कश्मीर के प्रसिद्ध कवि थे, जिन्होंने पुष्कर में रहकर ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की.
  • अनंत प्रदेश (सीकर): हर्षनाथ अभिलेख (973 ई.) के अनुसार चौहानों का मूल स्थान.

पुष्कर अजमेर: हम्मीर महाकाव्य (नैनचंद्रसूरी) और सुर्जन चरित्र (चंद्रशेखर) के अनुसार चौहानों का मूल स्थान.

चौहान वंश के संस्थापक: वासुदेव चौहान

  • संस्थापक/आदिपुरुष/मूलपुरुष: वासुदेव चौहान.
  • स्थापना: 551 ई. में सांभर में चौहान वंश की स्थापना की.
  • बिजौलिया शिलालेख (1170 भीलवाड़ा): इस शिलालेख के अनुसार सांभर के चौहानों का मूल पुरुष वासुदेव था और उसने सांभर झील का निर्माण भी करवाया था.

बिजौलिया शिलालेख (1170 ई., भीलवाड़ा)

  • शुद्ध नाम: टॉड के अनुसार इसका शुद्ध नाम विजयावल्ली था.
  • स्थान: पार्श्वनाथ मंदिर की दीवार पर लिखा गया है.
  • रचना: इसके रचयिता गुणभद्र थे और लेखक कायस्थ केशव थे.
  • भाषा और पद्य: संस्कृत भाषा में लिखा गया है और इसमें 13 पद्य हैं.
  • महत्व: यह चौहान वंश से संबंधित है, इसमें चौहानों के लिए “विप्र श्रीवत्सगोत्रेभूत” शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसके आधार पर दशरथ शर्मा ने चौहानों को ब्राह्मणों की संतान बताया है.
  • अन्य नामों का उल्लेख: इसमें जालौर का नाम जाबालिपुर, सांभर का नाम शाकम्बरी, भीनमाल का नाम श्रीमाल मिलता है.
  • हर्षनाथ मंदिर: दुर्लभ राज के पुत्र गुवक ने सीकर में हर्षनाथ मंदिर बनवाया था, जो चौहानों के इष्ट देव हैं (औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ा था).
  • गुवक प्रथम

    • दुर्लभराज का पुत्र: इसने वत्सराज के सहयोग से मध्यप्रदेश के पालों देश तक विजय प्राप्त की और गौड़ देश पर अधिकार कर लिया था.
    • नागभट्ट द्वितीय का सामंत: चौहान प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहारों के सामंत थे.
    • हर्षनाथ मंदिर: गुवक ने हर्षनाथ मंदिर (सीकर) बनवाया, जो चौहानों के कुल देवता हैं.

     

  • गुवक द्वितीय

    • विवाह: कन्नौज के शासक भोजराज की बहन कलावती से विवाह किया था.

    चंदन राज

    • गुवक द्वितीय का पुत्र: इसने दिल्ली के तोमर शासकों को हराया था.
    • पत्नी रुद्राणी/आत्मप्रभा: यौगिक क्रिया में निपुण और शिवभक्त थीं; रोजाना पुष्कर में शिवजी के सामने एक हजार दीपक जलाती थीं.

    वाक्पतिराज प्रथम

    • चंदनराज का पुत्र: हर्षनाथ अभिलेख में ‘महाराज’ की उपाधि मिलती है.
    • सैन्य उपलब्धियाँ: पृथ्वीराज विजय के अनुसार इसने 188 युद्ध किए थे.

    सिंहराज

    • वाक्पतिराज का पुत्र: 956 ई. के एक शिलालेख के अनुसार यह विजयपाल प्रतिहार के समकालीन था.
    • महत्वपूर्ण उपाधि: “परमभट्टारक-महाराजाधिराज-परमेश्वर” की उपाधि धारण की, जो स्वतंत्र राजा धारण करते थे.

    विग्रहराज द्वितीय

    • सैन्य विजय: जयानक व चंद्रशेखर के अनुसार इसने मूलराज चालुक्य को परास्त किया, जिसने काण्ठा किले में शरण ली.
    • उपाधि: खुर-रजोन्धकार (घोड़ों की टापों से उठी धूल से आकाश ढक जाने के कारण).
    • साम्राज्य विस्तार: इसके समय चौहान सेना नर्मदा व भृगुकच्छ पत्तन तक पहुंची थी.

    दुर्लभराज द्वितीय

    • सैन्य विजय: नाडौल के महेन्द्र चौहान को हराया.
    • उपाधि: शक्राई अभिलेख में इसकी उपाधि ‘महाराजाधिराज’ मिलती है.

    गोविन्द तृतीय

    • उपाधि: पृथ्वीराज विजय में इसकी उपाधि ‘वैरीघरट्ट’ मिलती है.
    • गजनी के शासक को रोका: फरिश्ता ने गोविन्द तृतीय को गजनी के शासक को मारवाड़ में आगे बढ़ने से रोकने वाला कहा है.

    वाक्पति राज द्वितीय

    • गोविन्द तृतीय का पुत्र: इसने मेवाड़ शासक अम्बाप्रसाद को युद्ध में मार दिया और चित्तौड़ पर अधिकार करने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली.

    पृथ्वीराज प्रथम

    • पुष्कर में चालुक्यों का वध: 1105 ई. में 700 चालुक्यों को मारा जो पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए थे.
    • उपाधि: ‘परम भट्टारक-महाराजा-धिराज-परमेश्वर’.
    • धर्म: शिव भक्त था और सोमनाथ मार्ग में यात्रियों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की थी.
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अजयराज (1113-1133 ई.)

    • धर्म: शैव धर्म को मानता था.
    • साम्राज्य विस्तार: इसके समय चौहान साम्राज्य के विस्तार का दौर प्रारम्भ हुआ.
    • सैन्य विजय: अवन्ति के राजा नरवर्मा को हराकर श्रीपथ (बयाना) पर अधिकार किया; परमार दण्डनायक सोल्लण को जीवित पकड़ा.
    • राजधानी परिवर्तन: सांभर छोड़कर अजमेर को अपनी राजधानी बनाई.
    • अजयमेरू (अजमेर) नगर: 1113 ईस्वी में बसाया.
    • मुद्राएँ: तांबे और चांदी के सिक्के चलाए, जिन पर ‘अजयप्रिय द्रम्स’ और रानी सोमलवती का नाम भी लिखवाया. यह चौहानों का प्रथम शासक था जिसने अपनी मुद्राएँ चलाईं.
    • धार्मिक सहिष्णुता: दिगम्बर व श्वेताम्बर विचारधारा के मध्य शास्त्रार्थ की अध्यक्षता की.
    • उत्तराधिकार: राजगद्दी अर्णोराज को सौंपकर पुष्कर चले गए.
    • अन्य विजयें: तुर्क शहाबुद्दीन, मालवा के नरवर्मन, अहिलपाटन (गुजरात) के मूलराज II को हराया.
    • दान: पार्श्वनाथ मंदिर के सुवर्ण कलश का दान किया था.

    अजयमेरू दुर्ग (तारागढ़ दुर्ग)

    • निर्माण: 1113 में अजयराज ने बनवाया.
    • अन्य नाम: गढ़बीठली दुर्ग (गढ़बीठली पहाड़ी पर होने के कारण), तारागढ़ (मेवाड़ रायमल पुत्र पृथ्वीराज सिसोदिया की पत्नी तारा के नाम पर).
    • रूठी रानी का महल: मालदेव की पत्नी रूठी रानी उमादे यहीं रही थीं.
    • उपाधियाँ: विशप हैबर ने इसे “राजस्थान का जिब्राल्टर/पूर्व का जिब्राल्टर” कहा है. इसे “राजपुतानें की कुंजी, सर्वाधिक स्थानीय आक्रमण झेलने वाला दुर्ग, अरावली का अरमान” भी कहा जाता है.
    • सर्वाधिक विदेशी आक्रमण: भटनेर दुर्ग ने झेले हैं.
    • प्रथम गिरी दुर्ग: हरविलास शारदा ने “अखबार-उल-अखयार” में तारागढ़ को राजस्थान का प्रथम गिरी दुर्ग बताया है.
    • प्रमुख स्थल: घोड़े की मजार, मीरानशाह/मीर सैयद हुसैन दरगाह, रूठी रानी महल, पृथ्वीराज स्मारक आदि.
    • बुर्ज: घूंघट, पगड़ी, बांदरा, इमली आदि बुर्ज हैं.
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अर्णोराज/आनाजी (1133-1155 ई.)

  • शिलालेख: रेवासा में दो शिलालेख मिले हैं, जिनमें इसकी उपाधि महाराजाधिराज-परमेश्वर है.
  • मंदिर निर्माण: अजमेर में शिव मंदिर और पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया. (वराह मंदिर का जीर्णोद्धार समरसिंह ने करवाया, जिसे जहांगीर ने पानी में फिंकवा दिया).
  • दरबारी विद्वान: देवबोध और धर्मघोष.
  • प्रमुख उपलब्धियाँ:
    • अजमेर के निकट तुरुष्कों का वध किया.
    • मालवा के राजा नरवर्मा को हराया व मालवा से हाथी छीने.
    • चौहान सेना को सिंधु व सरस्वती नदी तक ले गया.
    • हरितानक प्रदेश पर भी अभियान किया था.
    • हरियाणा के समीपवर्ती वारण (बुलंदशहर) क्षेत्र में डोड राजपूतों को हराया.
  • चालुक्य शासकों से संबंध: जयसिंह सिद्धराज ने अपनी पुत्री कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से किया.
  • कुमारपाल से युद्ध: अर्णोराज व कुमारपाल के मध्य दो युद्ध हुए (1145 ई. आबू के निकट, 1150 ई. जिसमें अर्णोराज पराजित हुआ).
  • विवाह संबंध: अर्णोराज ने अपनी पुत्री जलना का विवाह कुमारपाल से किया.

आनासागर झील

  • निर्माण का कारण: यमीनी सुल्तान के आक्रमण के बाद तुर्कों का संहार जहाँ आज आनासागर झील है, वहाँ हुआ था. अर्णोराज ने शुद्धि के लिए तालाब बनवाया व इन्दु नदी का जल भरवाया.
  • निर्माण काल: बिजोलिया शिलालेख के अनुसार 1133 ई. से 1137 ई. के मध्य; पृथ्वीराज रासो के अनुसार 1135-37 के मध्य.
  • वर्तमान स्थिति: वर्तमान में अनासागर झील में लूणी या चंद्रा नदी गिरती है.
  • शाही बाग/दौलत बाग: जहांगीर ने बनवाया, जिसे वर्तमान में ‘सुभाष बाग’ कहते हैं.
  • इत्र का आविष्कार: इस बाग में जहांगीर की पत्नी नूरजहां की मां अस्मत बेगम ने ‘इत्र’ का आविष्कार किया था.
  • अर्णोराज के विवाह: मरूदेश की यौधेय राजकुमारी सुधवा से और जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कांचन देवी से.
  • उत्तराधिकार: ज्येष्ठ पुत्र जग्गदेव ने अर्णोराज की हत्या कर दी. (जग्गदेव को “चौहानों का पितृहन्ता” कहा जाता है).
  • सामंतों का निर्णय: सामंतों ने जग्गदेव को शासक न बनाकर विग्रहराज का पक्ष लिया. जग्गदेव युद्ध में मारा गया.

विग्रहराज चतुर्थ/बीसलदेव (1158-1163 ई.)

      • विजयें: तोमरों से दिल्ली, मुस्लिमों से झांसी व हिसार, चालुक्य कुमार पाल से पाली, जालौर व नागौर छीना.
      • अजमेर का महत्व: बारहवीं शताब्दी में अजमेर को भारत की राजधानी होने का गौरव मिला.
      • स्वर्णकाल: विग्रहराज का समय चौहानों का स्वर्णकाल माना जाता है.
      • अन्य विजयें: गजनी शासक खुसरो शाह (1153-60 ई.) को हराया; नाडौल के कुन्तपाल को हराया व नगर को जला दिया; चित्तौड़ के चालुक्य दण्डनायक सज्जन का वध किया.
      • तंवरों से संबंध: चौहानों का तंवरों से युद्ध चंदनराज के समय प्रारम्भ हुआ और विग्रहराज के समय समाप्त हुआ. विग्रहराज ने झांसी व दिल्ली को अपने क्षेत्र में मिलाया लेकिन राजकीय कार्य तंवरों के ही हाथ में रहने दिया.
      • उपाधि: कवि बान्धव (जयानक ने दी).
      • दिल्ली पर अधिकार: दिल्ली पर अधिकार करने वाला चौहानों का प्रथम शासक.
      • साहित्यिक योग्यता: किलहार्न ने कहा है कि विग्रहराज, कालिदास व भवभूति की होड़ करता है.

      हरिकेली नाटक

      • रचना: विग्रहराज चतुर्थ ने संस्कृत भाषा में की थी.
      • विषय-वस्तु: किरात के भेष में भगवान शिव व अर्जुन के मध्य संवाद.
      • उपस्थिति: इसकी कुछ पंक्तियाँ ढाई दिन के झोंपड़े में और कुछ ब्रिस्टल (इंग्लैंड) के राजा राममोहन राय स्मारक पर लिखी हैं.
      • भारवी का प्रभाव: भारवी के किरातार्जुनीयम् नाटक का विषय-वस्तु यही है जो हरिकेली नाटक का है.

      संस्कृत पाठशाला और ढाई दिन का झोंपड़ा

      • संस्कृत पाठशाला: परमार भोज की धारा नगरी की तर्ज पर संस्कृत पाठशाला बनवाई तथा उसमें ‘हरिकेलि’ नाटक को उत्कीर्ण करवाया.
      • मस्जिद में परिवर्तन: मोहम्मद गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस पाठशाला को तोड़कर एक मस्जिद में बदल दिया.
      • राजस्थान की प्रथम मस्जिद: यह राजस्थान की प्रथम मस्जिद है.
      • नाम: इसे ढाई दिन का झोंपड़ा भी कहा जाता है.
      • डिज़ाइन: मस्जिद की डिज़ाइन अबू बकर ने तैयार की थी.
      • नामकरण के कारण:
        • जॉन मार्शल के अनुसार यह मस्जिद ढाई दिन में बनकर तैयार हुई थी.
        • पर्सी ब्राउन के अनुसार यहाँ पंजाब शाह पीर का ढाई दिन का उर्स लगता है.
      • कलात्मक महत्व: टॉड ने ढाई दिन के झौंपड़े को हिन्दू शिल्पकला का सबसे प्राचीनतम व परिष्कृत नमूना कहा था.
      • स्तंभ: इसमें 16 खंभे हैं.

      भारत की प्रथम मस्जिदें

      • चेरामन जुमा मस्जिद (केरल): 629 ई. की, भारत की प्रथम जुमा मस्जिद (मोहम्मद साहब के जीवनकाल में निर्मित).
      • कुवैत-उल-इस्लाम (उत्तरी भारत): कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाई.
      • ढाई सीढ़ी की मस्जिद (भोपाल, मध्यप्रदेश): भोपाल की प्रथम व एशिया की सबसे छोटी मस्जिद.

      विग्रहराज चतुर्थ की अन्य उपलब्धियाँ

      • पशुवध पर प्रतिबंध: विद्वान धर्मघोष के कहने पर एकादशी के दिन पशुवध पर प्रतिबंध लगाया.
      • दरबारी विद्वान: सोमदेव, जिन्होंने ललित विग्रहराज की रचना की.

      विग्रहराज के समय के नाटक

      1. ललित विग्रहराज:
        • लेखक: सोमदेव.
        • विषय: इन्द्रपुरी की राजकुमारी देसलदेवी व विग्रहराज के मध्य प्रेम संबंधों का वर्णन है.
      2. बीसलदेव रासो:
        • लेखक: नरपति नाल्ह.
        • चार खंड:
          • प्रथम खंड: मालवा के परमार भोज की पुत्री राजमति व बीसलदेव के मध्य विवाह का वर्णन.
          • द्वितीय खंड: बीसलदेव का राजमति से नाराज होकर उड़ीसा जाने का जिक्र (उड़ीसा विजय का भी जिक्र).
          • तृतीय खंड: राजमति के विरह का वर्णन.
      चतुर्थ खंड: भोज द्वारा अपनी पुत्री को वापस ले जाना व बीसलदेव को वहाँ से चित्तौड़ जाने का वर्णन.

पृथ्वीराज (तृतीय) चौहान (1177-1192 ई.)

        • पिता: सोमेश्वर.
        • माता: कर्पूरी देवी.
        • उपनाम:
          • रायपिथौरा (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला).
          • दलपंगुल (विश्व विजेता) (दलथंभन उपाधि जोधपुर के गजसिंह की है).
          • हिन्दू सम्राट.

        प्रारंभिक शासनकाल

        • बाल्यावस्था में शासक: जब शासक बने तब उनकी उम्र 11 वर्ष थी, राजकार्य माता कर्पूरी देवी ने संभाला.
        • मुख्यमंत्री: कदम्बवास/कैलास/केम्बवास (अहीरावती जागीर का दाहिमा राजपूत और विद्वान).
        • सेनापति: भुवनमल (कर्पूरी देवी का रिश्तेदार). भुवनमल ने नागों का दमन भी किया था.

        पृथ्वीराज की प्रमुख विजयें

        नागार्जुनों का दमन (1178 ई.)

        • विद्रोह: नागार्जुन (विग्रहराज का पुत्र) स्वयं दिल्ली का शासक बनना चाहता था, इसने चाचा अमरगांगेय के साथ गुड़गांव पर अधिकार कर लिया.
        • दमन: पृथ्वीराज ने नागार्जुन के सेनापति देवभट्ट को मार गिराया, नागार्जुन युद्धस्थल से भाग गया.
        • पुनर्विजय: गुड़गांव पर पुनः पृथ्वीराज का अधिकार हो गया.

        भण्डानकों का दमन (1182 ई.)

        • परिचय: सतलज प्रदेश से आई हुई एक जाति, जिसका उल्लेख स्कन्धपुराण में भी मिलता है.
        • विस्तार: गुड़गांव व हिसार के आस-पास थी और मथुरा, अलवर व भरतपुर तक फैल गई थी.
        • दमन: पृथ्वीराज ने भण्डानकों की शक्ति का पूर्णतः दमन कर दिया.
        • ऐतिहासिक पुष्टि: समकालीन इतिहासकार जिनपति सूरी ने भी इसका उल्लेख किया है.

        महोबा विजय/तुमुल विजय (1182 ई.) – दिग्विजय का प्रथम सोपान

        • तत्कालीन कारण: पृथ्वीराज के घायल सैनिकों को परमरदी देव चंदेल ने मरवा दिया.
        • परमरदी देव की कमजोर स्थिति: उसके वीर सेनापति आल्हा व ऊदल कन्नौज शासक जयचंद गहड़वाल की शरण में चले गए थे.
        • युद्ध की शुरुआत: पृथ्वीराज अपनी सेना के साथ सिरस्वा पहुँचा.
        • आल्हा व ऊदल की वापसी: परमरदी देव के निमंत्रण पर आल्हा व ऊदल अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए वापस आ गए.
        • तुमुल का युद्ध: चंदेल व चौहानों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. जयचंद गहड़वाल ने भी परमरदी देव की सहायता के लिए सेना भेजी, लेकिन चंदेल व गहड़वालों की संयुक्त सेना हार गई.
        • परिणाम: पृथ्वीराज ने परमरदी देव को माफ कर दिया और महोबा का सामंत पन्जुनराय को बनाया.
        • आल्हा व ऊदल की वीरता: जगनिक ने उनके लिए कहा था: “बारह बरस कुक्कर जिए, तेरह बरस सियार, बरस अठारह क्षत्रिय जिए, बाकी जीवन धिक्कार.”

        नागौर विजय (1184 ई.)

        • विवाद का कारण: गुजरात का चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय (जो पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर की हत्या का जिम्मेदार माना जाता था) नागौर पर अधिकार करना चाहता था.
        • युद्ध: नागौर किले के बाहर पृथ्वीराज व जगदेव (भीमदेव का पुत्र) के मध्य युद्ध हुआ.
        • परिणाम: जगदेव की सेना ने हथियार डाल दिए और संधि हुई. नागौर किला वापस पृथ्वीराज के अधिकार में आ गया.
        • चौहान-चालुक्य संघर्ष की समाप्ति: इस संधि से लंबे समय से चला आ रहा संघर्ष समाप्त हो गया.
        • विवाद के अन्य कारण: पृथ्वीराज रासो में आबू की परमार राजकुमारी इच्छिनी को विवाह का कारण बताया है, जिसे पृथ्वीराज ने भीमदेव से पहले विवाह कर लिया था. रासो में यह भी बताया गया है कि पृथ्वीराज के चाचा कान्हड़देव ने भीमदेव के चाचा सारंगदेव के सात पुत्रों को मार दिया था. हालांकि, ये कारण सत्य नहीं माने जाते. वास्तविक कारण दोनों की सीमाओं का मिलना था.

        चौहान-गहड़वाल संघर्ष व दिग्विजय नीति का तृतीय सोपान

        • विवाद का कारण: पृथ्वीराज व कन्नौज शासक जयचंद गहड़वाल के मध्य सीमा विवाद, दोनों का शक्तिशाली होना, और जयचंद की दिल्ली पर अधिकार करने की इच्छा.
        • ईर्ष्या: पृथ्वीराज के नागों, भण्डानकों व चंदेलों के दमन से जयचंद ईर्ष्या रखने लगा.

        संयोगिता व इसकी ऐतिहासिकता (पृथ्वीराज रासो के अनुसार)

        • परिचय: कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल की पुत्री, अत्यंत सुंदर व विदुषी.
        • प्रेम प्रसंग: दिल्ली के चित्रकार पन्नाराय द्वारा पृथ्वीराज का चित्र दिखाने पर संयोगिता पृथ्वीराज से प्रेम करने लगी.
        • स्वयंवर: जयचंद गहड़वाल ने राजसूय यज्ञ का आयोजन करवाया व संयोगिता का स्वयंवर रखा. पृथ्वीराज को निमंत्रण नहीं भेजा और उसकी आदमकद मूर्ति द्वार पर द्वारपाल के रूप में लगवाई.
        • संयोगिता का चयन: राजकुमारी ने स्वयंवर में पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी.
        • पृथ्वीराज का आगमन: पृथ्वीराज भेष बदलकर स्वयंवर में पहुँचा और संयोगिता को अपने साथ घोड़े पर लेकर अजमेर चला गया. युद्ध में कई सैनिक मारे गए.
        • ऐतिहासिकता पर मतभेद:
          • सत्य मानने वाले: दशरथ शर्मा, चंद्रशेखर, अबुल फजल.
          • काल्पनिक मानने वाले: डॉ. ओझा व डॉ. त्रिपाठी (इनके अनुसार पृथ्वीराज के समय राजसूय यज्ञ व स्वयंवर की प्रथा लुप्त हो गई थी).
        • अन्य नाम: सुरजन चरित में संयोगिता का नाम कांतिमति मिलता है.

        शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी व पृथ्वीराज चौहान

        • गौरी का वंश: तुर्की के शंसबानी वंश का था, प्रारंभ में गजनी के अधीन था.
        • उपाधि: खुरासन विजय के बाद मुइजुद्दीन की उपाधि धारण की.
        • भारत पर आक्रमण: गोमल दर्रे से भारत पर आक्रमण किया.
        • पहला आक्रमण (1175): मुल्तान के करमाथी जाति के सियाओं के विरुद्ध.
        • गुजरात पर आक्रमण (1178): गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय ने काशहद मैदान में गौरी को हराया, यह भारत में गौरी की पहली पराजय थी.

        तराइन प्रथम युद्ध (1191 ई.)

        • तत्कालिक कारण: गौरी ने 1188 में भटिण्डा पर अधिकार कर लिया, जिस पर पृथ्वीराज अपना अधिकार जताता था.
        • पृथ्वीराज के सहयोगी: दिल्ली से गोविन्द राय, सेनापति खाण्डेराव.
        • परिणाम: गोविन्दराय के आक्रमण से गौरी घायल हुआ. इस युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई.

        तराइन द्वितीय युद्ध (1192 ई.)

        • गौरी की तैयारी: 1,20,000 की सेना लेकर चला; लाहौर से दूत (कयाम उल मुल्क, रूग्नूदीन हमजा) भेजे.
        • पृथ्वीराज की सेना में कमी: सेनापति उदयराज समय पर नहीं पहुँच सका.
        • गौरी से मिले हुए: पृथ्वीराज के मंत्री सोमेश्वर व प्रतापसिंह गौरी से मिल गए.
        • पृथ्वीराज के सहयोगी: जालौर से समरसिंह, दिल्ली से गोविन्दराय, मेवाड़ से सामन्त सिंह.
        • परिणाम: इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई.
        • सेना की संख्या: फरिश्ता के अनुसार पृथ्वीराज के पास 3 लाख सेना थी.
        • गौरी के सेनापति: खारबक, खर्मेल, इलाह व मुकल्बा.
        • मृत्यु: गोविन्दराय इस युद्ध में मारा गया.
        • गिरफ्तारी: पृथ्वीराज को सिरसा के नजदीक पकड़ लिया गया.

        पृथ्वीराज की मृत्यु से संबंधित विचारधाराएँ

        1. पृथ्वीराज रासो (चंदरबरदाई): गौरी पृथ्वीराज को गजनी ले गया, आँखें फुड़वा दीं. चंदरबरदाई ने कल्हण को ग्रंथ देकर गजनी पहुँचकर शब्दभेदी बाण से गौरी की हत्या करवा दी.
          • दोहा: “चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ट परमार, ता पर बैठ्यो सुल्तान चूक मति चौहान.”
        2. हम्मीर महाकाव्य: पृथ्वीराज को कैद करके अंत में मरवा दिया.
        3. पृथ्वीराज प्रबंध: पृथ्वीराज को बंदी बनाकर अजमेर के महल में रखा, जहाँ उसने गौरी को मारने का प्रयास किया, जिसके बाद गौरी ने उसे गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई.
        4. अबुल फजल: पृथ्वीराज को गौरी गजनी ले गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई.
        5. मिनहाज: पृथ्वीराज की हत्या यहीं (भारत में) कर दी गई थी.
        6. हसन निजामी (और ‘किसलविधिविद्धवमसा’): पृथ्वीराज ने गौरी की अधीनता स्वीकार कर ली थी और कुछ समय तक अजमेर में शासन किया. पृथ्वीराज के कुछ सिक्कों में ‘श्रीमोहम्मदसाम’ लिखा होना इसकी पुष्टि करता है. बाद में षड्यंत्र करने पर मृत्युदंड दिया गया.
          • उत्तराधिकारी: गौरी ने पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज को अजमेर का शासक बनाया.

        अन्य तथ्य

        • पृथ्वीराज की छतरी: गजनी में.
        • पृथ्वीराज का स्मारक: अजमेर में.
        • युद्धों की संख्या:
          • पृथ्वीराज रासो: 21 बार.
          • हम्मीर काव्य: 7 बार.
          • सुर्जन चरित्र: 21 बार.
          • प्रबंध कोश: 20 बार गौरी को कैद से मुक्त करना बताया है.
          • चिंतामणि: 23 बार गौरी का हारना लिखा है.
        • दरबारी विद्वान: जयानक, विद्यापति, वागीश्वर, जनदिन, विश्वरूप आदि.
        • दशरथ शर्मा का मत: पृथ्वीराज को सुयोग्य व रहस्यमयी शासक कहा है.
        • निर्माण कार्य: दिल्ली में रायपिथौरागढ़ का निर्माण करवाया.
        • प्रशासनिक सुधार: अजमेर में कला व साहित्य विभाग की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष पद्मनाभ को बनाया.

        गौरी के भारत में अभियान और अंत

        • दिल्ली पर ऐबक का अधिकार: गौरी ने इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) को जीतकर कुतुबुद्दीन ऐबक को यहाँ छोड़ दिया.
        • अजमेर पर ऐबक का अधिकार: अजमेर में हरिराज ने गोविन्दराज को हटाकर चौहानों को स्वतंत्र करने का प्रयास किया, लेकिन हरिराज ऐबक से हार गया. 1194 में अजमेर को ऐबक ने प्रत्यक्ष रूप से अपने अधिकार में ले लिया.
        • मस्जिदों का निर्माण: इस अवसर पर ऐबक ने दो मस्जिदें बनवाईं:
          • कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद: दिल्ली की प्रथम मस्जिद.
          • ढाई दिन का झोंपड़ा: अजमेर में संस्कृत पाठशाला को तोड़कर 1196 में निर्माण प्रारम्भ करवाया, जो 1200 ई. में पूर्ण हुआ.
        • चंदावर का युद्ध (1194): गौरी ने यमुना नदी के किनारे कन्नौज व बनारस के गहड़वाल शासक जयचंद गहड़वाल को हराया. (तराइन के युद्ध में जयचंद गहड़वाल तटस्थ था).
        • गौरी की वापसी: 1194 में गौरी वापस चला गया व अपना गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को छोड़ गया.
        • गौरी की मृत्यु (1206): सिंधु नदी के किनारे दमयक नामक स्थान पर हुई.
          • चंदरबरदाई इसका श्रेय पृथ्वीराज को देता है (जो तर्कसंगत नहीं है).
          • कुछ इतिहासकार इसका श्रेय खोखर विद्रोहियों को देते हैं.
          • मोहम्मद गौरी को गजनी में दफनाया गया.

        ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

        • भारत आगमन: मोहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान के समय भारत आए थे.
        • जन्म: 1143 ई. सजरी (फारस), ईरान.
        • मृत्यु (वफात): 1235 ई. अजमेर.
        • संस्थापक: भारत में चिश्ती सम्प्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं.
        • उपनाम: गरीब नवाजसुल्तान अलहिन्द (हिन्दुस्तान का आध्यात्मिक गुरु).
          • सुल्तान अलहिन्द की उपाधि गौरी ने दी थी.
        • अजमेर दरगाह:
          • गुम्बद: ग्यासुद्दीन ने बनवाया.
          • शुरुआत: इल्तुतमिश ने की.
          • पूर्ण: हुमायूं के समय में हुई.
          • बड़ी देग: 1567 में अकबर ने दी.
          • छोटी देग: 1613 में जहांगीर ने दी.
          • यह स्थान शिया मुसलमानों के लिए पवित्र है.
          • मेला: 1-6 रज्जब मेला भरता है, जिसका उद्घाटन भीलवाड़ा का गौरी परिवार करता है.

        चिश्ती सम्प्रदाय की शब्दावली

        • गुरु: पीर.
        • शिष्य: मुरीद.
        • उत्तराधिकारी: वली.
        • बैठक स्थल: खानखाह.
        • उपदेश स्थल: जमीदखान.
        • तीर्थ यात्री: जायरीन.
        • तीर्थ यात्रा: जियारत.

        चिश्ती सम्प्रदाय की वंशावली

        • हजरत शेख उस्मानी हारूनी के शिष्य ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती थे.
        • ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य कुतुबद्दीन बख्तियार काकी थे.
        • बख्तियार काकी के शिष्य बाबा फरीद थे.
        • बाबा फरीद के शिष्य निजामुद्दीन औलिया (जिन्होंने कहा था दिल्ली दूर है) थे.
        • निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो थे.
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