गुर्जर प्रतिहार वंश: भारत का एक गौरवशाली अध्याय
परिचय और प्रारंभिक काल
- गुर्जर प्रतिहार स्वयं को भगवान राम के भाई लक्ष्मण के वंशज मानते थे.
- विदेशी इतिहासकार अलमसूदी (915-18) ने गुर्जरों को ‘अलगूजर’ या ‘अलगुर्जा’ नाम दिया.
- पुलकेशियन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में सर्वप्रथम गुर्जर जाति का उल्लेख मिलता है.
- चंद्रबरदाई के पृथ्वीराज रासो के अनुसार, वशिष्ठ मुनि के अग्निकुंड से प्रतिहार का जन्म हुआ.
- मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 प्रमुख शाखाएँ बताईं.
- उत्तरी-पश्चिमी भारत के गुर्जरात्रा क्षेत्र में निवास के कारण इन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा जाने लगा.
- राठौड़ों से पहले मारवाड़ पर गुर्जर प्रतिहारों का शासन था.
- जोधपुर के घटियाला से मिले दो संस्कृत अभिलेखों में प्रतिहारों का वर्णन है; पहला अभिलेख 861 ई. का है, जिसमें शासक कक्कुक का उल्लेख है.
- गुर्जर प्रतिहारों का समय 8वीं से 10वीं सदी के बीच माना जाता है.
- इनकी चार प्रमुख शाखाएँ थीं, जिनमें कन्नौज और मंडोर की शाखाएँ सबसे महत्वपूर्ण थीं.
• मंडोर के प्रतिहार: सबसे प्राचीन शाखा
- प्रतिहारों की सबसे प्राचीन शाखा मंडोर थी, जिसके संस्थापक हरिश्चंद्र माने जाते हैं.
- वास्तविक संस्थापक के रूप में नागभट्ट प्रथम को पहचाना जाता है.
नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.): साम्राज्य का अग्रदूत
- नागभट्ट प्रथम ने 730 ई. में चावड़ों से भीनमाल छीना और उसे अपनी नई राजधानी बनाया.
- उज्जैन पर अधिकार करके इन्होंने प्रतिहारों की एक नई शाखा स्थापित की.
- ग्वालियर अभिलेख के अनुसार, नागभट्ट ने अरब देश की ‘मलेच्छ’ जाति को पराजित किया था.
- पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में इन्हें प्रतिहार वंश का संस्थापक माना गया है.
- हांसोट अभिलेख बताता है कि नागभट्ट प्रथम ने भड़ौच अरब शासक जुनैद से छीनकर भतृवड को दिया.
- राष्ट्रकूट शासक दंतीदुर्ग ने नागभट्ट प्रथम को हिरण्यगर्भ यज्ञ में द्वारपाल बनाने का प्रयास किया; यह जानकारी अमोघवर्ष प्रथम के 871 ई. के संजन ताम्रलेख में मिलती है.
- नागभट्ट प्रथम को मलेच्छ नाशक, इंद्र के घमंड का नाशक, नारायण की मूर्ति, क्षत्रिय ब्राह्मण, और नागवलोक जैसी उपाधियाँ मिलीं.
ककुस्थ (760-783 ई.): निर्माण और स्मारक
- ककुस्थ ने मंडोर में एक विजयस्तंभ और विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया.
- यह राजस्थान का दूसरा प्राचीन विजयस्तंभ माना जाता है.
वत्सराज (783-795 ई.): त्रिपक्षीय संघर्ष का सूत्रधार
- यह उज्जैन के शासक देवराज और भूमिका देवी के पुत्र थे.
- कुवलयमाला के लेखक उद्योतन सूरी इनके दरबार में थे.
- वत्सराज ने जालौर / जाबालीपुर में प्रतिहार वंश की नींव डाली, जिसकी राजधानी भीनमाल थी.
- जानकारी: ह्वेनसांग ने भीनमाल को ‘पीलोभोलो’ कहा था.
- वत्सराज को ‘रणहस्तिन’ और ‘जयवराह’ की उपाधि मिली थी, और वे शैव धर्म के अनुयायी थे.
- पृथ्वीराज विजय के रचनाकार जयानक ने दुर्लभराज चौहान को वत्सराज का सामंत माना है.
- वत्सराज ने औसियां में महावीर स्वामी का मंदिर बनवाया, जो पश्चिमी भारत का प्राचीनतम मंदिर है.
कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष: सत्ता का संग्राम
- यह संघर्ष 752 ई. में कन्नौज के शासक यशोवर्धन की मृत्यु के बाद शुरू हुआ.
- यह संघर्ष कन्नौज पर अधिकार को लेकर बंगाल के पाल, पश्चिम के प्रतिहार, और दक्षिण के राष्ट्रकूटों के बीच 783 से 915 ई. तक चला.
- जानकारी अमोघवर्ष प्रथम के सज्जन ताम्रपत्र, राघनपुर अभिलेख, और वाणी अभिलेख से मिलती है.
- यह संघर्ष छह चरणों में चला:
- प्रथम चरण: प्रतिहार शासक वत्सराज ने कन्नौज पर अधिकार कर इन्द्रायुद्ध को शासक बनाया. धर्मपाल पराजित हुए, लेकिन राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने वत्सराज को हरा दिया.
- द्वितीय चरण: ध्रुव के दक्षिण लौटने पर पाल शासक धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर चक्रायुद्ध को शासक बनाया.
- तीसरा चरण: प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को पराजित कर इन्द्रायुद्ध को पुनः कन्नौज का शासक बनाया, लेकिन राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने धर्मपाल और नागभट्ट द्वितीय दोनों को हराया.
- चौथा चरण: इस दौरान प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों को बारी-बारी से सफलता मिली.
- पांचवां चरण: अयोग्य रामभद्र और राज्य समस्याओं में उलझे अमोघवर्ष का फायदा उठाकर पाल शासक देवपाल ने उत्तरी भारत में विशाल साम्राज्य स्थापित किया.
छठा चरण: प्रतिहार शासक मिहिर भोज और महेंद्रपाल ने राष्ट्रकूटों को पराजित कर अंततः कन्नौज पर अधिकार कर लिया.
नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.): कन्नौज के नए अधिपति
- यह वत्सराज और सुंदर देवी के पुत्र थे, जिन्हें परमभट्टारक और महाराजाधिराज की उपाधि मिली.
- इन्होंने कन्नौज के शासक धर्मपाल के सेनापति चक्रायुद्ध को हराकर कन्नौज पर अधिकार किया और उसे प्रतिहार वंश की राजधानी बनाया.
- मुंगेर (बिहार) के युद्ध में बंगाल शासक धर्मपाल को भी पराजित किया.
- राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने 806 ई. में नागभट्ट को पराजित किया.
- नागभट्ट द्वितीय की विजयों का उल्लेख ग्वालियर प्रशस्ति में मिलता है, जहाँ उनकी दानशीलता के कारण उन्हें ‘कर्ण’ की उपाधि मिली है.
- चंद्रप्रभा सूरी के प्रभावक चरित ग्रंथ के अनुसार, 833 ई. में नागभट्ट द्वितीय ने गंगा नदी में जल समाधि ले ली.
- इन्होंने बुचकेला (जोधपुर) में शिव और विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया.
- नागभट्ट द्वितीय पहले शासक थे, जिन्होंने अरब आक्रमणों को असफल किया.
रामभद्र (833-836 ई.): अल्पकालिक शासन
- यह नागभट्ट द्वितीय और रानी इष्टा देवी के पुत्र थे, इनकी शादी अप्पा देवी से हुई जिनसे राजा भोज का जन्म हुआ.
मिहिर भोज / भोज प्रथम (836-889 ई.): प्रतिहारों का स्वर्णकाल
- इन्हें आदिवराह (ग्वालियर अभिलेख), सार्वभौम, मालवाचक्रवर्ती, श्रीमदआदिवराह (सिक्कों पर), प्रभास पाटन (दौलतपुर अभिलेख), और प्रभास जैसी उपाधियाँ मिलीं.
- इन्होंने अपने पिता रामभद्र की हत्या कर राज्य प्राप्त किया, जिसके कारण इन्हें प्रतिहारों का ‘पितृहंता’ कहा जाता है.
- मिहिर भोज वैष्णव अनुयायी थे और इन्होंने ‘द्रुम’ सिक्के का प्रचलन किया.
- यह प्रतिहारों के सबसे शक्तिशाली शासक थे और इनका समय प्रतिहार वंश का स्वर्णकाल था.
- मिहिर भोज के समय 851 ई. में अरब यात्री सुलेमान भारत आया, जिसने अपनी पुस्तक ‘किताब-उल-सिंध 1-वल-हिंद’ में मिहिर भोज को अरबों का शत्रु बताया.
- सुलेमान के अनुसार, मिहिर भोज अपने विद्वान कवियों के एक-एक श्लोक पर सोने की मुद्राएँ प्रदान करते थे और इस्लाम के शत्रु थे.
- सुलेमान और ग्वालियर शिलालेख के अनुसार, मिहिर भोज ने बंगाल के पाल शासक देवपाल और विग्रहपाल, राष्ट्रकूट शासक ध्रुव, और कालिंजर शासक जयशक्ति को संयुक्त रूप से नर्मदा नदी के किनारे हराया, और कन्नौज पर अंतिम रूप से अधिकार कर लिया.
- राजस्थान के प्रतिहार, चौहान, गुहिल, कलचुरी, चेदि शासक मिहिर भोज के सामंत थे.
- इन्होंने विष्णु के वराह अवतार के सिक्के चलाये.
- बैग्रमा (उत्तर प्रदेश) अभिलेख में मिहिर भोज को ‘संपूर्ण पृथ्वी को जीतने वाला’ बताया है.
‘दंडपाशिक’ मिहिर भोज के शासनकाल में पुलिस अधिकारी था, जिसका उल्लेख 893 ई. के प्रतिहार अभिलेख में मिलता है.
महेंद्रपाल प्रथम (889-908 ई.): साम्राज्य का विस्तार
- यह मिहिर भोज की पत्नी चंद्रभट्टारिका के पुत्र थे.
- इन्हें महाराजाधिराज, परमभट्टारक, रघुकुल चूडामणि, महेंद्रायुध, निर्भय नरेश, महिषपाल, और परमेश्वर जैसी उपाधियाँ मिलीं.
- बी.एन. पाठक ने महेंद्रपाल प्रथम को भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट माना है.
- काठियावाड़, झांसी, अवध, बिहार शरीफ, गया, हजारीबाग, पहाड़पुर (बंगाल) से मिले अभिलेख महेंद्रपाल प्रथम की जानकारी देते हैं.
- राजशेखर महेंद्रपाल प्रथम के दरबारी विद्वान और गुरु थे.
- राजशेखर ने अपने ग्रंथ ‘बाल भारत’ में महेंद्रपाल को रघुग्रामणी और ‘विद्धशालभंजिका’ में रघुकुलतिलक कहा है.
- राजशेखर के प्रमुख ग्रंथ: कर्पूरमंजरी, काव्य मीमांसा, बाल रामायण, हरविलास, बाल भारत, प्रचंड पांडव, भुवनकोश.
भोज द्वितीय (908-913 ई.): संक्षिप्त उत्तराधिकार
- यह महेंद्रपाल प्रथम की पत्नी देहनागा देवी के पुत्र थे, जिन्हें आदिवराह और प्रभास की उपाधि मिली.
महिपाल प्रथम (913-943 ई.): पतन की शुरुआत
- यह महेंद्रपाल प्रथम की रानी महिदेवी के पुत्र थे.
- इन्होंने अपने भाई भोज द्वितीय को हराकर राज्य प्राप्त किया, जिसमें चंदेल शासक हर्षदेव ने सहायता की थी.
- विनायकपाल और हेरभपाल महिपाल की उपाधियाँ थीं.
- राजशेखर ने महिपाल को रघु वंश मुक्तामणि और आर्यावर्त का महाराजाधिराज कहा.
- इनके समय अरब यात्री अलमसूदी (915-18) भारत आया, जिसने गुर्जर प्रतिहारों को ‘अलगुर्जर’ और गुर्जर राजा को ‘बोरा’ कहा.
- महिपाल प्रथम के समय से गुर्जर प्रतिहारों का पतन शुरू हो गया था.
- कवि पम्प के ग्रंथ ‘पम्प भारत’ के अनुसार, महिपाल प्रथम को राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय ने हराया और कन्नौज पर अधिकार कर लिया.
महिपाल प्रथम (913-943 ई.): पतन की शुरुआत
- महेंद्रपाल द्वितीय (943-948 ई.): महिपाल प्रथम और प्रज्ञाधना के पुत्र. इनके समय गुर्जर प्रतिहारों की कई शाखाएं विकसित हुईं. प्रतापगढ़ अभिलेख के अनुसार, इन्होंने दशपुर (मंदसौर, मध्य प्रदेश) गांव दान में दिया.
- देवपाल (948-949 ई.): इनके समय चंदेलों का स्वतंत्र राज्य स्थापित हुआ.
- विनायकपाल द्वितीय (953-954 ई.)
- महिपाल द्वितीय (955 ई.)
- विजयपाल द्वितीय (960 ई.): इनके समय गुजरात में चालुक्य वंश की स्थापना हुई.
- राज्यपाल: इनके समय गजनी शासक महमूद गजनवी का 1018 ई. में कन्नौज पर आक्रमण हुआ. राज्यपाल कन्नौज छोड़कर भाग गया और महमूद गजनवी ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया.
- जानकारी: महमूद गजनवी ने भारत पर कुल 17 आक्रमण किए, जिनमें कन्नौज पर किया गया आक्रमण 12वां था. चंदेल शासक विद्याधर ने राजाओं का संगठन बनाकर कायर शासक राज्यपाल की हत्या कर दी.
- त्रिलोचनपाल: 1019 ई. में महमूद गजनवी ने इन्हें हरा दिया.
- यशपाल: यह प्रतिहार वंश का अंतिम शासक माना जाता है, जिसने 1036 ई. तक शासन किया.