Drainage System of Rajasthan (राजस्थान का अपवाह तंत्र)
अपवाह तंत्र: सामान्य परिचय
- नदियों की दृष्टि से राजस्थान की स्थिति भारत के अन्य राज्यों की तुलना में अच्छी नहीं है।
- अधिकांश नदियाँ अन्य राज्यों से निकलकर यहाँ आती हैं और पुनः अन्य राज्यों में प्रवेश कर जाती हैं।
- इस प्रदेश में नदियों की कमी है, और वर्ष-पर्यन्त प्रवाहित होने वाली नदियों का भी अभाव है।
- चम्बल नदी ही एकमात्र ऐसी नदी है जो वर्षभर बहती है (बारहमासी नदी)।
- राजस्थान में देश के कुल सतही जल का16% और कुल भूमिगत जल का 1.69% भाग ही है।
- राजस्थान के अपवाह तंत्र की प्रमुख विशेषता आंतरिक जल प्रवाह प्रणाली है, जहाँ नदियाँ कुछ दूरी तक प्रवाहित होकर भूमि में समाहित हो जाती हैं।
- अरावली पर्वतमाला राजस्थान की अपवाह प्रणाली में एक महान जल विभाजक रेखा है।
- यह महान जल विभाजक रेखा नदियों को दो भागों में बांटती है: पूर्वी भाग की नदियाँ बंगाल की खाड़ी में और पश्चिमी भाग की नदियाँ अरब सागर में जल ले जाती हैं।
प्रवाह के आधार पर अपवाह प्रणाली का वर्गीकरण
राजस्थान की अपवाह प्रणाली को प्रवाह के आधार पर 3 भागों में विभाजित किया जा सकता है:
- बंगाल की खाड़ी में जल ले जाने वाली नदियाँ (23%):
- इसमें चम्बल, बाणगंगा, गंभीर और इनकी सहायक नदियाँ सम्मिलित हैं ।
- राजस्थान के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 53.13 प्रतिशत क्षेत्र इसके अन्तर्गत आता है ।
- अरब सागर में जल ले जाने वाली नदियाँ (17%):
- इसके अंतर्गत माही, साबरमती, पश्चिमी बनास व लूनी नदियाँ सम्मिलित हैं ।
- राज्य के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 35.11 प्रतिशत भाग इसके अन्तर्गत आता है ।
- आंतरिक जल प्रवाह की नदियाँ (60%):
- इनका जल किसी सागर या समुद्र तक पहुँचने से पहले ही भूमि में विलुप्त हो जाता है ।
- राज्य के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 12.75 प्रतिशत भाग इसके अन्तर्गत आता है
बंगाल की खाड़ी में जल ले जाने वाली नदियाँ
चम्बल नदी
- उपनाम: कामधेनू, चर्मवती/चर्मण्वती, नित्यवाही, मालवगंगा।
- उद्गम: जानापाव की पहाड़ियाँ (महू के निकट, मध्यप्रदेश) विंध्याचल पर्वत श्रेणियों से।
- राजस्थान में प्रवेश: चौरासीगढ़ (मध्यप्रदेश) के पास से रावतभाटा, चित्तौड़गढ़ में।
- समापन: मुरादगंज, (उत्तरप्रदेश) नामक स्थान के पास यमुना नदी में मिल जाती है।
- कुल लम्बाई: नवीनतम वाटर रिसोर्सेज रिपोर्ट के अनुसार 1051 कि.मी. है।
- विशेषताएँ:
- यहसर्वाधिक लम्बी अंतर्राज्यीय सीमा (जल सीमा) बनाने वाली नदी है (252 कि.मी. राजस्थान व मध्यप्रदेश सीमा पर)।
- यह बहाव की दृष्टि से राजस्थान कीसबसे बड़ी नदी है।
- यह राजस्थान कीएकमात्र बारहमासी (वर्षभर बहने वाली) नदी है।
- यह राजस्थान में सर्वाधिकअवनालिका अपरदन (जल अपरदन) करने वाली नदी है 37।
- यह नदी सर्वाधिक बीहड़ भूमि का विस्तार करती है और इसमें उत्खात स्थलाकृतियाँ (Badland Topography) पायी जाती हैं।
- घड़ियालों की अधिकता के कारण इसे ‘घड़ियालों की शरणस्थली’ कहा जाता है।
- यह विश्व धरोहर के लिए नामित राजस्थान की एकमात्र नदी है।
- चम्बल नदी पर निर्मित बाँध (उद्गम से समापन के क्रम में):
- गाँधीसागर (मन्दसौर, मध्यप्रदेश): चम्बल पर निर्मित सबसे पहला व सबसे बड़ा बाँध है।
- राणाप्रताप सागर (रावतभाटा, चित्तौड़गढ़): भराव क्षमता की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध है।
- जवाहर सागर बाँध (बोरावास, कोटा)।
- कोटा बैराज/कोटा सिंचाई बाँध (कोटा शहर के समीप): इससे केवल सिंचाई होती है।
बनास नदी
- उपनाम: वशिष्ठी, वर्णाशा (वन की आशा)।
- उद्गम: वेरों का मठ (कुम्भलगढ़ के निकट खमनौर की पहाड़ियाँ, राजसमंद)।
- समापन: रामेश्वरम (सवाईमाधोपुर) में चम्बल में मिलती है, जहाँ चम्बल, बनास व सीप मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती हैं।
- कुल लम्बाई: 512 किमी. है।
- विशेषताएँ:
- यह राजस्थान का सबसे बड़ा नदी बेसिन है (राज्य के कुल क्षेत्रफल का 4 प्रतिशत भाग)।
- यह पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे बड़ी नदी है।
- यह चम्बल की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
- यह राजस्थान में सर्वाधिक त्रिवेणी संगम बनाने वाली नदी है।
- बनास नदी टोंक में सर्पाकार बहती है।
- त्रिवेणी संगम (बनास नदी पर) :
- बीगोद (भीलवाड़ा): बनास, बेड़च, मेनाल।
- राजमहल (टोंक): बनास, खारी, डाई।
- रामेश्वरम (सवाईमाधोपुर): बनास, चम्बल, सीप।
- देवधाम (टोंक): बनास, बांडी, मांशी।
- बनास नदी पर निर्मित बाँध:
- बाघेरी का नाका बाँध (राजसमंद)।
- नन्दसमंद बाँध (राजसमंद की जीवनरेखा)।
- मातृकुण्डिया बाँध (चित्तौड़गढ़, मेवाड़ का हरिद्वार)।
- बीसलपुर बाँध (टोंक): राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है।
- ईसरदा बाँध (सवाईमाधोपुर): निर्माणाधीन है।
बाणगंगा नदी
- उपनाम: अर्जुन की गंगा, ताला नदी, रूण्डित नदी।
- उद्गम: बैराठ की पहाड़ियाँ (कोटपुतली-बहरोड़) से।
- समापन: वर्तमान समय में भरतपुर के मैदान में ही विलीन हो जाती है, इसलिए इसे रूण्डित नदी कहते हैं और यह आंतरिक जल प्रवाह की नदी बन गई है।
- विशेषताएँ: इस नदी के किनारे बैराठ सभ्यता विकसित हुई है।
- बनास नदी पर निर्मित बाँध:
- जमवारामगढ़ बाँध (जयपुर ग्रामीण)।
- लालपुर बाँध (भरतपुर)।
बंगाल की खाड़ी अफवाह तंत्र की अन्य प्रमुख नदियाँ
काली सिन्ध नदी
- उद्गम: मध्य प्रदेश के देवास ज़िले में बागली नामक गाँव के पास विंध्याचल पहाड़ियों सें।
- समापन: कोटा जिले के नौनेरा नामक स्थान में चम्बल नदी में ।
- बहाव क्षेत्र- राजस्थान के झालावाड, बांरा, कोटा जिलो में बहती हैं ।
- कुल लम्बाई: 278 किमी. (राजस्थान में लम्बाई 150 किमी.)
- विशेषताएँ:
- काली सिन्ध नदी चम्बल की प्रमुख सहायक नदी हैं
- आहू तथा काली सिन्ध नदी के संगम पर गागरोन किला स्थित हैं।
- काली सिन्ध की प्रमुख सहायक नदियाँ परवण, उजाङ, निवाज, आहू हैं।
पार्वती नदी
- उद्गम: मध्य प्रदेश के सीहोर जिले सें (विंध्याचल पहाड़ियों सें)।
- राजस्थान में प्रवेश: कडैयाहाट (बाँरा) के समीप।
- समापन: सवाई माधोपुर जिले के पालिया गांव के पास चंबल नदी में ।
- बहाव क्षेत्र- राजस्थान के झालावाड, बांरा, कोटा जिलो में बहती हैं ।
- विशेषताएँ:
- यह नदी राजस्थान में बारा और कोटा जिलों की सीमा बनाते हुए बहती है।
- पार्वती नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ अंधेर, रेतरी, अहेली ,कूल हैं।
बेड़च नदी
- उद्गम: राजस्थान के उदयपुर जिले की गोगुन्दा की पहाड़ियों सें।
- समापन: भिलवाड़ा जिले के बिगोद नामक स्थान पर बनास नदी में (त्रिवेणी संगम – बनास, मेनाल व बेड़च)।
- बहाव क्षेत्र- राजस्थान के उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा जिलो में बहती हैं ।
- विशेषताएँ:
- यह नदी उदयपुर के निकट आयड़ नदी के नाम से जानी जाती है, किन्तु उदयसागर झील से निकलने के पश्चात् इसे बेड़च कहते हैं।
- बनास नदी में दांयी ओर से मिलने वाली सबसे बड़ी सहायक नदी आयड़ या बेड़च नदी है।
कोठारी नदी
- उद्गम: राजस्थान के राजसमंद जिले की दिवेर पहाड़ियां सें।
- समापन: भीलवाड़ा जिले की कोटड़ी तहसील में नंदराय नामक स्थान पर बनास नदी में ।
- बहाव क्षेत्र- राजस्थान के राजसमंद, भीलवाड़ा जिलो में बहती हैं ।
- कुल लम्बाई: 145 किमी.
- विशेषताएँ:
- इस नदी के किनारे भीलवाड़ा जिले में बागौर सभ्यता के अवशेष मिलें हैं।
- कोठारी नदी पर निर्मित बाँध:
- मेजा बाँध (भीलवाड़ा)
खारी नदी
- उद्गम: राजस्थान के राजसमन्द जिले के बिजराल ग्राम की पहाड़ियों सें।
- समापन: टोंक जिले में देवली के निकट यह बनास नदी में
- बहाव क्षेत्र- राजस्थान के राजसमंद, अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक जिलो में बहती हैं ।
- कुल लम्बाई: 182 किमी.
- विशेषताएँ:
- इसनदी के किनारे आसीन्द (भीलवाड़ा) में सवाई भोज का मंदिरस्थित हैं।
अरब सागर में जल ले जाने वाली नदियाँ
मही नदी
- उपनाम: आदिवासियों की गंगा, वागड़ की गंगा, कांठल की गंगा, दक्षिणी राजस्थान की स्वर्णरेखा।
- उद्गम: मेहद झील (धार जिला, M.P.) अमरोरू की पहाड़ियों से।
- राजस्थान में प्रवेश: खांदू गाँव (बाँसवाड़ा) से।
- समापन: खम्भात की खाड़ी (अरब सागर) में।
- कुल लम्बाई: 576 कि.मी. (राजस्थान में 171 कि.मी.)।
- विशेषताएँ:
- माही नदी उलटे ‘यू’ के आकार में बहती है।
- माही राजस्थान की एकमात्र नदी है, जिसका प्रवेश एवं निकास दोनों ही दक्षिण दिशा से होता है।
- यह नदी कर्क रेखा को दो बार काटती है।
- इसके प्रवाह के मैदान को प्रतापगढ़ में कांठल का मैदान व बांसवाड़ा में छप्पन का मैदान कहते हैं।
- त्रिवेणी संगम: सोम, माही, जाखम नदियों का बेणेश्वर (डूंगरपुर) नामक स्थान पर संगम होता है।
- माही पर बने बाँध:
- माही बजाज सागर बाँध (बोरखेड़ा, बाँसवाड़ा): यह राजस्थान का सबसे लम्बा बाँध है (3109 मीटर)।
- कागदी पिकअप बाँध (बाँसवाड़ा)।
- कडाना बाँध (गुजरात)।
लूनी नदी
- उपनाम: सागरमती, सरस्वती, लवणवती (प्राचीन नाम), मारवाड़ की गंगा, अन्तः सलिला, आधी खारी, आधी मीठी नदी।
- उद्गम: नाग पहाड़, आनासागर (अजमेर) से 85।
- समापन: कच्छ का रन (अरब सागर) में।
- कुल लम्बाई: 495 कि.मी. (राजस्थान में 330 किमी.)।
- प्रवाह क्षेत्र: सर्वाधिक 8 जिलों में (अजमेर, नागौर, ब्यावर, पाली, जोधपुर, बालोतरा, बाड़मेर, जालौर)।
- विशेषताएँ:
- यह पश्चिमी राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है।
- इसका पानी बालोतरा तक मीठा एवं तत्पश्चात खारा हो जाता है।
- बालोतरा कस्बा लूणी नदी के पेटे से नीचे बसा है।
- लूणी की एकमात्र सहायक नदी जोजड़ी है जो दांयी ओर से मिलती है तथा मुख्य अरावली की पहाड़ियों से नहीं निकलती है।
- जवाई नदी (लूनी की सबसे बड़ी सहायक नदी):
- जवाई बाँध (सुमेरपुर, पाली) को ‘मारवाड़ का अमृत सरोवर’ कहा जाता है।
- जवाई बाँध को जलापूर्ति के लिए सेई नदी पर सेई बाँध बनाकर पहली जल सुरंग द्वारा पानी लाया जाता है।
साबरमती नदी
- उद्गम: पदराला की पहाड़ियाँ (झाडोल, उदयपुर)।
- समापन: खम्भात की खाड़ी (अरब सागर)।
- कुल लम्बाई: 416 किमी. (राजस्थान में लम्बाई 45 किमी.) ।
- विशेषताएँ: गाँधीजी का साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) इसी नदी के किनारे स्थित है।
- जल सुरंग: सेई जल सुरंग (राज्य की प्रथम जल सुरंग) जंवाई बाँध को जलपूर्ति करती है।
बंगाल की खाड़ी अफवाह तंत्र की अन्य प्रमुख नदियाँ
लीलड़ी नदी
- अजमेर में जवाजा के निकट से निकलकर पाली जिले में लूनी से मिल जाती है।
मीठड़ी नदी
- पाली तहसील में अरावली से निकलकर पाली-बाड़मेर से बहती हुई पंवाला गाँव के समीप लूनी में मिल जाती है।
जवाई नदी
- पाली तहसील के गोरिया गाँव से निकलती है।
- जालौर में पल्लाई गाँव के समीप इसके बाएं किनारे पर सूकड़ी नदी तथा बिराना गाँव में यह खारी नदी से मिलती है,
- बाड़मेर में लूनी से मिलती है।।
बाड़ी नदी
- अग्रर्थली पहाड़ियों से निकलकर यह नदी पाली में लालसनी गाँव के समीप लूनी में मिल जाती है।
आंतरिक जल प्रवाह की नदियाँ
घग्घर नदी
- उपनाम: प्राचीन सरस्वती, दृषद्वती, मृत नदी, सोतर, नट नदी, राजस्थान का शोक।
- उद्गम: शिवालिक पर्वत श्रेणी (कालका माता का मंदिर, शिमला, हिमाचल प्रदेश)।
- राजस्थान में प्रवेश: तलवाड़ा (हनुमानगढ़) से।
- प्रवाह: हनुमानगढ़ व गंगानगर जिलों में।
- विशेषताएँ:
- राजस्थान की एकमात्र नदी जो हिमालय से आती है।
- यह राजस्थान की अन्तः प्रवाह की सबसे लम्बी नदी है।
- हनुमानगढ़ में इसके प्रवाह को नाली या पाट और पाकिस्तान में हकरा/हाकरा कहते हैं।
- कालीबंगा, पीलीबंगा व रंगमहल सभ्यता इसी नदी किनारे स्थित हैं।
कांतली नदी
- उद्गम: खण्डेला की पहाड़ियाँ (सीकर)।
- समापन: चूरू-झुंझुनूं सीमा पर विलुप्त हो जाती है।
- लम्बाई: 100 किमी.।
- विशेषताएँ:
- राजस्थान में पूर्णतः बहाव की दृष्टि से यह आंतरिक प्रवाह की सबसे लम्बी नदी है।
- इसका प्रवाह क्षेत्र ‘तोरावाटी’ कहलाता है।
- गणेश्वर सभ्यता व सुनारी सभ्यता इसी नदी किनारे स्थित हैं।
काकनेय नदी
- उपनाम: मसूरड़ी।
- उद्गम: कोटरी गाँव की पहाड़ियाँ (जैसलमेर)।
- विशेषताएँ: राजस्थान की आंतरिक जल प्रवाह की सबसे छोटी नदी है।